कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि इन सभी कानूनों की वैधता की जांच अब तीन जजों की एक विशेष बेंच द्वारा की जाएगी, जिससे यह साफ है कि आने वाले समय में देश में धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य के हस्तक्षेप की सीमाओं पर एक ऐतिहासिक फैसला आ सकता है.
याचिकाकर्ताओं की क्या है दलील?
‘नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया’ (NCCI) और अन्य संस्थाओं की ओर से दायर इन याचिकाओं में राज्यों के इन कानूनों को ‘अस्पष्ट और दमनकारी’ बताया गया है. वरिष्ठ वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने कोर्ट में दलील दी कि राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के अधिनियमों में ‘धर्मांतरण’ और ‘प्रलोभन’ की परिभाषा इतनी व्यापक है कि यह तय करना मुश्किल है कि असल में अपराध क्या है.
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ये कानून (Anti Conversion Law) संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) का सीधा उल्लंघन करते हैं. विशेष रूप से 2024 और 2025 के नए संशोधनों पर चिंता जताई गई है, क्योंकि ये पुलिस और प्रशासन को असीमित अधिकार देते हैं, जिससे निर्दोष लोगों के खिलाफ मनमानी कार्रवाई का खतरा बढ़ गया है.
सरकार का क्या है मानना?
दूसरी ओर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र और राज्यों का पक्ष रखते हुए कोर्ट को बताया कि सरकार का जवाब तैयार है और इसे जल्द ही दाखिल कर दिया जाएगा. सरकार का तर्क है कि जबरन, धोखे या प्रलोभन से किए जाने वाले धर्मांतरण ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ (Public Order) के लिए खतरा हैं और राज्यों को इसे रोकने के लिए कानून बनाने का पूरा अधिकार है.
सरकार ने 1977 के ‘रेव स्टैनिस्लॉस’ मामले के फैसले का भी हवाला दिया है जिसमें कोर्ट ने कहा था कि ‘धर्म के प्रचार’ के अधिकार में ‘धर्मांतरण कराने’ का अधिकार शामिल नहीं है. हालांकि याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वर्तमान कानून उस पुराने फैसले की सीमाओं को पार कर व्यक्तिगत निजता और विवाह जैसे निजी फैसलों में भी दखल दे रहे हैं.
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क्या हैं राजस्थान कानून के विवादित प्रावधान?
राजस्थान का नया कानून (2025) अन्य राज्यों के मुकाबले अधिक सख्त माना जा रहा है. इसमें सामूहिक धर्मांतरण (दो या दो से अधिक व्यक्ति) के लिए 20 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है. याचिका में यह भी कहा गया है कि यह कानून उन लोगों के लिए ‘घर वापसी’ की छूट देता है जो अपने ‘पैतृक धर्म’ में लौट रहे हैं, जिसे भेदभावपूर्ण बताया गया है.
साथ ही जिला मजिस्ट्रेट (DM) को धर्मांतरण से पहले सूचना देने और जांच करने की अनिवार्यता को निजता के अधिकार का हनन माना जा रहा है. अब सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि क्या राज्य सरकारें किसी व्यक्ति के धर्म बदलने की प्रक्रिया में इतनी गहराई तक हस्तक्षेप कर सकती हैं या नहीं.
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-भारत एक्सप्रेस
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