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ईरान युद्ध में पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका: मेज पर शांति से ज्यादा कुछ और

ईरान-अमेरिका संघर्ष में पाकिस्तान की मध्यस्थता का दांव शांति के लिए है या स्वार्थ के लिए? इतिहास गवाह है कि उसकी भूमिका हमेशा रणनीतिक लाभ से प्रेरित रही है.

Vijay Ram Edited by Vijay Ram

ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चल रहे तनावपूर्ण संघर्ष में पाकिस्तान ने खुद को मध्यस्थ की भूमिका में पेश किया है. लेकिन सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान वाकई शांति ला सकता है या फिर, जैसा कि उसका इतिहास बताता है, मेज पर शांति से कहीं ज्यादा कुछ और रखा हुआ है?

मध्यस्थता का इतिहास: तटस्थता की बजाय स्वार्थ

नॉर्वे या कतर जैसे पारंपरिक मध्यस्थों की तरह पाकिस्तान की मध्यस्थता कभी तटस्थ नहीं रही. उसकी भौगोलिक स्थिति, सुरक्षा हित, गठबंधन के अवसर और ‘सेवा’ के बदले मिलने वाले लाभ ने उसे हमेशा इस भूमिका में धकेला है. लेकिन पाकिस्तान को ‘दोहरी बात’ (duplicitousness), स्वार्थपूर्ण रवैया और विश्वास की कमी का सामना करना पड़ता रहा है.

पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की शुरुआत 1970 के दशक की शुरुआत में हुई. यह पूरी तरह गुप्त, लेन-देन आधारित और गोपनीय थी. 1971 में बांग्लादेश बनाने के बाद पाकिस्तान को अमेरिकी सैन्य-आर्थिक सहायता की सख्त जरूरत थी. तत्कालीन पाकिस्तानी नेता जुल्फिकार अली भुट्टो ने माचियावेलियन तरीके से अमेरिका और चीन के बीच राजनयिक संबंध बनाने में अहम भूमिका निभाई. पाकिस्तानी राजनयिकों ने वाशिंगटन और बीजिंग के बीच संदेशों का आदान-प्रदान किया. हेनरी किसिंजर की गुप्त बीजिंग यात्रा भी पाकिस्तान के माध्यम से ही हुई, जिसने 1972 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की ऐतिहासिक चीन यात्रा की नींव रखी. इस ‘सेवा’ के बदले पाकिस्तान को चीन से ‘ब्राउनी पॉइंट्स’ और अमेरिका से सैन्य-आर्थिक मदद दोनों मिली.

1980 के दशक: अफगानिस्तान में ‘मध्यस्थता’ का मुखौटा

1980 के दशक में पाकिस्तान ने फिर वही रणनीति अपनाई. CIA का सबसे बड़ा गुप्त कार्यक्रम पाकिस्तान के माध्यम से ही चलाया गया. पाकिस्तान की ISI ने सोवियत कब्जे के खिलाफ मुजाहिदीन लड़ाकों को हथियार, फंडिंग और प्रशिक्षण दिया. यह ‘मध्यस्थता’ नहीं, बल्कि पाकिस्तान का अपना ‘स्ट्रेटेजिक डेप्थ’ हासिल करने का खेल था.

9/11 के बाद ‘वॉर ऑन टेरर’ शुरू होने पर भी पाकिस्तान ने दोहरा खेल खेला. तालिबान को काबुल से बाहर करने के बाद हमीद करजई और अशरफ गनी सरकारों के दौरान पाकिस्तान ने तालिबान के कुछ गुटों को गुप्त समर्थन दिया. बाद में दोहा शांति वार्ता में तालिबान गुटों को एक मंच पर लाने में पाकिस्तान ने ‘पीछे से’ अहम भूमिका निभाई. मुल्ला अब्दुल गनी बरादर और हक्कानी नेटवर्क जैसे नेताओं के साथ पाकिस्तान के पुराने संबंधों ने उसे इस ‘कंड्यूट’ सेवा के लिए ‘अनमोल’ बना दिया. लेकिन जब तालिबान 2021 में वापस सत्ता में आए तो पाकिस्तानी जासूसी प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल फैज हामिद को काबुल में ‘रेड कार्पेट’ दिया गया. इससे साफ हो गया कि दोहा वार्ता में पाकिस्तान की मध्यस्थता निष्पक्ष नहीं थी, बल्कि अपने हितों से प्रेरित थी.

पाकिस्तान का उत्साह

अभी ईरान पर अमेरिका-इजरायल का युद्ध अपने चरम पर है. पाकिस्तान इस समय ईरान और अमेरिका दोनों के साथ सक्रिय संबंध रखने वाला दुर्लभ देश है. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर दोनों ही इस अवसर को अपने ‘रिप्यूटेशन’ को चमकाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. उन्होंने ट्रंप को नोबेल पुरस्कार देने का सुझाव तक दिया और व्हाइट हाउस में ‘रेयर मेटल्स’ का ‘डॉडी ब्रीफकेस’ लेकर पहुंचने जैसी कोशिशें कीं.

लेकिन हकीकत यह है कि ईरान ने पाकिस्तान से मध्यस्थता की मांग नहीं की थी. अमेरिका पाकिस्तान के पुराने ‘डबल गेम’ (अफगानिस्तान और आतंकवाद में) को अच्छी तरह जानता है. वहीं ईरान के साथ पाकिस्तान के संबंध हमेशा संप्रदायिक मतभेद और सीमा विवादों से जूझते रहे हैं.

पाकिस्तान की मध्यस्थता का रिकॉर्ड दिखाता है कि वह न तो नॉर्वे जैसी निष्पक्ष है और न ही कतर जैसी विश्वसनीय. हर बार उसकी भूमिका अपने भू-राजनीतिक स्वार्थ, सैन्य-आर्थिक लाभ और ‘स्ट्रेटेजिक डेप्थ’ से प्रेरित रही है. ईरान युद्ध में भी पाकिस्तान की ‘मध्यस्थता’ का असली मकसद शांति नहीं, बल्कि अपनी छवि सुधारना और भविष्य के लाभ दिखता है.



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