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संसद मानसून सत्र: बागी सांसदों के सहारे! परिसीमन सहित 7 बिलों के चक्रव्यूह को भेद पाएगी सरकार?

संसद का मॉनसून सत्र आज से शुरू हो रहा है, जहां सरकार परिसीमन समेत सात अहम विधेयकों को पारित कराने की तैयारी में है. बागी सांसदों, दो-तिहाई बहुमत के गणित और विपक्ष के तीखे विरोध के बीच सत्र बेहद अहम रहने वाला है.

Monsoon Session 2026: देश की संसद का बहुप्रतीक्षित मॉनसून सत्र आज से शुरू हो रहा है, लेकिन इसके शुरू होने से पहले ही दिल्ली की सियासत में एक ऐसा महा-संग्राम छिड़ चुका है जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है. दरअसल इस बार का सत्र सिर्फ सामान्य विधायी कामकाज तक सीमित नहीं रहने वाला है बल्कि यह केंद्र सरकार की ‘आक्रामक रणनीति’ और विपक्ष के तीखे पलटवार की सबसे कड़क प्रयोगशाला बनने जा रहा है.

सरकार इस सत्र (Sansad Monsoon Satra 2026) में बहुचर्चित परिसीमन से जुड़े 131वें संविधान संशोधन विधेयक, एफसीआरए संशोधन बिल और विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल समेत 7 बड़े और दूरगामी विधेयकों को पारित कराने की पूरी तैयारी में है. हालांकि इन ऐतिहासिक बिलों को पारित कराने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा संसद के भीतर ‘दो-तिहाई बहुमत’ यानी 360 सांसदों के उस जादुई आंकड़े का है, जिसे हासिल करने के लिए सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ने अपनी पूरी कड़क फील्डिंग सजा ली है.

स्पीकर के फैसले पर टिका संसद के नंबर का गणित

सदन के भीतर राजनीतिक समीकरणों में आए अचानक बदलाव ने इस मॉनसून सत्र को बेहद रोमांचक बना दिया है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों द्वारा बनाई गई नई पार्टी ‘एनसीपीआई’ और शिवसेना (उबाठा) के 6 बागी सांसदों की भूमिका इस वक्त सबसे अहम हो गई है. सभी की नजरें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पर टिकी हैं, जिन्हें बागी सांसदों के गुटों को अलग मान्यता देने से जुड़े विवादों पर फैसला सुनाना है.

बताते चलें अगर स्पीकर का फैसला बागी गुटों के पक्ष में जाता है तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का आंकड़ा एकाएक मजबूत हो जाएगा. हालांकि, 540 सदस्यों वाली लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत यानी 360 की संख्या तक पहुंचने के लिए सरकार को अभी भी कड़े राजनीतिक कौशल की जरूरत पड़ेगी, जिससे इस सत्र का हर एक दिन किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं होने वाला है.

विपक्षी गुट में सेंधमारी का क्या है प्लान?(Sansad Monsoon Satra 2026)

संविधान संशोधन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने आक्रामक रुख अपनाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की थी. लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी यह है कि विपक्षी कुनबे के भीतर ही इस बिल को लेकर एक राय नहीं बन पा रही है.

भले ही कांग्रेस इस विधेयक(Delimitation Bill) का पुरजोर विरोध करने का दम भर रही हो, लेकिन शरद पवार की राकांपा और उद्धव ठाकरे की शिवसेना जैसे दल पहले ही ऐसे संकेत दे चुके हैं कि यदि राज्यों के हितों की रक्षा के कड़े प्रावधान किए जाते हैं तो वे सरकार का साथ दे सकते हैं.

सरकार को घेरने की विपक्ष की तैयारी

दूसरी तरफ, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के नेतृत्व में विपक्ष ने भी सरकार की घेराबंदी के लिए मुद्दों का कड़क जखीरा तैयार कर रखा है. विपक्ष इस सत्र में परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक (Paper Leak), संवैधानिक संस्थानों पर कथित कब्जे, राजनीतिक दलों में तोड़फोड़, महंगाई और विदेश नीति के मोर्चे पर सरकार को नंगा करने की फिराक में है.

इसके अलावा अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़े विवाद को भी संसद के पटल (Sansad Monsoon Satra 2026) पर जोरों से उठाने की तैयारी है, जिस पर सरकार यह कड़क रुख अपना सकती है कि यह पूरी तरह से राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र का विषय है.

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-भारत एक्सप्रेस



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