हिंदी साहित्य में कुछ किताबें ऐसी होती हैं जो सिर्फ कहानी नहीं सुनातीं, बल्कि पाठक को सोचने का एक नया नजरिया भी देती हैं. पत्रकार और लेखक अंशुमान तिवारी की नई पुस्तक ‘विक्टर और वेताल 2.0’ इसी तरह का एक अलग और दिलचस्प प्रयोग है. यह किताब पुराने समय की मशहूर विक्रम-वेताल परंपरा को आधुनिक दौर से जोड़ते हुए इतिहास, तकनीक, समाज और इंसानी सोच के बीच एक अनोखा संवाद खड़ा करती है.
किताब का कवर भी इसकी पूरी सोच को बेहद खूबसूरती से सामने रखता है. इसमें प्राचीन शिलालेखों से सजा एक VR हेडसेट दिखाया गया है, जो यह संकेत देता है कि आज की डिजिटल दुनिया में भी पुराने अनुभव और इतिहास की सीख कितनी अहम है. यानी एक तरफ हजारों साल पुराना ज्ञान है और दूसरी तरफ आधुनिक तकनीक. दोनों मिलकर वर्तमान को समझने की कोशिश करते हैं.
इतिहास की आवाज और आज के इंसान के सवाल
इस किताब में ‘विक्टर’ आज के दौर के इंसान और पत्रकार का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि ‘वेताल’ इतिहास की उस आवाज को सामने लाता है जो हमें याद दिलाती है कि दुनिया में बहुत कुछ नया दिखने के बावजूद कई घटनाएं पहले भी घट चुकी हैं.
अंशुमान तिवारी संवाद की शैली के जरिए यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था या तकनीक से जुड़े आज के सवालों की जड़ें अक्सर अतीत में कहीं न कहीं मिल जाती हैं. इतिहास यहां सिर्फ तारीखों और घटनाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि वर्तमान को समझने का एक जरिया बन जाता है.
पत्रकारिता के अनुभव से निकली अलग सोच
अंशुमान तिवारी लंबे समय से आर्थिक पत्रकारिता, वैश्विक राजनीति, इतिहास और भविष्य की संभावनाओं जैसे विषयों पर लिखते रहे हैं. उनकी पहले की किताबें ‘लक्ष्मीनामा’ और ‘उल्टी गिनती’ भी पाठकों के बीच चर्चा में रही हैं. इस नई कृति में उनका अनुभव, शोध और आम लोगों की सोच को समझने की क्षमता साफ दिखाई देती है.
लेखक यह विचार सामने रखते हैं कि आज की कई घटनाएं इतिहास के किसी पुराने अध्याय की याद दिलाती हैं. समय बदलता है, परिस्थितियां बदलती हैं, लेकिन इंसानी व्यवहार, सत्ता की चुनौतियां और समाज की उलझनें कई बार पुराने पैटर्न दोहराती नजर आती हैं.
‘विक्टर और वेताल 2.0’ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें जटिल विषयों को आम पाठक के लिए सरल बनाया गया है. किताब यह समझाने की कोशिश करती है कि इतिहास केवल अतीत की बात नहीं है, बल्कि भविष्य के फैसलों के लिए एक जरूरी सबक भी देता है.
तेजी से बदलती दुनिया में, जहां लोगों का ध्यान छोटी-छोटी चीजों में बंट जाता है, यह किताब पाठक को रुककर सोचने का मौका देती है. इसमें जानकारी भी है, कहानी का आकर्षण भी और सवाल उठाने की क्षमता भी.
अंशुमान तिवारी का लेखन तीखा जरूर है, लेकिन उसमें उम्मीद का भाव बना रहता है. वे केवल समस्याओं की चर्चा नहीं करते, बल्कि इतिहास से सीख लेकर आगे बढ़ने की संभावनाओं की ओर भी इशारा करते हैं.
हिंदी साहित्य में एक नया प्रयोग
‘विक्टर और वेताल 2.0’ इस मायने में खास है कि यह इतिहास को सिर्फ पीछे मुड़कर देखने का माध्यम नहीं मानती, बल्कि वर्तमान और भविष्य को समझने का रास्ता बनाती है. इसमें वेताल अब किसी पुराने किस्से का पात्र भर नहीं रह जाता, बल्कि वह हमारे समय से सवाल करने वाली एक जरूरी आवाज बन जाता है.
यह किताब उन पाठकों के लिए दिलचस्प हो सकती है, जो इतिहास, समाज और आज की बदलती दुनिया के बीच संबंधों को समझना चाहते हैं. यह कृति एक बार फिर साबित करती है कि अच्छी कहानियां कभी पुरानी नहीं होतीं. वे बस समय के साथ अपना रूप बदलती रहती हैं और नए सवालों के साथ हमारे सामने आती हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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