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जब रवींद्रनाथ ठाकुर ने राखी को बनाया एकता का हथियार, ऐसे हुआ था बंग-भंग का विरोध

Raksha Bandhan History: 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में रवींद्रनाथ ठाकुर ने रक्षाबंधन को हिंदू-मुस्लिम एकता और सामाजिक भाईचारे का प्रतीक बना दिया था. 16 अक्टूबर को लोगों ने एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधकर ब्रिटिश शासन की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति के खिलाफ एकजुटता दिखाई.

Raksha Bandhan History: रक्षाबंधन सदियों से भाई-बहन के पवित्र बंधन, सुरक्षा और स्नेह का प्रतीक रहा है. पौराणिक कथाओं से लेकर राजपूत काल तक यह त्योहार व्यक्तिगत रिश्तों और संरक्षण की भावना से जुड़ा रहा. लेकिन 1905 में यह त्योहार एक ऐतिहासिक मोड़ पर पहुंचा. जब ब्रिटिश साम्राज्य ने बंगाल को धर्म के आधार पर बांटने की साजिश रची, तब रवींद्रनाथ ठाकुर ने रक्षाबंधन के पवित्र धागे को विरोध और एकता का शक्तिशाली सूत्र बना दिया. यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उन अनोखी मिसालों में से एक है, जहां सांस्कृतिक परंपरा को राजनीतिक प्रतिरोध का माध्यम बनाया गया.

बंग-भंग की साजिश और विभाजन की घोषणा

उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में बंगाल भारतीय राष्ट्रवाद का केंद्र बन चुका था. वन्दे मातरम् का स्वर गूंज रहा था और स्वदेशी भावना बल पकड़ रही थी. वायसराय लॉर्ड कर्जन ने इस बढ़ते आंदोलन को कुचलने के लिए ‘फूट डालो और राज करो’ नीति अपनाई. जून 1905 में उन्होंने मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल से बैठक कर बंगाल विभाजन का फैसला लिया. हिंदू बहुल पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा को मुस्लिम बहुल असम और सिलहट से अलग करने की योजना बनाई गई. अगस्त 1905 में आदेश जारी हुआ और 16 अक्टूबर 1905 को विभाजन लागू होना था. यह तारीख संयोग से श्रावण पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन के दिन पड़ी. ब्रिटिश प्रशासन ने इसे महज प्रशासनिक सुविधा समझा, लेकिन बंगाल के लोगों के लिए यह दिन सदमा और विरोध का प्रतीक बन गया.

ठाकुर का आह्वान: राखी बनी एकता का प्रतीक

रवींद्रनाथ ठाकुर ने विभाजन को सिर्फ भूमि का बंटवारा नहीं, बल्कि समुदायों के बीच दरार पैदा करने की कोशिश के रूप में देखा. उन्होंने हिंसा या नारेबाजी के बजाय एक रचनात्मक और प्रतीकात्मक रास्ता चुना. ठाकुर ने लोगों से अपील की कि रक्षाबंधन को केवल भाई-बहन तक सीमित न रखें. हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधें. यह धागा पारिवारिक सुरक्षा का नहीं, बल्कि सामुदायिक भाईचारे, पारस्परिक संरक्षण और औपनिवेशिक षड्यंत्र के खिलाफ एकजुटता का संदेश बने.

16 अक्टूबर 1905 को बंगाल में राष्ट्रीय शोक दिवस मनाया गया. घरों में चूल्हे नहीं जले, लोग सूखा भोजन या फल खाकर रहे. कलकत्ता (कोलकाता) में ठाकुर के नेतृत्व में जुलूस निकला. लोग गंगा स्नान करके सड़कों पर उतरे. ‘बंगालर माटी बंगालर जल’ जैसे गीत गूंजे. हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे को राखी बाँधते नजर आए. ढाका, सिलहट और अन्य शहरों में भी यही दृश्य देखने को मिला. ठाकुर स्वयं जुलूस में शामिल हुए, आम लोगों की कलाई पर राखी बांधी और एक मस्जिद में मौलवियों तक पहुँचे. यह दृश्य औपनिवेशिक सत्ता के लिए असहज करने वाला था—एक ऐसा विरोध जो नारा नहीं, बल्कि स्नेह और एकता का प्रतीक था. इतिहासकार ए. मजूमदार ने अपनी पुस्तक Tagore by Fireside में लिखा है कि ठाकुर ने रक्षाबंधन की धार्मिक परंपरा को विविधता में एकता के धर्मनिरपेक्ष प्रतीक में बदल दिया और बंग-भंग का डटकर मुकाबला किया.

1905 में बंटा गया था बंगाल

यह आंदोलन तात्कालिक रूप से विभाजन रोकने में सफल नहीं हुआ. बंगाल 1905 में बंट गया. लेकिन छह साल बाद 1911 में व्यापक विरोध के आगे ब्रिटिश सरकार को विभाजन रद्द करना पड़ा. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि रक्षाबंधन का अर्थ बदल गया. यह त्योहार व्यक्तिगत रिश्ते से आगे बढ़कर सामाजिक भाईचारे और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गया. शांतिनिकेतन में आज भी इस परंपरा को याद किया जाता है, जहां छात्र-छात्राएं आम लोगों को राखी बांधकर सद्भाव का संदेश देते हैं.

भारत एक्सप्रेस



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