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‘इतिहास सिर्फ पढ़ा नहीं जाएगा, महसूस भी होगा…!’ ‘कला संकुल’ में गूंजी ‘आजादी के सिंदूरी रंग’ की हुंकार

दिल्ली के कला संकुल में संस्कार भारती की मासिक मंचीय कला संगोष्ठी में नाटक ‘आजादी के सिंदूरी रंग’ पर परिचर्चा और जीवंत पाठ हुआ. रंगकर्मियों ने कला को राष्ट्रीय चेतना और युवा पीढ़ी को इतिहास का सशक्त माध्यम बताया.

Kala Sankul

कला संकुल दिल्ली में ‘आजादी के सिंदूरी रंग’ पर परिचर्चा हुई

राजधानी दिल्ली स्थित ‘कला संकुल’ में उस वक्त देशभक्ति, रंगमंच और भारतीय सांस्कृतिक चेतना का एक अद्भुत और भावपूर्ण समागम देखने को मिला, जब संस्कार भारती द्वारा आयोजित मासिक मंचीय कला संगोष्ठी की शाम पूरी तरह ‘राष्ट्रप्रेम के रंगों’ में रंग गई. अवसर था वरिष्ठ रंगकर्मी, नाटककार, निर्देशक एवं पत्रकार आलोक शुक्ला के बहुचर्चित नाटक ‘आजादी के सिंदूरी रंग’ पर आयोजित परिचर्चा और इसके सबसे महत्वपूर्ण अंशों के जीवंत पाठ का. तो बता दें कि मंच पर कलाकारों के संवाद और संवेदनाओं ने भारत के स्वाधीनता आंदोलन की अमर स्मृतियों और राष्ट्रनायकों के अतुलनीय त्याग को दर्शकों के सामने जीवंत कर दिया.

दीप प्रज्वलन और देशभक्ति गीत से हुआ शंखनाद

संस्कार भारती की इस प्रतिष्ठित संगोष्ठी का औपचारिक शुभारंभ मुख्य अतिथि आलोक शुक्ला, अखिल भारतीय मंत्री संजय चौधरी और क्षेत्रीय संगठन मंत्री विजय कुमार द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलन कर किया गया. इसके तुरंत बाद श्रीमती अर्पणा जायसवाल ने देशभक्ति गीत की ऐसी सुरम्य और भावुक प्रस्तुति दी कि पूरा ‘कला संकुल’ परिसर राष्ट्रप्रेम के गौरव और चेतना से सराबोर हो उठा.

यह भी बताते चलें कि नाटक ‘आजादी के सिंदूरी रंग’ के निर्देशक सुनील चौहान और साक्षी चौहान की देखरेख में कलाकारों ने नाटक के अंशों का ऐसा प्रभावी पाठ किया कि दर्शक भाव-विभोर हो गए.

वक्ताओं ने कला को लेकर एक सुर में क्या बोला?

संगोष्ठी में हिस्सा लेते हुए कला जगत के दिग्गजों ने सर्वसम्मति से कहा कि रंगमंच केवल मनोरंजन की विधा नहीं है, बल्कि यह समाज की सुप्त संवेदनाओं को जगाने और राष्ट्रीय चेतना को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का सबसे सशक्त माध्यम है.

संस्कार भारती के क्षेत्रीय संगठन मंत्री विजय कुमार और अखिल भारतीय मंत्री संजय चौधरी ने भारतीय कला दृष्टि की समग्रता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब कला इतिहास को अपनी गोद में लेकर मंच पर उतरती है, तब इतिहास केवल पन्नों पर पढ़ा नहीं जाता बल्कि हर दर्शक उसे अपने दिल में महसूस करता है.

‘देशभर में होना चाहिए आजादी के सिंदूरी रंग का मंचन’

चर्चा के दौरान वक्ताओं ने एक स्वर में माना कि आलोक शुक्ला द्वारा रचित ‘आजादी के सिंदूरी रंग’ जैसा नाटक न सिर्फ देशभक्ति की भावना से लबरेज है, बल्कि आज के दौर में समाज को सही सांस्कृतिक दिशा दिखाने में पूरी तरह सक्षम है. अतिथियों ने जोर देकर कहा कि ऐसे राष्ट्रभक्तिपूर्ण नाटकों का मंचन केवल दिल्ली तक सीमित न रहकर देश के कोने-कोने में होना चाहिए ताकि युवा पीढ़ी अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ सके.

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कार्यक्रम को सफल बनाने में इनका रहा योगदान

संस्कार भारती के इस भव्य मंच का बेहद सुचारू और प्रभावी संचालन कुलदीप शर्मा ने किया, जबकि कार्यक्रम के समापन पर औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन विश्वदीप शर्मा द्वारा प्रस्तुत किया गया. इस पूरी संगोष्ठी को ऐतिहासिक और सफल बनाने में संगोष्ठी टोली के सदस्यों-श्रुति सिन्हा, ऋतम्भरा, बृजेश, राज उपाध्याय, मृत्युंजय, सुशांक और विजेंद्र का सराहनीय योगदान रहा. कला और राष्ट्रभाव के इस समागम ने दिल्ली के रंगकर्मियों के बीच एक नई ऊर्जा और उत्साह का संचार किया है.

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-भारत एक्सप्रेस



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