नया चंडीगढ़: कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे एक 10 साल के बच्चे के लिए उसकी 17 वर्षीय बड़ी बहन किसी फरिश्ते से कम साबित नहीं हुई. बहन ने अपने स्टेम सेल दान कर छोटे भाई की जिंदगी बचाने में अहम भूमिका निभाई. इसी के साथ नया चंडीगढ़ स्थित होमी भाभा कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र (HBCH&RC) में पहला सफल एलोजेनिक बोन मैरो ट्रांसप्लांट (BMT) भी पूरा हुआ है.
क्या थी पूरी बीमारी और कैसे शुरू हुआ सफर?
पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर का रहने वाला यह 107 वर्षीय मासूम बच्चा इस साल अप्रैल के महीने में खतरनाक ब्लड कैंसर की चपेट में आ गया था. बीमारी एक बार फिर से लौट आई थी, जिसे मेडिकल भाषा में रिलैप्स कहते हैं. परिवार के पैरों तले जमीन खिसक चुकी थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. बेहतर इलाज की उम्मीद में परिवार पंजाब पहुंचा और टाटा मेमोरियल सेंटर के इस प्रतिष्ठित अस्पताल में भर्ती हुआ.
अस्पताल में डॉक्टरों ने पहले कीमोथेरेपी के जरिए बीमारी को काबू में किया. लेकिन डॉक्टरों का मानना था कि कैंसर के दोबारा लौटने के खतरे को हमेशा के लिए खत्म करने का एकमात्र पक्का इलाज ‘एलोजेनिक स्टेम सेल ट्रांसप्लांट’ ही था. इसमें मरीज के खराब बोन मैरो को किसी स्वस्थ इंसान के स्टेम सेल से बदला जाता है.
डोनर की तलाश शुरू हुई तो राहत की सांस तब आई जब मेडिकल जांच में पता चला कि मरीज की 17 साल की बड़ी बहन का बोन मैरो उसके भाई से पूरी तरह मैच कर रहा है. डॉक्टरों ने बिना वक्त गंवाए बहन के शरीर से स्टेम सेल कलेक्ट किए और एक साधारण सी प्रक्रिया के जरिए भाई के शरीर में ट्रांसप्लांट कर दिए.
बाल हेमेटोलॉजिस्ट-ऑन्कोलॉजिस्ट और BMT एक्सपर्ट डॉ. जसमीत सिद्धू ने बताया कि ट्रांसप्लांट के बाद बच्चे की कड़ी निगरानी रखी गई. नई कोशिकाएं उसके शरीर में सफलतापर्वक ढल गईं और अब बच्चा बिल्कुल स्वस्थ है. मंगलवार को जब उसे अस्पताल से छुट्टी दी गई, तो उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी. हालांकि, डॉक्टर अभी भी कुछ समय तक उसकी सेहत पर पूरी नजर बनाए रखेंगे.
अस्पताल की बड़ी उपलब्धि और आर्थिक मदद
मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. सीमा गुलिया ने बताया कि इस तरह के जटिल ट्रांसप्लांट के लिए गजब की प्लानिंग, इंफेक्शन से बचाव और बेहतरीन टीम वर्क की जरूरत होती है. उन्होंने यह भी साफ किया कि इस अस्पताल में कैंसर का इलाज बेहद कम खर्च पर किया जाता है, ताकि किसी गरीब परिवार को पैसे की कमी की वजह से अपनों को न खोना पड़े.
अस्पताल के निदेशक डॉ. आशीष गुलिया ने इस सफलता को सिर्फ एक मेडिकल कामयाबी नहीं बल्कि इंसानियत की एक बेहद खूबसूरत मिसाल बताया. उन्होंने कहा कि जब कोई परिवार जिंदगी के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा होता है, तो उन्नत तकनीक और सही उम्मीद उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं होती.
खास बात यह है कि इस परिवार को आर्थिक तंगी से बचाने के लिए अस्पताल की सोशल वर्क टीम ने सरकारी योजनाओं और सीएसआर फंड की मदद से 14 लाख रुपये से ज्यादा का वित्तीय सहयोग जुटाया. इसके अलावा, इलाज के दौरान परिवार को रहने में कोई परेशानी न हो, इसलिए अस्पताल की धर्मशाला में उनके ठहरने का शानदार इंतजाम भी किया गया.
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-भारत एक्सप्रेस
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