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सीने पर खाईं 5 गोलियां, फिर भी कब्जे में लिए पाक के टैंक: पढ़ें महावीर चक्र विजेता मेजर आशाराम त्यागी की अमर गाथा

1965 के भारत-पाक युद्ध में डोगरई की जंग के हीरो और महावीर चक्र विजेता मेजर आशाराम त्यागी का बलिदान अमर है. शरीर में 5 गोलियां लगने के बावजूद उन्होंने पाकिस्तानी टैंकों को तबाह कर डोगरई पर तिरंगा फहराया था.

Maha Vir Chakra Major Asharam Tyagi The Hero of Dograi 1965 War Bharat Express

Maha Vir Chakra Major Asharam Tyagi

Edited by Vaibhav Gupta

Maha Vir Chakra Major Asharam Tyagi: जिस कौम के पास अमर शहीद मेजर आशाराम त्यागी महावीर चक्र विजेता की शहादत की विरासत हो, उसे किसी और में अपना आइकॉन ढूंढने की क्या जरूरत? यह प्रश्न सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि हमारी सैन्य परंपरा और जातीय गौरव का जीवंत प्रमाण है. 21 सितंबर 1965 की रात डोगरई के मैदान में जिस बहादुरी का प्रदर्शन मेजर आशाराम त्यागी ने किया, वह पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा.

मेजर आसाराम (आशाराम) त्यागी का जन्म 2 जनवरी 1939 को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले (तब मुरदनगर क्षेत्र) के फतेहपुर गांव में श्री सागुवा सिंह के घर हुआ था. 17 दिसंबर 1961 को वे भारतीय सेना की 3 जाट बटालियन में कमीशंड हुए. मात्र 26 वर्ष की आयु में उन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध में ऐसी वीरता दिखाई कि इतिहास उनके नाम को हमेशा याद रखेगा.

डोगरई की रात: टैंकों की कब्रगाह और अदम्य साहस

21-22 सितंबर 1965 की रात, 3 जाट बटालियन को पाकिस्तान के डोगरई गांव पर कब्जा करने का कठिन कार्य सौंपा गया था. यह गांव लाहौर के निकट इच्छोगिल नहर के पार स्थित रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान था. टैंकों का एक ट्रूप, पिलबॉक्स, रिकॉइललेस गन और अच्छी तरह से छिपे हुए सैनिकों के साथ दुश्मन की स्थिति मजबूत थी.

‘ए’ कंपनी की कमान संभाल रहे मेजर आशाराम त्यागी ने व्यक्तिगत रूप से अग्रिम प्लाटून का नेतृत्व किया. हमले के दौरान उनके दाहिने कंधे में दो गोलियां लगीं. घायल होने के बावजूद वे रुके नहीं. उन्होंने दुश्मन के टैंकों पर आगे बढ़कर हैंड ग्रेनेड से टैंक क्रू को नष्ट किया और दो टैंकों को ज्यों का त्यों कब्जे में ले लिया. इस प्रक्रिया में उन्हें तीन और गोलियां लगीं, फिर भी वे बेहोश होने तक अपनी कंपनी का नेतृत्व करते रहे. उनकी इस असाधारण वीरता से प्रेरित होकर जवानों ने लक्ष्य पर कब्जा कर लिया.

बाद में उन्हें सैन्य अस्पताल पहुंचाया गया, जहां 25 सितंबर 1965 को वे शहीद हो गए. उनके अंतिम शब्दों में से एक यह कहा जाता है कि साथियों से कहा, ‘मेरी मां को बता देना कि उसके बेटे ने सीने पर गोली खाई है.’ यह वाक्य उनके चरित्र की पूरी तस्वीर पेश करता है.

इस अदम्य साहस, नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया.

मेरठ की स्मृति और प्रेरणा

पाक युद्ध के तुरंत बाद मेरठ के भैसाली बस स्टैंड पर मेजर आशाराम त्यागी सहित तीन शहीद सैनिकों के चित्र लगाए गए थे. वे चित्र सिर्फ याद नहीं, बल्कि रोजाना गुजरने वाले हर व्यक्ति के लिए प्रेरणा का स्रोत बने. आज भी गाजियाबाद, मोदीनगर और आसपास के क्षेत्रों में उनकी प्रतिमाएं और स्मृति स्थल उनकी शहादत को जीवित रखते हैं. 2023 में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल ने भी उनकी प्रतिमा का अनावरण कर उन्हें नमन किया था.

विरासत जो हमें याद दिलाती है

मेजर आशाराम त्यागी सिर्फ एक जाट योद्धा नहीं थे. वे भारतीय सेना की उस परंपरा के प्रतीक हैं जिसमें व्यक्तिगत सुरक्षा से ऊपर देश की रक्षा होती है. जाट रेजिमेंट का नारा ‘जाट बलवान, जय भगवान’ उनके जीवन और बलिदान में साकार हुआ. डोगरई की लड़ाई में 3 जाट ने दुश्मन की अच्छी तरह से सुसज्जित ताकत को पछाड़कर इतिहास रच दिया. इस लड़ाई में कई वीर शहीद हुए, जिनमें मेजर आशाराम त्यागी और कैप्टन कपिल सिंह थापा जैसे नाम प्रमुख हैं.

आज जब हम 21 सितंबर को उनके बलिदान दिवस को याद करते हैं, तो यह सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि एक संकल्प भी है. जिस कौम के पास ऐसे अमर शहीद की विरासत हो, उसे किसी बाहरी आइकॉन की जरूरत नहीं. मेजर आशाराम त्यागी जैसे वीर ही हमारे सच्चे नायक हैं, जो सीने पर गोली खाकर भी आगे बढ़ते रहे और देश को विजय दिलाई.

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-भारत एक्सप्रेस



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