बनारस को आमतौर पर मंदिरों, घाटों, गलियों और मोक्ष की नगरी के तौर पर देखा जाता है. गंगा किनारे बसे इस शहर की तस्वीर में मणिकर्णिका घाट की जलती चिताएं भी हमेशा मौजूद रहती हैं. लेकिन इन चिताओं के आसपास की दुनिया में कौन लोग रहते हैं? उनकी जिंदगी कैसी है? वे किन मुश्किलों से गुजरते हैं और उनके अपने सपने क्या हैं?
राधिका आयंगर की चर्चित किताब Fire on the Ganges: Life Among the Dead in Banaras का हिंदी रूपांतरण बनारस का मसान इन्हीं सवालों के बीच ले जाता है. उषा देशपांडे ने इसका हिंदी अनुवाद किया है. किताब बनारस के डोम समुदाय के जीवन को करीब से देखने की कोशिश करती है ऐसे समुदाय को, जिसकी भूमिका अंतिम संस्कार की परंपरा में बेहद अहम है, लेकिन सामाजिक व्यवस्था में जिसे लंबे समय तक हाशिये पर रखा गया.
बनारस में डोम समुदाय का काम सदियों पुरानी अंतिम संस्कार की परंपरा से जुड़ा है. मणिकर्णिका घाट पर चिता जलाने के लिए जिस आग का इस्तेमाल होता है, उसे लेकर धार्मिक मान्यता है कि यह पवित्र अग्नि है और डोम समुदाय इसके संरक्षक हैं. हिंदू परंपरा में इसे मोक्ष से भी जोड़ा जाता है.
यहीं इस समुदाय की जिंदगी का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है. जिन लोगों के बिना अंतिम संस्कार की यह व्यवस्था पूरी नहीं होती, वही लोग सामाजिक भेदभाव और छुआछूत का सामना करते रहे हैं. यानी एक तरफ धार्मिक कर्मकांड में उनकी भूमिका जरूरी है, तो दूसरी तरफ समाज का एक बड़ा हिस्सा उन्हें बराबरी का दर्जा देने से बचता रहा है.
आयंगर की किताब इसी विरोधाभास को किसी भाषण या बड़े दावे के बजाय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी के जरिए सामने रखती है.
चंद घाट की गलियों से सामने आती असली तस्वीर
किताब का बड़ा हिस्सा चंद घाट की बस्ती और वहां रहने वाले लोगों के इर्द-गिर्द घूमता है. यहां रहने वाले लोग केवल अपनी जाति या पेशे से पहचाने जाने वाले चेहरे नहीं हैं. उनके भी रिश्ते हैं, प्रेम है, गुस्सा है, महत्वाकांक्षाएं हैं और बेहतर जिंदगी की चाहत है.
डॉली चौधरी की कहानी इसका खास उदाहरण है. एक विधवा होने के बावजूद वह अपने बच्चों की जिम्मेदारी उठाती हैं और अपना कारोबार खड़ा करने की कोशिश करती हैं. उनके लिए जिंदगी सिर्फ गुजारा करने का नाम नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश भी है.
इसी तरह उनके भाई लक्ष्य का एक ऊंची जाति की लड़की कोमल से प्रेम सामाजिक दीवारों की ओर ध्यान खींचता है. दूसरी तरफ भोला पढ़ाई करके अपनी जिंदगी बदलना चाहता है और लुधियाना विश्वविद्यालय तक पहुंचने का सपना देखता है.
आकाश, मोहन और शॉर्टकट जैसे दूसरे किरदार भी इसी दुनिया के अलग-अलग रंग दिखाते हैं. इनकी कहानियां यह समझने में मदद करती हैं कि किसी समुदाय को केवल उसके पेशे से परिभाषित करना कितना अधूरा नजरिया हो सकता है.
गरीबी सिर्फ पैसों की कमी नहीं
किताब में गरीबी का एक ऐसा चेहरा दिखाई देता है, जो अक्सर शहरों की चमकदार तस्वीरों के पीछे छिप जाता है. बच्चों का कफन बीनना, चिता की राख में से धातु के टुकड़े तलाशना और उन्हें बेचकर पैसे कमाना—ये काम उनकी मजबूरी का हिस्सा बन जाते हैं.
इसके साथ नशा, बेरोजगारी और रोजमर्रा का अपमान भी जिंदगी को मुश्किल बनाते हैं. महिलाओं की स्थिति और भी जटिल है. उन्हें जातिगत भेदभाव के साथ-साथ परिवार और समाज की पितृसत्तात्मक सोच का भी सामना करना पड़ता है.
ऐसे माहौल में डॉली जैसी महिला का अपना काम खड़ा करने की कोशिश करना सिर्फ आर्थिक गतिविधि नहीं रह जाता. यह अपने लिए जगह बनाने और समाज की तय सीमाओं को चुनौती देने की कोशिश भी बन जाता है.
पुराने बनारस और बदलते भारत के बीच
बनारस का मसान सिर्फ अतीत की कहानी नहीं है. किताब में बदलता हुआ बनारस भी दिखाई देता है. कोविड महामारी के दौरान शवों की बढ़ती संख्या, इलेक्ट्रिक श्मशान का दोबारा इस्तेमाल और काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर जैसी घटनाएं इस दुनिया के बीच मौजूद रहती हैं.
एक तरफ शहर तेजी से बदल रहा है. नई सड़कें, नए प्रोजेक्ट और धार्मिक पर्यटन का विस्तार हो रहा है. दूसरी तरफ कुछ समुदाय आज भी उन्हीं सामाजिक और आर्थिक मुश्किलों से जूझ रहे हैं, जिनकी जड़ें बहुत पुरानी हैं.
यही फर्क किताब को सिर्फ एक समुदाय की कहानी से आगे ले जाता है. यह सवाल खड़ा करता है कि जिस विकास की चर्चा पूरे देश में होती है, उसमें उन लोगों की जगह कहां है जो शहर की सबसे पुरानी और कठिन जिम्मेदारियों को निभाते आए हैं?
पत्रकारिता, शोध और इंसानी रिश्तों का मेल
राधिका आयंगर ने इस किताब को तैयार करने में करीब सात-आठ साल शोध, बातचीत और चंद घाट की बस्ती में समय बिताने में लगाए. इसलिए किताब में सिर्फ आंकड़े या बाहरी नजर से लिखी गई रिपोर्ट नहीं मिलती. लोगों की आवाजें और उनके अनुभव इसके केंद्र में हैं.
आयंगर खुद कहानी की मुख्य पात्र बनने के बजाय एक पर्यवेक्षक की भूमिका में रहती हैं. वह पाठक को उन गलियों और घाटों तक ले जाती हैं, जहां धुएं, गर्मी और चिताओं के बीच लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी चलती रहती है.
किताब के कुछ हिस्सों में शोध और अकादमिक चर्चा अपेक्षाकृत भारी लग सकती है, लेकिन व्यक्तिगत कहानियां इसे फिर से जमीन से जोड़ देती हैं. प्रेम, परिवार, शिक्षा, कारोबार और बेहतर भविष्य की उम्मीद जैसे अनुभव पाठक को इन लोगों के और करीब ले आते हैं.
आखिर क्यों पढ़ी जानी चाहिए यह किताब?
बनारस का मसान पढ़ते हुए बनारस की एक ऐसी तस्वीर सामने आती है, जो आम पर्यटक की नजर से शायद ही दिखाई दे. यह सिर्फ मृत्यु और श्मशान की कहानी नहीं है. इसके केंद्र में वे लोग हैं जो हर दिन मौत के सबसे करीब रहते हुए भी अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं.
किताब जाति व्यवस्था, सामाजिक असमानता और लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दों को सामने रखती है, लेकिन सिर्फ समस्याएं गिनाकर रुक नहीं जाती. डॉली, भोला और दूसरे किरदारों के जरिए यह भी दिखाती है कि शिक्षा, काम, रिश्ते और व्यक्तिगत हिम्मत किसी इंसान के लिए बदलाव की शुरुआत बन सकते हैं.
आंचल मल्होत्रा ने किताब को मानवता, आत्मीयता, उम्मीद और धैर्य से जुड़ी मौखिक इतिहास की महत्वपूर्ण रचना बताया है. इस नजरिए से देखें तो बनारस का मसान सिर्फ डोम समुदाय का दस्तावेज नहीं, बल्कि उस समाज का आईना भी है जिसमें कुछ लोग दिखाई बहुत कम देते हैं, जबकि हमारी कई परंपराएं उनके श्रम पर टिकी हुई हैं.
उषा देशपांडे का हिंदी अनुवाद इस कहानी को हिंदी पाठकों तक पहुंचाने का रास्ता खोलता है. अगर बनारस की आपकी पहचान सिर्फ मंदिरों, गंगा और घाटों तक सीमित रही है, तो यह किताब उस शहर की एक बिल्कुल अलग परत सामने रखती है.
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