उत्तर प्रदेश की राजनीति को अगर पिछले तीन दशक के नजरिए से देखा जाए, तो कल्याण सिंह से योगी आदित्यनाथ तक का सफर सिर्फ मुख्यमंत्री बदलने की कहानी नहीं है. यह उस राजनीतिक बदलाव की कहानी है, जिसमें विचारधारा, जातीय समीकरण, धार्मिक मुद्दे, संगठन की ताकत, नेतृत्व की शैली और मतदाताओं की बदलती उम्मीदें सब एक-दूसरे से जुड़ते चले गए.
आज जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी का प्रभाव चर्चा में रहता है, तो उसकी जड़ें केवल 2017 में खोजने से तस्वीर अधूरी रह जाएगी. इसके पीछे 1990 के दशक की राजनीति, राम जन्मभूमि आंदोलन, मंडल के बाद बदले सामाजिक समीकरण और गैर-यादव पिछड़ी जातियों तक पहुंच बनाने की कोशिशों का लंबा दौर है.
इसी संदर्भ में कल्याण सिंह और योगी आदित्यनाथ दो अलग-अलग दौर के महत्वपूर्ण चेहरे दिखाई देते हैं. कल्याण सिंह उस समय उभरे, जब बीजेपी उत्तर प्रदेश में अपनी जगह तेजी से बना रही थी. योगी आदित्यनाथ उस दौर के नेता हैं, जब पार्टी पहले से स्थापित संगठन और व्यापक सामाजिक आधार के साथ सत्ता को लंबे समय तक बनाए रखने की कोशिश करती दिखाई देती है.
इसे किसी छिपी हुई ‘30 साल की योजना’ के रूप में देखना शायद जरूरत से ज्यादा सरल निष्कर्ष होगा. लेकिन तीन दशकों की घटनाओं को जोड़कर देखें, तो बीजेपी की राजनीति में एक बात साफ दिखाई देती है. पार्टी ने अपने मूल राजनीतिक संदेश को बनाए रखते हुए उसे अलग-अलग समय और सामाजिक परिस्थितियों के मुताबिक नए तरीके से पेश किया.
शुरुआत में कल्याण सिंह क्यों इतने महत्वपूर्ण थे?
उत्तर प्रदेश में बीजेपी की पहली बड़ी सत्ता-स्थापना के दौर में कल्याण सिंह का नाम सबसे आगे आता है. वह 24 जून 1991 को पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और 6 दिसंबर 1992 तक इस पद पर रहे. बाद में वह 21 सितंबर 1997 से 12 नवंबर 1999 तक दूसरी बार मुख्यमंत्री रहे. उत्तर प्रदेश विधान परिषद की आधिकारिक सूची में उनके दोनों कार्यकाल दर्ज हैं. 1991 का विधानसभा चुनाव इस लिहाज से खास था. उत्तर प्रदेश की 425 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी ने 221 सीटें जीती थीं. सरकारी प्रकाशन में भी इस चुनाव और कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री बनने का उल्लेख मिलता है. लेकिन कल्याण सिंह की अहमियत सिर्फ इतनी नहीं थी कि वह बीजेपी के मुख्यमंत्री बने.
उनकी राजनीतिक पहचान ने पार्टी को एक ऐसे सामाजिक समूह तक पहुंच बनाने में मदद की, जहां उस समय तक बीजेपी की पकड़ उतनी मजबूत नहीं मानी जाती थी. वह लोढ़ी समुदाय से आने वाले पिछड़ी जाति के नेता थे और बीजेपी के व्यापक हिंदुत्व राजनीतिक संदेश के साथ उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि ने पार्टी के विस्तार को एक अलग आयाम दिया.
यह वह समय था जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति और धर्म दोनों ही बेहद महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दे बन चुके थे. मंडल आयोग की राजनीति ने पिछड़ी जातियों की राजनीतिक भागीदारी को नई ताकत दी थी. दूसरी तरफ राम जन्मभूमि आंदोलन ने हिंदुत्व को चुनावी राजनीति के केंद्र में ला दिया था.
बीजेपी के सामने चुनौती यह थी कि वह केवल अपने पारंपरिक समर्थक वर्ग तक सीमित न रहे. कल्याण सिंह जैसे नेता इस विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हुए.
राम मंदिर आंदोलन और सत्ता का सीधा संबंध
कल्याण सिंह का पहला मुख्यमंत्री कार्यकाल राम जन्मभूमि आंदोलन के सबसे निर्णायक दौर से जुड़ा हुआ था. 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ और उसी दिन कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. उत्तर प्रदेश सरकार के एक आधिकारिक प्रकाशन में भी इस घटनाक्रम का उल्लेख है. इस घटना ने उत्तर प्रदेश की राजनीति पर लंबे समय तक असर डाला. बीजेपी के लिए राम मंदिर आंदोलन केवल एक चुनावी मुद्दा नहीं रहा, बल्कि पार्टी की पहचान और राजनीतिक विस्तार का एक प्रमुख हिस्सा बन गया.
हालांकि इसके बाद की कहानी सीधी नहीं थी. कल्याण सिंह के इस्तीफे के बाद उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन आया. 1993 में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की सरकार बनी. बीजेपी विधानसभा में सबसे बड़े दलों में रही, लेकिन सत्ता में नहीं आ सकी.
यहीं से उत्तर प्रदेश की राजनीति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू जातीय गठबंधन सामने आता है.
मंडल के बाद सपा-बसपा का उभार और बीजेपी की चुनौती
1990 के दशक में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में अलग-अलग सामाजिक समूहों को राजनीतिक आवाज दी. यादव, अन्य पिछड़ी जातियां, दलित और सामाजिक न्याय की राजनीति धीरे-धीरे चुनावी मुकाबलेजेपी के सामने अब केवल कांग्रेस से मुकाबला नहीं था. के केंद्र में आ गई.
बीजेपी के सामने अब केवल कांग्रेस से मुकाबला नहीं था. राज्य की राजनीति बहुकोणीय हो चुकी थी.
इस दौर में एक महत्वपूर्ण सबक यह था कि केवल धार्मिक या वैचारिक मुद्दे के सहारे लंबे समय तक चुनावी सफलता की गारंटी नहीं मिल सकती. संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करना, अलग-अलग जातीय समूहों तक पहुंच बनाना और स्थानीय नेतृत्व तैयार करना भी उतना ही जरूरी था.
कल्याण सिंह का दूसरा मुख्यमंत्री कार्यकाल भी इसी जटिल राजनीति का उदाहरण था. 21 सितंबर 1997 को वह फिर मुख्यमंत्री बने. यह सरकार बहुजन समाज पार्टी के समर्थन से बनी थी, लेकिन समर्थन ज्यादा समय तक नहीं चला. इसके बाद राजनीतिक जोड़-तोड़ और विधायकों के समर्थन के जरिए सरकार को बचाया गया. कल्याण सिंह का दूसरा कार्यकाल 12 नवंबर 1999 तक चला.
इस पूरे दौर ने बीजेपी को यह समझने का मौका दिया कि उत्तर प्रदेश में सत्ता सिर्फ बड़े चुनावी मुद्दों से नहीं चलती. यहां संगठन, गठबंधन, सामाजिक समीकरण और विधायक स्तर की राजनीति भी निर्णायक भूमिका निभाती है.
कल्याण सिंह के बाद बीजेपी का रास्ता आसान नहीं था
आज पीछे मुड़कर देखने पर ऐसा लग सकता है कि 1990 के दशक की बीजेपी की सफलता सीधे 2017 तक चली गई. वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल थी.
कल्याण सिंह के बाद बीजेपी को उत्तर प्रदेश में कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखने पड़े. राज्य में अलग-अलग सरकारें बनीं. मायावती, मुलायम सिंह यादव और बाद में अखिलेश यादव जैसे नेता अपने-अपने सामाजिक गठबंधनों के साथ मजबूत होते गए.
उत्तर प्रदेश विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक कल्याण सिंह के दूसरे कार्यकाल के बाद राम प्रकाश गुप्त और राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बने. इसके बाद मायावती, मुलायम सिंह यादव और फिर अखिलेश यादव के नेतृत्व में अलग-अलग सरकारें आईं. अखिलेश यादव का कार्यकाल 19 मार्च 2017 तक रहा, जब योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद संभाला.
च बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी अपनी विचारधारा और पुराने समर्थन आधार को बनाए रखते हुए नए सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाना.
यानी सवाल केवल यह नहीं था कि बीजेपी किस मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी. सवाल यह भी था कि वह उत्तर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों, जातियों और वर्गों में अपना संगठन कैसे फैलाएगी.
फिर आया 2017 का बड़ा बदलाव
2017 का विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ था. बीजेपी ने भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की और योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया.
खास बात यह थी कि चुनाव से पहले बीजेपी ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में घोषित नहीं किया था. चुनाव के बाद पार्टी ने उन्हें राज्य की कमान सौंपी.
योगी का राजनीतिक सफर भी पारंपरिक प्रशासनिक नेता जैसा नहीं था. वह गोरखनाथ मठ से जुड़े धार्मिक नेतृत्व के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे और लंबे समय तक गोरखपुर से लोकसभा सांसद रहे थे. इसलिए उनके मुख्यमंत्री बनने के साथ उत्तर प्रदेश की बीजेपी राजनीति में एक ऐसा नेतृत्व सामने आया, जिसकी पहचान हिंदुत्व, धार्मिक नेतृत्व और राजनीतिक सक्रियता—तीनों से जुड़ी थी.
यहीं से कल्याण सिंह और योगी आदित्यनाथ के बीच एक दिलचस्प राजनीतिक समानता और अंतर दिखाई देता है.
कल्याण सिंह ने बीजेपी के उस दौर का प्रतिनिधित्व किया, जब पार्टी को उत्तर प्रदेश में विस्तार के लिए हिंदुत्व के साथ पिछड़ी जाति के नेतृत्व को जोड़ना था. योगी के दौर में पार्टी पहले ही एक बड़ा सामाजिक और संगठनात्मक आधार बना चुकी थी. अब जोर सत्ता के संचालन, प्रशासनिक नियंत्रण, कानून-व्यवस्था, विकास और कल्याणकारी योजनाओं को अपनी राजनीतिक पहचान के साथ जोड़ने पर भी था.
योगी का मॉडल सिर्फ विचारधारा तक सीमित नहीं रहा
योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने अपनी राजनीति को केवल धार्मिक पहचान के मुद्दों तक सीमित नहीं रखा. सरकारी संचार में कानून-व्यवस्था, बुनियादी ढांचे, निवेश, कल्याणकारी योजनाओं और प्रशासनिक फैसलों को लगातार प्रमुखता दी गई है. उत्तर प्रदेश सरकार का सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग आज भी मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में लिए गए कैबिनेट फैसलों और विकास संबंधी कार्यक्रमों को नियमित रूप से प्रकाशित करता है.
यही बदलाव महत्वपूर्ण है.
1990 के दशक की राजनीति में आंदोलन और पहचान बड़े राजनीतिक शब्द थे. 2017 के बाद इन्हीं के साथ शासन और डिलीवरी की भाषा ज्यादा स्पष्ट रूप से जुड़ती दिखाई देती है.
मतलब यह कि मतदाता से सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं था कि पार्टी किस विचारधारा के साथ खड़ी है. सरकार को यह भी दिखाना था कि वह सड़क, बिजली, कानून-व्यवस्था, सरकारी योजनाओं और प्रशासन के स्तर पर क्या कर रही है.
इसी मिश्रण ने योगी की राजनीतिक पहचान को आकार दिया.
2022 में दूसरी बार सत्ता ने बदली तस्वीर
योगी आदित्यनाथ की पहली सरकार के बाद 2022 का विधानसभा चुनाव एक और महत्वपूर्ण पड़ाव बना. बीजेपी ने फिर सरकार बनाई और योगी ने 25 मार्च 2022 को दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. उत्तर प्रदेश के आधिकारिक रिकॉर्ड में उनका पहला कार्यकाल 19 मार्च 2017 से 25 मार्च 2022 और दूसरा कार्यकाल 25 मार्च 2022 से वर्तमान तक दर्ज है. यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक लगातार सत्ता में बने रहना आसान नहीं रहा है. अलग-अलग दौर में मतदाताओं ने सरकारें बदली हैं और कई राजनीतिक दलों को सत्ता से बाहर किया है.
2022 के बाद योगी की पहचान केवल 2017 में चुने गए मुख्यमंत्री की नहीं रही. वह उत्तर प्रदेश में बीजेपी के लंबे समय के शासन मॉडल का प्रमुख चेहरा बन गए.
क्या कोई ‘30 साल की योजना’ थी?
यह सवाल अक्सर राजनीतिक चर्चाओं में पूछा जाता है. लेकिन उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर यह कहना मुश्किल है कि कल्याण सिंह से लेकर योगी आदित्यनाथ तक किसी एक गुप्त दस्तावेज या पहले से तैयार 30 साल की योजना के तहत सब कुछ हुआ.
इसके बजाय घटनाओं को एक क्रम में देखना ज्यादा उपयोगी है.
पहले बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में वैचारिक और चुनावी आधार बनाया. फिर कल्याण सिंह जैसे पिछड़ी जाति के नेता के जरिए सामाजिक विस्तार की संभावना मजबूत हुई. उसके बाद पार्टी ने सत्ता खोने और गठबंधन राजनीति के दौर से सबक लिए. संगठन का विस्तार हुआ. अलग-अलग जातीय समूहों तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश हुई. और अंततः 2017 में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पार्टी ने एक ऐसा शासन मॉडल पेश किया, जिसमें हिंदुत्व की पहचान के साथ प्रशासन और विकास का संदेश भी जुड़ा हुआ था.
इसे ‘एक योजना’ से ज्यादा ‘लगातार राजनीतिक अनुकूलन’ कहना ज्यादा सटीक होगा.
उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने के लिए यह बात खास तौर पर ध्यान में रखनी होगी कि हिंदुत्व की राजनीति के बढ़ने का मतलब जाति की राजनीति का खत्म हो जाना नहीं है.
जाति आज भी चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है. फर्क यह है कि पार्टियां जातीय पहचान को बड़े राजनीतिक गठबंधनों के भीतर रखने की कोशिश करती हैं.
समाजवादी पार्टी ने लंबे समय तक यादव और मुस्लिम समर्थन के साथ अपनी राजनीतिक पहचान बनाई. बहुजन समाज पार्टी ने दलित राजनीति को केंद्र में रखा. बीजेपी ने गैर-यादव पिछड़ी जातियों और गैर-जाटव दलित समूहों सहित अलग-अलग सामाजिक वर्गों तक पहुंच बनाने की रणनीति अपनाई है.
कल्याण सिंह इस बदलाव के शुरुआती महत्वपूर्ण चेहरों में थे. योगी के दौर में यह सामाजिक विस्तार अधिक बड़े संगठनात्मक ढांचे के साथ दिखाई देता है.
इसलिए उत्तर प्रदेश की राजनीति को केवल ‘धर्म बनाम जाति’ के रूप में देखना तस्वीर को बहुत छोटा कर देता है. वास्तविक चुनावी राजनीति में धर्म, जाति, विकास, कल्याणकारी योजनाएं, स्थानीय उम्मीदवार, क्षेत्रीय मुद्दे और राष्ट्रीय राजनीति—सब एक साथ काम करते हैं.
नेतृत्व की शैली में भी आया बदलाव
कल्याण सिंह और योगी आदित्यनाथ के बीच एक और बड़ा अंतर नेतृत्व की शैली का है.
कल्याण सिंह का दौर गठबंधन, आंदोलन और पार्टी के विस्तार का दौर था. उस समय बीजेपी को राज्य की स्थापित राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती देते हुए अपना स्थान बनाना था.
योगी का दौर एक ऐसी पार्टी के शासन का दौर है, जिसके पास पहले से मजबूत संगठन और व्यापक चुनावी आधार है. इसलिए नेतृत्व की प्राथमिकताएं भी अलग दिखाई देती हैं.
योगी की शैली अधिक केंद्रीकृत और स्पष्ट राजनीतिक पहचान वाली रही है. सरकार के फैसलों और प्रशासनिक संदेशों में मुख्यमंत्री की भूमिका प्रमुख दिखाई देती है. उत्तर प्रदेश सरकार की मौजूदा आधिकारिक वेबसाइट भी उन्हें राज्य का मुख्यमंत्री और राज्य विधानमंडल में सदन का नेता बताती है. इसका मतलब यह नहीं कि दोनों नेताओं की राजनीति बिल्कुल एक जैसी थी. बल्कि दोनों अपने-अपने समय की राजनीतिक जरूरतों का प्रतिनिधित्व करते हैं.
असली कहानी ‘विचारधारा से शासन’ तक की है
अगर इस पूरे सफर को एक लाइन में समझना हो, तो कहा जा सकता है कि बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में आंदोलन की राजनीति से शासन की राजनीति तक का लंबा रास्ता तय किया.
कल्याण सिंह के दौर में पार्टी को अपनी पहचान स्थापित करनी थी. राम मंदिर आंदोलन ने उसे एक मजबूत वैचारिक मुद्दा दिया. पिछड़ी जाति के नेतृत्व ने सामाजिक पहुंच का एक नया रास्ता खोला.
बाद के वर्षों में पार्टी ने चुनावी हार, गठबंधन सरकारों और प्रतिद्वंद्वी दलों के मजबूत सामाजिक आधार का सामना किया. इसी दौरान संगठनात्मक रणनीति और सामाजिक गठबंधन पर जोर बढ़ा.
फिर योगी आदित्यनाथ का दौर आया, जिसमें वही राजनीतिक विरासत एक अधिक केंद्रीकृत शासन मॉडल के साथ दिखाई देने लगी.
लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है.
आगे की राजनीति किन सवालों से तय होगी?
उत्तर प्रदेश जैसा विशाल और विविध राज्य किसी एक राजनीतिक फॉर्मूले पर हमेशा नहीं चलता. मतदाताओं की प्राथमिकताएं समय के साथ बदलती रहती हैं. रोजगार, युवाओं के अवसर, किसानों की स्थिति, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, शहरीकरण, कानून-व्यवस्था, सामाजिक प्रतिनिधित्व और सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ ये सभी मुद्दे किसी भी सरकार के सामने बने रहेंगे. इसके अलावा जातीय समीकरण भी लगातार बदलते हैं. नई पीढ़ी के मतदाताओं की प्राथमिकताएं पुराने राजनीतिक अनुभवों से अलग हो सकती हैं. सोशल मीडिया और डिजिटल राजनीति ने भी राजनीतिक संवाद का तरीका बदल दिया है.
इसलिए कल्याण सिंह से योगी आदित्यनाथ तक की यात्रा को किसी अंतिम मुकाम की तरह देखना ठीक नहीं होगा.
यह दरअसल उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीति का एक लंबा अध्याय है.
निष्कर्ष: कोई एक जादुई फॉर्मूला नहीं
कल्याण सिंह से योगी आदित्यनाथ तक बीजेपी का सफर यह बताता है कि बड़ी राजनीतिक सफलता किसी एक चुनाव, एक नेता या एक मुद्दे से नहीं बनती. उसके पीछे कई वर्षों का संगठन, सामाजिक समीकरण, राजनीतिक संदेश और बदलती परिस्थितियों के अनुसार रणनीति में बदलाव होता है.
कल्याण सिंह ने उस दौर में बीजेपी को उत्तर प्रदेश की सत्ता के केंद्र तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जब पार्टी राज्य में तेजी से विस्तार कर रही थी. योगी आदित्यनाथ का दौर उस राजनीतिक आधार को शासन, संगठन और व्यापक चुनावी पहचान के साथ आगे बढ़ाने का दौर है.
दोनों के बीच लगभग तीन दशक का अंतर है और इस दौरान उत्तर प्रदेश कई बार बदला है. मतदाता बदले, पार्टियां बदलीं, गठबंधन बदले और चुनावी मुद्दे भी बदले.
इसलिए ‘कल्याण सिंह से योगी आदित्यनाथ’ की कहानी को किसी गुप्त राजनीतिक स्क्रिप्ट के रूप में देखने के बजाय एक लंबी प्रक्रिया के रूप में समझना ज्यादा उचित है—एक ऐसी प्रक्रिया, जिसमें बीजेपी ने अपने मूल राजनीतिक संदेश को कायम रखते हुए सामाजिक आधार, संगठन और शासन की शैली में लगातार बदलाव किए.
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