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V-A थ्योरी से लेकर टैचीऑन्स तक: जानिए क्यों नोबेल न मिलने के बावजूद अमर हैं वैज्ञानिक ECG सुदर्शन

9 बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित होने के बावजूद नजरअंदाज किए गए महान भारतीय भौतिक विज्ञानी ई.सी.जी. सुदर्शन के क्रांतिकारी सिद्धांतों, V-A थ्योरी और टैचीऑन्स पर आधारित एक विशेष रिपोर्ट.

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Edited by Vaibhav Gupta

एक वैज्ञानिक की विरासत को आप कैसे मापेंगे, जब दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित विज्ञान पुरस्कार उन्हें एक या दो बार नहीं, बल्कि कथित तौर पर पूरे नौ बार नजरअंदाज कर दे? महान भौतिक विज्ञानी एन.सी.जी. सुदर्शन (ई.सी.जी. सुदर्शन) के मामले में, इसका जवाब उनके द्वारा दिए गए उन अद्भुत विचारों और सिद्धांतों में छिपा है जो वह दुनिया के लिए छोड़ गए.

16 सितंबर 1931 को केरल के कोट्टायम जिले के पल्लम में जन्मे एन.सी. जॉर्ज सुदर्शन ने ब्रह्मांड को देखने और समझने के हमारे नजरिए को ही बदल कर रख दिया. मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से स्नातक और मद्रास विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर करने के बाद वे टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (टीआईएफआर) पहुंचे, जहां होमी भाभा के साथ काम करने का अवसर मिला. 1955 में वे अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर गए और रॉबर्ट मार्शक के निर्देशन में पीएच.डी. पूरी की.

क्रांतिकारी सिद्धांत और नोबेल पुरस्कार से अनसुनी दूरी

साल 1957 में, मात्र 26 वर्ष की आयु में, उन्होंने मार्शक के साथ मिलकर वी-ए (V-A) थ्योरी ऑफ वीक इंटरैक्शन्स विकसित की. यह सिद्धांत कमजोर नाभिकीय बल की प्रकृति को स्पष्ट करता था और अधिकतम पैरिटी उल्लंघन की भविष्यवाणी करता था. इसी सिद्धांत ने बाद में इलेक्ट्रोवीक थ्योरी की नींव रखी, जिसके लिए 1979 में शेल्डन ग्लाशो, अब्दुस सलाम और स्टीवन वेनबर्ग को भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला. रिचर्ड फेनमैन ने स्वयं 1963 में स्वीकार किया था कि वी-ए थ्योरी की खोज सुदर्शन और मार्शक ने की थी, जबकि उसे प्रचारित फेनमैन और गेल-मैन ने किया. वेनबर्ग ने भी स्पष्ट कहा कि यह सिद्धांत इलेक्ट्रोवीक एकीकरण की कुंजी था. फिर भी, सुदर्शन और मार्शक को उस सम्मान से वंचित रखा गया.

उनका काम यहीं नहीं रुका. क्वांटम ऑप्टिक्स के क्षेत्र में, 1963 में सुदर्शन ने डायगोनल रिप्रेजेंटेशन (बाद में ग्लॉबर-सुदर्शन पी-रिप्रेजेंटेशन के नाम से जाना गया) विकसित किया. यह गणितीय ढांचा प्रकाश के क्वांटम गुणों को समझने का आधार बना और आज भी वैज्ञानिकों का मार्गदर्शन करता है. 2005 में रॉय ग्लॉबर को इसी क्षेत्र के काम के लिए नोबेल मिला, जबकि सुदर्शन के योगदान को फिर अनदेखा कर दिया गया. सुदर्शन ने खुले तौर पर कहा था कि यह पुरस्कार उनके काम पर आधारित था.

प्रकाश से तेज कणों की परिकल्पना और अन्य ऐतिहासिक खोजें

उन्होंने टैचीऑन्स की परिकल्पना भी पेश की, ऐसे काल्पनिक कण जो प्रकाश की गति से तेज चल सकते हैं. 1962 में अपने छात्र वी.के. देशपांडे के साथ उन्होंने इसे प्रस्तावित किया. हालांकि प्रयोगों में इनकी पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई, लेकिन यह विचार सापेक्षता सिद्धांत की सीमाओं पर गंभीर बहस छेड़ने वाला साबित हुआ. इसके अलावा, क्वांटम जेनो इफेक्ट, ओपन क्वांटम सिस्टम्स, नो-इंटरैक्शन थ्योरम और स्पिन-स्टैटिस्टिक्स थ्योरम जैसे क्षेत्रों में भी उनके योगदान अभूतपूर्व रहे.

पुरस्कारों की चमक से परे अमर विचार

विज्ञान के क्षेत्र में इतने क्रांतिकारी योगदान देने के बावजूद, सुदर्शन को कभी नोबेल पुरस्कार नहीं मिला. वे नौ बार नामांकित हुए, लेकिन समिति ने उन्हें नजरअंदाज किया. भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण (2007) और डिरैक मेडल जैसे सम्मान दिए, लेकिन वैश्विक मंच पर वह मान्यता अधूरी रही. 13 मई 2018 को 86 वर्ष की आयु में टेक्सास के ऑस्टिन में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

उनकी यह यात्रा एक गहरा सवाल छोड़ जाती है: क्या किसी वैज्ञानिक के काम की महानता और प्रभाव को सच में सिर्फ उन्हें मिले पुरस्कारों से ही मापा जा सकता है? सुदर्शन का जवाब उनके सिद्धांतों में छिपा है, जो आज भी भौतिकी की दिशा तय कर रहे हैं. उनकी विरासत नोबेल की चमक से कहीं अधिक स्थायी और गहन है. यह हमें याद दिलाती है कि सच्चा सम्मान विचारों की अमरता में है, न कि पदकों की सूची में.

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-भारत एक्सप्रेस



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