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आंध्र प्रदेश चुनाव हिंसा मामला: YSR कांग्रेस की याचिका पर 21 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

आंध्र प्रदेश में शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान कथित हिंसा और नामांकन दाखिल करने में बाधा के मामले में सुप्रीम कोर्ट 21 अक्टूबर को सुनवाई करेगा.

Supreme Court

आंध्र प्रदेश में शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के लिए नामांकन दाखिल करने में कथित हिंसा और बाधा को लेकर दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 21 अक्टूबर को सुनवाई करेगा. जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की अवकाशकालीन पीठ सुनवाई करेगी.

वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने दायर याचिका में आरोप लगाया है कि हिंसा के कारण उसके उम्मीदवार नामांकन दाखिल नही कर सके. पार्टी ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें नामांकन दाखिल करने की समयसीमा बढ़ाने की मांग खारिज कर दी गई थी. 21 अक्टूबर को ही उम्मीदवारों के नाम वापस लेने की आखिरी तारीख है, जबकि चुनाव के मतदान 28 अक्टूबर को होना निर्धारित है.

वाईएसआर कांग्रेस ने सबसे पहले 10 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अतिरिक्त नामांकन केंद्र उपलब्ध कराने की मांग की थी. उस समय चुनाव की अधिसूचना जारी नहीं हुई थी. हालांकि हाई कोर्ट के एकल न्यायाधीश ने 15 अक्टूबर को दायर याचिका को खारिज कर दिया था. इसके बाद पार्टी ने नामांकन केंद्रों पर कथित हिंसा और उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल करने से रोके जाने का मुद्दा उठाते हुए समयसीमा बढ़ाने की मांग की थी.

समयसीमा बढ़ाना चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप होगा- हाई कोर्ट

18 अक्टूबर को जस्टिस निनाला जयसूर्या और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुड़ी की पीठ ने नामांकन दाखिल करने के लिए एक दिन का अतिरिक्त समय बढ़ाने की मांग को खारिज कर दिया था. हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि नामांकन दाखिल करने की निर्धारित समयसीमा समाप्त हो चुकी है. ऐसे में समयसीमा बढ़ाने का निर्देश देना चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने के समान होगा. इसके बाद पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. दायर याचिका में तिरुपति के 9 उम्मीदवारों ने हलफनामे दाखिल कर कहा है कि नामांकन जमा करने की कोशिश के दौरान उन्हें बाधाओं का सामना करना पड़ा.

वाईएसआर कांग्रेस ने अपनी याचिका में दलील दी है कि चुनाव प्रक्रिया में अदालतों के हस्तक्षेप से बचने का सिद्धांत न्यायिक संयम का नियम है, न कि ऐसा पूर्ण प्रतिबंध जिसके कारण अदालतें किसी भी परिस्थिति में हस्तक्षेप नहीं कर सकती. पार्टी का कहना है कि जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित किया जा रहा हो, तब संवैधानिक अदालतों की जिम्मेदारी है कि वे हस्तक्षेप करें और सुनिश्चित करें कि चुनाव पारदर्शी तरीके से हों तथा किसी भी उम्मीदवार को चुनावी मुकाबले से बाहर होने के लिए मजबूर न किया जाए.

याचिका में यह भी कहा गया है कि नामांकन की समयसीमा समाप्त होना खुद उस कथित बाधा का परिणाम है, जिसकी शिकायत की गई है. इसलिए समयसीमा बीत जाने को राहत देने से इनकार करने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए.

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-भारत एक्सप्रेस



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