झारखंड की राजधानी रांची स्थित डोरंडा जैप-1 (झारखंड आर्म्स फोर्स) परिसर में इस बार भी दुर्गा पूजा की वह पुरानी और ऐतिहासिक परंपरा पूरी भव्यता के साथ निभाई गई, जो पिछले 146 सालों से चली आ रही है. महानवमी के पावन अवसर पर यहां का नजारा बेहद खास रहा, जहां एक तरफ परंपरा के अनुसार कन्या पूजन की गई, तो वहीं दूसरी तरफ देश और राज्य की सुरक्षा में तैनात जवानों के हथियारों की भी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई. इस अनूठे आयोजन में गोरखा बटालियन की समृद्ध संस्कृति और गहरी आस्था का अनूठा संगम देखने को मिला.
कलश को ही माना जाता है देवी का स्वरूप
गोरखा बटालियन की इस दुर्गा पूजा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां माता की कोई मूर्ति स्थापित नहीं की जाती, बल्कि कलश को ही देवी मानकर पूरी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना की जाती है. यह 146 साल पुरानी परंपरा साल 1880 से चली आ रही है.
महानवमी के मौके पर जैप-1 के कमांडेंट सह रांची के एसएसपी राकेश रंजन विशेष रूप से पूजा में शामिल हुए और परंपरा के मुताबिक सबसे पहले कन्या पूजन की रस्म पूरी की गई. इसके बाद जवानों ने अपनी सुरक्षा के मुख्य आधार यानी हथियारों की पूजा की.
हथियारों की पूजा के पीछे की मान्यता
गोरखा बटालियन की गहरी आस्था है कि महानवमी के दिन हथियारों की पूजा करने से मां दुर्गा का आशीर्वाद हमेशा जवानों के साथ रहता है. देश की आंतरिक सुरक्षा, सरहद की रखवाली और कानून-व्यवस्था संभालने वाले जवानों के हथियार कभी जंग में जाम न हों और संकट के समय कभी धोखा न दें, इसी अटूट विश्वास के साथ हर साल यहां शस्त्र पूजा की जाती है. पूजा के बाद जवानों ने अपनी पारंपरिक खुखरी, राइफल्स और इंसास जैसे हथियारों को चमकाकर कतारबद्ध रखा, उन पर फूल-मालाएं चढ़ाईं और टीका लगाया. इसके बाद मां को सलामी देते हुए हर्ष फायरिंग भी की गई.
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-भारत एक्सप्रेस
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