श्रीकृष्ण सिंह, जिन्हें सामान्यतः श्री बाबू कहा जाता है, बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री और स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेताओं में से एक थे. उनका राजनीतिक जीवन साहस, जनसंपर्क और व्यावहारिक दूरदर्शिता का उदाहरण है. सन 1906 में जब श्री बाबू मात्र 19 वर्ष के थे, उन्होंने मुंगेर के कष्टहरणी घाट पर एक हाथ में गीता और दूसरे में कृपाण लेकर गंगा की धारा में खड़े होकर भारत माता को आजाद कराने का संकल्प लिया. उस समय वे क्रांतिकारी राष्ट्रवादी संस्था अनुशीलन समिति के प्रभाव में थे. यह घटना उनके जीवन की दिशा तय करने वाली साबित हुई.
किसान आंदोलन और सामाजिक आधार
जनवरी 1923 में उन्होंने खड़गपुर में किसान सम्मेलन की स्थापना की. सन 1926 में बिहार में हुए साम्प्रदायिक दंगों के दौरान उन्होंने शाह मुहम्मद जुबैर साहब के साथ मिलकर घूम-घूमकर शांति स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई. उन्होंने मुंगेर जिला बोर्ड का चेयरमैन शाह मोहम्मद जुबैर को बनाया. राजनीति में मुस्लिम समुदाय से उनका गठजोड़ अंत तक बना रहा.
सन 1929 में जब स्वामी सहजानंद सरस्वती ने बिहार प्रांतीय किसान सभा का गठन किया, तब श्री बाबू उसके सचिव बने. उन्होंने जमींदारी उन्मूलन के लिए किसान आंदोलन का समर्थन किया. दलित, पिछड़ी जाति, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय का समर्थन हासिल कर उन्होंने मजबूत सामाजिक आधार तैयार किया. यही आधार उन्हें लंबे समय तक सत्ता में बनाए रखने में सहायक बना.
कांग्रेस और स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका
लाहौर अधिवेशन में उन्होंने सुभाष चंद्र बोस और पंडित जवाहरलाल नेहरू का साथ देकर पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पास कराने में योगदान दिया. जब महात्मा गांधी ने खिलाफत आंदोलन बंद कर दिया और कोई स्पष्ट राजनीतिक कार्यक्रम नहीं रखा, तब श्री बाबू चितरंजन दास की स्वराज पार्टी में शामिल हो गए और सक्रिय भूमिका निभाई.
सन 1922 में गांधी जी ने शपथ-पत्र देकर स्वयं को ब्रिटिश नागरिक और राजभक्त घोषित किया. उस समय श्री बाबू ने ब्रिटिश शासन के समक्ष घुटने टेकने से इनकार कर दिया. सन 1931 में उन्होंने भगत सिंह की फांसी का विरोध किया, भले ही इसके लिए उन्हें गांधी जी की नाराजगी झेलनी पड़ी. बड़े नेताओं में ऐसा साहस केवल सुभाष चंद्र बोस ने ही दिखाया था.
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री काल
20 जुलाई 1937 को श्री बाबू पहली बार बिहार की प्रांतीय सरकार के प्रधानमंत्री बने. दूसरी बार 2 अप्रैल 1946 को पुनः प्रधानमंत्री निर्वाचित हुए. तीसरी बार 29 अप्रैल 1952 को बिहार के मुख्यमंत्री बने. संविधान लागू होने के बाद पदनाम बदलकर मुख्यमंत्री हो गया. सन 1937 में राजेंद्र प्रसाद के विरोध के बावजूद उनका प्रधानमंत्री बनना आश्चर्यजनक नहीं था. किसान आंदोलन, दलित-पिछड़े वर्गों और मुस्लिम समुदाय के समर्थन ने उन्हें यह पद दिलाया.
वे प्रगतिवादी विचारधारा के थे, पंडित नेहरू की तरह. गांधी जी ने 1940 में उन्हें प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही के रूप में मनोनीत किया. हालांकि उन्होंने स्वामी सहजानंद, सुभाष चंद्र बोस और जयप्रकाश नारायण के मोर्चे से अलग होकर गांधी-नेहरू धारा को अपनाया. प्रधानमंत्री पद उन्हें स्वामी सहजानंद की कृपा से मिला था, लेकिन उसे बनाए रखने के लिए गांधी जी का आशीर्वाद आवश्यक था.
गांधी जी के प्रयास से श्री बाबू ने राजेंद्र बाबू के संबंधी शिकारपुर एस्टेट के विपिन बिहारी वर्मा को ब्रिटिश सरकार के बगावती बेतिया राज का प्रबंधक बना दिया. इसके बाद श्री बाबू और राजेंद्र बाबू के बीच का राजनीतिक द्वंद समाप्त हो गया. इस घटना का उल्लेख चंद्रदेव शर्मा की पुस्तक पवित्र पापी, कपिलदेव राय की विप्लव और विप्लवी, राममनोहर लोहिया की विभाजन के गुनहगार तथा मथाई और गिरीश मिश्रा के संस्मरणों में मिलता है.
1946 के दंगे और प्रशासनिक क्षमता
सन 1946 के बिहार दंगों के पक्ष में कुछ नेता जैसे आचार्य कृपलानी, राजेंद्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, जगत नारायण लाल और के.बी. सहाय थे. इन दंगों के कुछ स्थानीय नायक जयप्रकाश नारायण के सहयोगी माने जाते थे. तकी रहीम ने भारत सरकार के खुदाबख्श से प्रकाशित पुस्तक में इस विषय पर विस्तार से लिखा है. दंगे को नियंत्रित करने में फॉरवर्ड ब्लॉक के नेता धनराज शर्मा और कम्युनिस्ट नेता शालिग्राम सिंह का भी योगदान रहा. जिस दंगे को सरदार पटेल पंजाब में नहीं रोक पाए, उसे श्री बाबू ने एक सप्ताह में नियंत्रित कर लिया. उनके द्वारा प्रशिक्षित प्रशासनिक अधिकारी बाद में दिल्ली में लालबहादुर शास्त्री सरकार में भी काम करते रहे.
विकास कार्य और व्यक्तित्व
प्रगतिवादी होने के कारण श्री बाबू ने बिहार में कॉलेज, विश्वविद्यालय खोले, कारखाने चलाए और सिंचाई व्यवस्था को सुदृढ़ किया. जब गांधी जी उन्हें दंगों के कारण हटाने पर अड़े थे, तब सरदार पटेल और राजेंद्र बाबू ने उन्हें बचाया. यही कारण है कि उन्होंने पुल, अस्पताल, विश्वविद्यालय आदि जितने भी कार्य किए, उनमें से कई राजेंद्र बाबू के नाम पर किए. जो लोग मामले की तह तक नहीं जाते, वे इस राजनीतिक पहेली को समझ नहीं पाते.
श्री बाबू विद्या-अनुरागी होने के साथ अत्यंत स्वाभिमानी थे. उनकी मृत्यु 1961 में हुई. वे बिहार की राजनीति में लंबे समय तक मुख्यमंत्री पद पर बने रहे क्योंकि उन्होंने सामाजिक न्याय, किसान हित और व्यावहारिक राजनीति का संतुलन साधा.
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