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दिवाली पूजन में न करें ये भूल! आरती के बाद जरूर पढ़ें क्षमा प्रार्थना और विसर्जन मंत्र, तभी मिलेगा 7100वीं दिवाली का पूर्ण फल

7100TH DIWALI 2026 LAKSHMI PUJA SPECIAL: इस वर्ष दीपावली 8 नवंबर 2026, रविवार को मनाई जाएगी. स्थिर वृषभ लग्न और प्रदोष काल के शुभ योग में जानिए महालक्ष्मी पूजन का शास्त्रोक्त मुहूर्त, आरती, पुष्पांजलि मंत्र और विसर्जन के नियम.

Diwali 2026 Lakshmi Puja: 7100वीं दिवाली मुहूर्त आरती | Bharat Express

Diwali 2026 Lakshmi Puja: सनातन धर्म की समृद्ध काल-गणना, महर्षि वाल्मीकि रामायण के खगोलीय संदर्भों और वैदिक पंचांगों के अनुसार, भगवान श्री रामचंद्र के लंका विजय के उपरांत अयोध्या आगमन से प्रारंभ हुआ दीपोत्सव का यह क्रम इस वर्ष अपने 7100वें पड़ाव पर पहुंच रहा है. वर्ष 2017 में 7091वीं दिवाली के ऐतिहासिक आकलन के बाद, 9 वर्षों के अंतराल पर कार्तिक कृष्ण अमावस्या यानी रविवार, 8 नवंबर 2026 को संपूर्ण जगत 7100वीं दीपावली का स्वागत करेगा.

कार्तिक अमावस्या की यह पावन रात्रि शास्त्रों में ‘सुखरात्रि’ और ‘कालरात्रि’ कही गई है, जब समुद्र मंथन के 14 रत्नों में से एक भगवती महालक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था. इस दिन भगवान श्री गणेश और मां लक्ष्मी की नवीन प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा कर स्थिर लग्न में पूजन करने से दरिद्रता का समूल नाश होता है.

दिवाली 2026: लक्ष्मी पूजन के श्रेष्ठ शुभ मुहूर्त (8 नवंबर 2026)

कालदर्शक और स्थानीय पंचांगों के अनुसार, गृहस्थों और व्यापारियों के लिए स्थिर लग्न में पूजन का समय इस प्रकार रहेगा:

प्रदोष काल एवं स्थिर वृषभ लग्न (गृहस्थों के लिए सर्वोत्तम):

  • प्रदोष काल: सायं 05:32 बजे से रात 08:11 बजे तक
  • स्थिर वृषभ लग्न मुहूर्त: सायं 05:54 बजे से रात 07:50 बजे तक
  • पूजन अवधि: 1 घंटा 56 मिनट (इस स्थिर लग्न में की गई पूजा से घर में लक्ष्मी का स्थायी वास होता है)

महानिशिता काल एवं स्थिर सिंह लग्न (तांत्रिक, साधकों व व्यापारिक प्रतिष्ठानों हेतु):

  • महानिशिता काल: रात 11:39 बजे से 12:31 बजे तक
  • स्थिर सिंह लग्न: मध्यरात्रि 12:24 बजे से 02:41 बजे तक
  • अमावस्या तिथि: 8 नवंबर 2026 को दोपहर 12:15 बजे से प्रारंभ होकर 9 नवंबर को दोपहर 01:28 बजे तक रहेगी.
  • पूजन विधि: थाल सजावट और महालक्ष्मी की संपूर्ण आरती

आरती के लिए एक कांसे या पीतल की थाली में कुमकुम से स्वस्तिक और अष्टदल कमल बनाएं. अक्षत और पुष्पों का आसन बिछाकर उस पर शुद्ध गाय के घी का एक बड़ा चौमुखा दीपक जलाएं. एक अन्य पात्र में कर्पूर रखें. आचमन के उपरांत परिवार सहित खड़े होकर घंटी, शंख और मंजीरे की ध्वनि के साथ मां लक्ष्मी की आरती करें:

॥ मां लक्ष्मी की आरती ॥

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।

तुमको निसिदिन सेवत, हर विष्णु-धाता॥ ॐ॥

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।

सूर्य-चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥ ॐ॥

दुर्गारूप निरंजनि, सुख-सम्पत्ति दाता।

जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥ ॐ॥

तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।

कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥ ॐ॥

जिस घर तुम रहती, तहं सब सद्गुण आता।

सब संभव हो जाता, मन नहिं घबराता॥ ॐ॥

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न हो पाता।

खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥ ॐ॥

शुभ-गुण-मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि-जाता।

रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहिं पाता॥ ॐ॥

महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई नर गाता।

उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥ ॐ॥

मंत्र पुष्पांजलि और क्षमा प्रार्थना

आरती के पश्चात दोनों हाथों में कमल पुष्प अथवा लाल गुलाब और अक्षत लेकर माता के श्रीचरणों में यह वैदिक मंत्र पढ़ते हुए मंत्र पुष्पांजलि अर्पित करें:

मंत्र पुष्पांजलि:

ॐ या श्री: स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मी: पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धि:।

श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा तां त्वां नता: स्म परिपालय देवि विश्वम्॥

ॐ श्रीमहालक्ष्म्यै नम:, मंत्रपुष्पांजलिं समर्पयामि।

पुष्प अर्पित करने के बाद परिक्रमा करें और हाथ जोड़कर पूजा में हुई किसी भी भूलचूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें:

क्षमा प्रार्थना:

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।

पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि॥

यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे।

सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुकगंधमाल्यशोभे।

भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्॥

ॐ अनेन यथाशक्त्यर्चनेन श्रीमहालक्ष्मी: प्रसीदतु।

यह कहकर आचमनी से पृथ्वी पर जल छोड़ें. इसके बाद बड़ों के चरण स्पर्श कर चरणामृत व प्रसाद का वितरण करें.

विसर्जन विधि के महत्वपूर्ण नियम

दीपावली पूजन में यह ध्यान रखना अनिवार्य है कि भगवान श्री गणेश और माता लक्ष्मी की मूर्तियों का विसर्जन दिवाली की रात नहीं किया जाता (उन्हें पूरे वर्ष पूजा स्थल पर रखा जाता है). केवल पूजा के लिए सुपारी, कलश या चावल पर आवाहित किए गए अन्य नवग्रहों व देवी-देवताओं पर अक्षत छोड़ते हुए विसर्जन किया जाता है:

विसर्जन मंत्र:

यान्तु देवगणा: सर्वे पूजामादाय मामकीम्।

इष्टकामसमृद्धयर्थं पुनरागमनाय च॥

इस विधि से 7100वीं दीपावली पर श्रद्धापूर्वक किया गया पूजन घर में आरोग्य, अखंड लक्ष्मी और दीर्घायु का आशीर्वाद प्रदान करता है.

(नोट: इस बार 7100वीं दिवाली होने का मत सनातन धर्म की खगोलीय एवं पौराणिक काल-गणना के अनुसार है. 2017 में जब दिवाली का पर्व आया था तो कई प्रमुख न्यूज वेबसाइट्स पर उसे 7091वीं Diwali माना गया था. इसके अलावा इस लेख में अन्य सारी जानकारी (@all details) 2026 के नए ब्रजभूमि एवं राजधानी पंचांग से ही ली गई है.)

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-भारत एक्सप्रेस



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