Bharat Express DD Free Dish
Pension Mission Shakti Digital
Pension Mission Shakti Digital

बिहार के पीरू गांव ने दिल्ली को दिखाई नई राह: कंक्रीट के जंगलों में महकी गांव की सोंधी मिट्टी, प्रवासियों के लिए क़ायम की अनूठी मिसाल

यूनिवर्सिटी एल्युमनाई की तर्ज़ पर अब गांव के बाशिंदे भी महानगरों में मनाएं अपनी मिट्टी का जश्न; 84 बरस के सनाउल्लाह ख़ान से लेकर नौनिहालों तक, ‘पीरू रिलेटिव्स गेट-टुगेदर’ ने देश भर के प्रवासियो को दिया जड़ों से जुड़ने का पैग़ाम, लगभग 400 लोग मैदान में उमड़े और दुनिया भर में बैठे पीरू गांव से संबंधित क़रीब 4,500 प्रवासियों ने ऑनलाइन जोड़ा साथ

नई दिल्ली। आम तौर पर बड़े-बड़े महानगरों में यूनिवर्सिटी के पुराने छात्रों यानी एल्युमनाई की वार्षिक मिलन-सभाएं, कंपनियों के कॉरपोरेट जलसे या किसी संस्था से जुड़े लोगों के गेट-टुगेदर की ख़बरें सुनने को मिलती हैं। लेकिन देश की राजधानी दिल्ली में बिहार के औरंगाबाद ज़िले के हसपुरा प्रखंड स्थित छोटे-से गांव पीरू के रिश्तेदारों ने एक ऐसा भव्य मिलन-समारोह किया, जिसने सचमुच एक नई मिसाल क़ायम कर दी। यह महज़ एक गेट-टुगेदर नहीं, बल्कि अजनबी बना देने वाले कंक्रीट के जंगलों में अपनी तहज़ीब, पहचान और रिश्तेदारी को फिर से ज़िंदा करने की एक इंक़लाबी पहल थी, जिसने देश भर के प्रवासियों को यह सिखाया कि अपनी मिट्टी से कैसे जुड़े रहा जाता है।

18 अक्टूबर 2026 को जामिया मिलिया इस्लामिया के मंसूर अली ख़ान पटौदी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, में ‘पीरू रिलेटिव्स इन दिल्ली गेट-टुगेदर’ का आयोजन हुआ। यहां दिल्ली-एनसीआर में पीरू गांव और उससे जुड़े परिवारों के क़रीब 370 से 400 लोग एक साथ उमड़े। इसके साथ ही दुबई, क़तर, सऊदी अरब, कुवैत, अबूधाबी, ओमान, ब्रिटेन, अमेरिका, अफ़्रीका और भारत के पटना, कोलकाता, मुंबई जैसे शहरों में बैठे पीरू गांव से जुड़े लगभग 4,500 लोगों ने यूट्यूब पर इस आयोजन को लाइव देखा।

यह महज़ क्रिकेट मैच, दावत या मुलाक़ात का कार्यक्रम नहीं था। यह उन लोगों का भावनात्मक और जज़्बाती मिलन था, जो रोज़गार, तालीम और ज़िंदगी की मजबूरियों में अपने गांव से दूर रहते हैं, मगर दिल में अपनी मिट्टी, अपने रिश्ते और अपने बुज़ुर्गों की यादें साथ लेकर चलते हैं। कार्यक्रम का मक़सद साफ़ था—शहर की भागदौड़ में गांव को न भूलना और अगली पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़े रखना।

जब शहर में गांव की तड़प अश‘आर बनती है
मशहूर शायर मुनव्वर राना ने जब लिखा था,

“कहानी का ये हिस्सा आजतक सब से छुपाया है,
कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं”

और बशीर बद्र ने पुकारा था—

“गाव के सीधे-सादे लोग अब भी मुझ को याद आते हैं
शहर में आकर अपनी सादगी भूल गया हूं मैं”

तो ये सिर्फ़ अश’आर नहीं थे। ये रोज़गार, तालीम और बेहतर मुस्तक़बिल की तलाश में गांव छोड़ चुके हर उस इंसान की दास्तान थीं, जो महानगरों की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में अपनी जड़ों के लिए तड़प उठता है।

इसी तड़प को एक और प्रचलित नज़्म इन लफ़्ज़ों में बयां करती है—

“यह क्या कि सूरज पे घर बनाना और उस पे छांव तलाश करना
खड़े भी होना तो दलदलों पे, फिर अपने पांव तलाश करना”

“निकल के शहरों में आ भी जाना चमकते ख़्वाबों को साथ लेकर
बुलंद-ओ-बाला इमारतों में फिर अपने गांव तलाश करना”

उर्दू के बड़े अदीब अहमद मुश्ताक़ ने हिजरत के दर्द पर कहा था—

“बस्ती से यूं तो कितने ही अहबाब चल बसे
लेकिन किसी के जाने से वीरां न हुआ शहर”

जबकि कैफ़ भोपाली ने लिखा—

“राहे-दीवार पे हसरत सी बरसती है ‘कैफ़’
जब कभी हम अपने उजड़े हुए घर जाते हैं”

पीरू वालों का यह गेट-टुगेदर इन्हीं एहसासों का जवाब था। उन्होंने दिल्ली की चमक, इमारतों और भीड़ के बीच अपने गांव को तलाशा और कुछ घंटों के लिए उसे दोबारा ज़िंदा कर दिया।

एक छोटे से विचार से बना बड़ा उत्सव: जब ‘मिलने’ का ख़्याल बना आंदोलन
तकिया मैदान से दिल्ली के पटौदी पवेलियन तक
यह यादगार मिलन-सभा 18 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया के मंसूर अली ख़ान पटौदी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में आयोजित हुई। शुरुआत में यह एक बहुत मुख़्तसर सी मुलाक़ात सोची गई थी, जिसमें क़रीब 30-40 लोगों के आने का अंदाज़ा और महज़ 30,000 रुपये का शुरुआती बजट रखा गया था। लेकिन जब अपनों को आवाज़ दी गई, तो कारवां ऐसा बना कि देखते ही देखते 370 से 400 अफ़राद मैदान में उमड़ पड़े और बजट 1,70,000 रुपये तक जा पहुंचा।

इस सोच का बीज बोया था मोनू अजमेरी (फ़ैज़ुल्लाह अजमेरी), सोनू अजमेरी (वलीउल्लाह अजमेरी) और सुड्डन (वसीक़ रज़ा ख़ान) ने। शुरू में उन्होंने सोचा कि पीरू और उससे जुड़े रिश्तेदार परिवारों के लोग दिल्ली में एक जगह मिलें, एक-दूसरे को पहचानें और अपने बच्चों को भी गांव की संस्कृति से रूबरू कराएं। लेकिन जैसे ही यह विचार लोगों तक पहुंचा, उसने दिल जीत लिए। राशिद इक़बाल ख़ान, राशिख़ ख़ान और समर ख़ान जैसे नौजवानों ने इसे अपने कांधों पर उठाया और एक मुकम्मल निज़ाम में ढाल दिया। मैदान की बुकिंग, एडमिनिस्ट्रेटिव परमिशन, दावतनाम, प्रचार, फ़ंड जुटाना, खान-पान, खेल, मंच, ऑडियो व्यवस्था और सफ़ाई—हर काम मिलकर किया गया।

विशेष रूप से फ़रीदाबाद से पूरे ज़ौक़-ओ-शौक़ और बेपनाह जोश के साथ पहुंचे सरफ़राज़ ख़ान और साथ में एहतेशाम ख़ान उर्फ़ ‘गुड्डू’, जिन्होंने इस आयोजन को कामयाब बनाने के लिए एक बड़ी राशि के ज़रिये दिल खोलकर मदद दी और हर क़दम पर आगे खड़े रहे। उनके साथ जनाब ज़की साहब ने भी बड़ी रक़म के ज़रिये मदद भेजकर यह साबित किया कि नीयत साफ़ हो तो दूर रहकर भी अपनों का हाथ थामा जा सकता है। ज़की ख़ान उस दिन अपनी व्यस्तता के कारण मैदान तक नहीं पहुंच सके, मगर उनका सहयोग बताता है कि गांव की खुशी के लिए लोग दूर से भी हाथ बढ़ाते हैं।

पीरू गांव का समाजशास्त्र: जहां हर बाशिंदा है एक ख़ानदान की कड़ी
इस गेट-टुगेदर की रूह को समझने के लिए पीरू गांव के मिज़ाज और उसकी तारीख़ को समझना लाज़मी है। बिहार के औरंगाबाद ज़िले (जो पहले कभी ऐतिहासिक गया ज़िले का हिस्सा हुआ करता था) के हसपुरा प्रखंड में स्थित पीरू कोई आम गांव नहीं है। हसपुरा प्रखंड मुख्यालय से तक़रीबन 4 किलोमीटर और ज़िला मुख्यालय औरंगाबाद से क़रीब 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह गांव एक मुकम्मल ग्राम पंचायत भी है।

पीरू की सबसे अनोखी और नायाब ख़ासियत यह है कि यहां का तक़रीबन हर घराना एक-दूसरे से रिश्तेदारी की अटूट डोर में बंधा है। चचा, मामू, ससुराल, भतीजा, भांजा, साला, देवर, ननद और भाभी—यहां कोई भी दो लोग आपस में गुफ़्तगू शुरू करें, तो कुछ ही मिनटों में बात किसी न किसी अज़ीज़ रिश्ते की कड़ी तक पहुंच जाती है। पीरू की आबोहवा में अपनापन कुछ इस क़दर रचा-बसा है कि यहां ‘ग़ैर’ कोई होता ही नहीं।

इसके साथ ही यह गांव गंगा-जमुनी तहज़ीब और सांप्रदायिक सौहार्द की एक बेमिसाल नज़ीर है। यहां मुस्लिम (पठान/ख़ान बिरादरी बहुल) आबादी में भी कई पारंपरिक रस्में—जैसे शादियों में मड़वा गाड़ना, उबटन/हल्दी लगाना और सिंदूर की रस्में—क़दीम ज़माने से रची-बसी हैं, जो आपसी मेलजोल और मुश्तरका तहज़ीब का मुज़ाहिरा करती हैं।

पीरू गांव का परिचय: एक नज़र में

विवरण जानकारी
स्थान हसपुरा प्रखंड, औरंगाबाद ज़िला, बिहार
दूरी हसपुरा से लगभग 4 किमी, औरंगाबाद से क़रीब 60 किमी
प्रशासनिक दर्जा ग्राम पंचायत
जनसंख्या (2011 जनगणना) 8,537
साक्षरता दर 57.87 प्रतिशत
प्रमुख समुदाय ख़ान/पठान, मुस्लिम बहुल
ऐतिहासिक संस्था अंजुमन-ए-इस्लाहिया (1936), पब्लिक उर्दू लाइब्रेरी (1936)
शैक्षणिक संस्थान प्राथमिक, माध्यमिक, उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, इस्लामिक मदरसा
प्रसिद्ध स्थल तकिया मैदान, गांव के बीचोंबीच सदी पुरानी और खूबसूरत मस्जिद, जिसकी ऊंची मीनारें पीरू की पहचान
धार्मिक स्थल हीरा शहीद मज़ार व क़ब्रिस्तान, अमझर शरीफ़ दरगाह(3 कि.मी दूर)
विशेषता गांव का हर निवासी एक-दूसरे का रिश्तेदार; सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल


तकिया मैदान और 90 साला लाइब्रेरी: खेल, क़लम और वतन-परस्ती की सरज़मीं
पीरू गांव की तारीख़ इल्म-ओ-अदब और खेलकूद के सुनहरे दौर से भरी पड़ी है:

  • तकिया ग्राउंड और 90 साल पुरानी लाइब्रेरी: गांव के ऐतिहासिक ‘तकिया ग्राउंड’ पर साल 1936 में ‘अंजुमन-ए-इस्लाहिया’ की क़याम के साथ ही ‘पब्लिक उर्दू लाइब्रेरी’ की बुनियाद रखी गई थी। 1960 और 1970 के दशक में यह लाइब्रेरी पूरे इलाक़े में इल्म, सियासत और तहज़ीब की धुरी बन गई। यहां रोज़ाना किताबें, अख़बारात, अदबी नशिस्तें, मुशायरे और संजीदा बहस-ओ-मुबाहिसे हुआ करते थे। संस्कृत साहित्य के महान कवि बाणभट्ट की ऐतिहासिक स्मृतियों से जुड़ा यह ख़ित्ता हमेशा से क़लम और किताब का क़द्रदान रहा है।
  • खेल का मैदान और ईद की रौनक़ें: तकिया मैदान पर सिर्फ़ क्रिकेट या फ़ुटबॉल ही नहीं खेला जाता था, बल्कि ईद और त्यौहारों के मौक़े पर होने वाले पारम्परिक खेल पूरे ज़िले में शोहरत रखते थे। यहां के खिलाड़ियों ने मैदान में खेल के साथ-साथ अख़लाक़ और शराफ़त का जो मेयार क़ायम किया, उसकी मिसाल आज भी बुज़ुर्ग देते हैं।
  • वर्दी और वतन-परस्ती का जज़्बा: पीरू का एक बेहद फ़ख़्र करने लायक पहलू पुलिस महकमे और फ़ौज (सुरक्षा बलों) में यहां के नौजवानों की भागीदारी रही है। पुराने दौर से ही यहां के अनगिनत बाशिंदों ने पुलिस अफ़सर और जांबाज़ सिपाही बनकर रियासत और मुल्क की ख़िदमत की, जिससे गांव को अनुशासन और बहादुरी की एक ख़ास पहचान मिली।
  • नई नस्ल की आलमी उड़ान: अपने आबा-ओ-अजदाद की रिवायत को आगे बढ़ाते हुए समय के साथ पीरू की आज की नई नस्ल ने अपना दायरा बढ़ाया है। जर्नलिज़्म, मेडिसिन, सिविल सर्विसेज़, लॉ, इंजीनियरिंग, कॉरपोरेट मैनेजमेंट, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और अकादमिक शोबों में दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, फ़रीदाबाद, पटना, कोलकाता, मुंबई जैसे शहरों के अलावा विदेशों में भी पीरू के लोग अपनी पहचान बना रहे हैं। नई पीढ़ी मुल्क के साथ-साथ सात समंदर पार भी अपनी क़ाबिलियत का परचम लहरा रही है।
  • सियासी और प्रशासनिक हलक़ों में एहतराम: अपनी समाजी बेदारी और इल्मी रुतबे के सबब पीरू गांव हमेशा से ज़िले के आला हुक्काम (डीएम, एसपी) से लेकर इलाक़े के विधायकों और सांसदों की तवज्जो का मरकज़ रहा है, जो मुतवातिर यहां के विकास और सामाजिक मसलों के लिए हाज़िरी देते रहे हैं।

84 बरस की उम्र, लेकिन दिल में गांव की वही पुरानी कशिश
इस पूरे आयोजन का सबसे जज़्बाती और रूहानी मंज़र वह था जब 84 बरस के बुज़ुर्ग रिटायर्ड सरकारी अधिकारी जनाब सनाउल्लाह ख़ान मैदान में दाख़िल हुए। उम्र के इस पड़ाव और जिस्मानी कमज़ोरियों के बावजूद वह दिल्ली में अपने घर पर ख़ुद को रोक न सके। अपनी मिट्टी की महक और गांव की रिवायत को एक बार फिर जीने के लिए वह अपने बड़े बेटे डॉ. ख़ालिद रज़ा ख़ान (जो इस फ़ीचर स्टोरी के लेखक होने के साथ एक वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं और ‘भारत एक्सप्रेस न्यूज़ नेटवर्क’, नोएडा में बतौर एडिटर अपनी ख़िदमात अंजाम दे रहे हैं) और अपने पोते अशहर सुलेमान ख़ान के साथ पूरी शान से पहुंचे।

सनाउल्लाह ख़ान इस महफ़िल के सबसे उम्रदराज़ बुज़ुर्ग थे। तीन पीढ़ियों का यह साथ देखकर हर आंख नम और दिल फ़ख़्र से चौड़ा हो गया। उनकी मौजूदगी ने साबित किया कि गांव की परंपरा, रिश्तेदारी और अपनी मिट्टी की खुशबू किसी उम्र के सामने नहीं झुकती। बुज़ुर्ग सनाउल्लाह ख़ान ने इस मौक़े पर बेहद भावुक होकर फ़रमाया:

“दिल्ली में रहते हुए भी गांव की मिट्टी की ख़ुशबू और अपनों के बीच होने का सुकून कुछ और ही है। यह आयोजन मेरे लिए ज़िंदगी की बड़ी ख़ुशियों में से एक है।”

उनकी मौजूदगी ने यह साबित कर दिया कि गांव की तहज़ीब और रिश्तों की डोर किसी उम्र या जिस्मानी लाचारी की मोहताज नहीं होती। वहीं फ़रीदाबाद से पूरे ज़ौक़-ओ-शौक़ और बेपनाह जोश के साथ पहुंचे सरफ़राज़ ख़ान और एहतेशाम ख़ान उर्फ़ ‘गुड्डू’ ने भी शिरकत कर महफ़िल को यादगार बना दिया।

खेल, मोहब्बत और बचपन की गलियां: मैदान में लौटा अतीत
सुबह 8 बजे से शाम 7 बजे तक चले इस क़ाबिल-ए-तारीफ़ जलसे का आग़ाज़ बुज़ुर्गों के मुबारक हाथों से रिबन कटवाकर किया गया। मैदान में सिर्फ़ पीरू ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े पड़ोसी और रिश्तेदार गांवों—बनतारा, रघुनाथपुर, हसपुरा, चिरैयाटाड़ और अमझर शरीफ़—के अज़ीज़-ओ-अक़ारिब भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे। दिल्ली-एनसीआर के अलावा फ़रीदाबाद, अलीगढ़, आसनसोल, पटना, कोलकाता और ख़ुद पीरू गांव से लोग ख़ास तौर पर इस दिन के लिए दिल्ली पहुंचे थे।

दिन का सबसे बड़ा रोमांच चार टीमों—पीरू वॉरियर्स, पीरू किंग्स, पीरू हिटर्स और पीरू इलेवन—के दरमियान खेला गया क्रिकेट टूर्नामेंट था।

  • मैच का घटनाक्रम: पहला सेमीफ़ाइनल पीरू वॉरियर्स और पीरू किंग्स के बीच खेला गया, जिसमें पीरू वॉरियर्स ने 5 रन से रोमांचक जीत दर्ज की। वक़्त की नज़ाकत को देखते हुए फ़ाइनल मुक़ाबला 8-8 ओवरों का कराया गया।
  • फ़ाइनल का फ़ैसला: साकिब रज़ा ख़ान उर्फ़ गुड्डन की क़यादत वाली पीरू वॉरियर्स ने मुस्तफ़ा ख़ान (नन्हे राजा) की पीरू हिटर्स को 5 विकेट से शिकस्त देकर विजेता ट्रॉफ़ी पर क़ब्ज़ा जमाया। पीरू वॉरियर्स चैंपियन बनी और पीरू हिटर्स उपविजेता रही।
  • मैदान पर पुराने और नए दौर का संगम: पुराने दौर में ‘स्टीव वॉ और मार्क वॉ’ की जोड़ी के नाम से मशहूर सुड्डन और गुड्डन भाइयों की जोड़ी, बनतारा के मारूफ़ ऑलराउंडर मासूम ख़ान उर्फ़ रिज़्ज़ू, नन्हे राजा, वीरा ताबिश और हसपुरा के समर जब मैदान में उतरे, तो तकिया ग्राउंड का पुराना ज़माना आंखों के सामने तैर गया। वहीं नई नस्ल के संज़ील ख़ान, उस्मान ख़ान, अबूज़र, अकरम, समीर और इशान ने अपनी तूफ़ानी बल्लेबाज़ी और धारदार गेंदबाज़ी से समां बांध दिया।
  • अंपायरिंग, स्कोरिंग और कमेंट्री पैनल: इम्तेयाज़ ख़ान, अरशद ख़ान, बिहारू ख़ान और काशिफ़ ख़ान ने निष्पक्ष अंपायरिंग की कमान संभाली। उमर ख़ान टूर्नामेंट के चीफ़ रेफ़री रहे। स्कोरिंग का ज़िम्मा समर ख़ान जूनियर और रब्बत ख़ान ने ब-ख़ूबी निभाया। वहीं जनाब इंतेशार साहब और इमरान ख़ान ‘गट्टू’ की जानदार कमेंट्री ने चौकों-छक्कों पर दर्शकों का जोश दोगुना कर दिया।
  • मेडिकल टीम: मैदान पर खिलाड़ियों की सेहत और किसी भी चोट से निपटने के लिए गाँव के ही नामवर डॉक्टरों की टीम—डॉ. फ़राज़ अहमद, डॉ. तल्हा, डॉ. मिंटू और डॉ. इफ़्तेख़ार ताबिश—मुकम्मल मेडिकल किट के साथ दिन भर मुस्तैद रही।


लेकिन इस क्रिकेट का असली मक़सद सिर्फ़ जीतना नहीं था। असली जीत वह थी जब अलग-अलग शहरों में रहने वाले रिश्तेदार एक ही टीम के लिए तालियां बजा रहे थे, बच्चे अपने बड़ों को खेलते देख रहे थे और हर उम्र के लोग एक साझा ख़ुशी का हिस्सा बन रहे थे। असली विजेता वह भाईचारा था, जो मैदान पर सबको एक कर गया।

पर्दों से परे घर-आंगन की हंसी: ख़वातीन और बच्चों का जलवा
इस आयोजन की सबसे ख़ूबसूरत और रूहानी बात यह थी कि यह सिर्फ़ मर्दों का मजमा नहीं था। तक़रीबन 100 से 120 ख़वातीन और नन्हें बच्चों की बा-वक़ार मौजूदगी ने इसे एक मुकम्मल ख़ानदानी त्यौहार बना दिया। एक साल के मासूस बच्चे से लेकर 70-84 बरस के बुज़ुर्ग तक एक ही छतरी के नीचे मुस्कुरा रहे थे।
ख़वातीन और बच्चों के लिए मुनअक़िद किए गए दिलचस्प मुक़ाबलों के नताइज इस प्रकार रहे:

  • सुई-धागा रेस (Needle & Thread Game): फ़ारिया अव्वल (प्रथम), तंजीहा दोयम (द्वितीय) और शाहीना सोयम (तृतीय) रहीं।
  • चम्मच-गोली दौड़ (Spoon & Marble Race): रिमझिम ने पहला मक़ाम हासिल किया, जबकि इरम नाज़ दूसरे और रहीला तीसरे नंबर पर रहीं।
  • म्यूज़िकल चेयर: तंजीहा ने पहला, शाहीना ने दूसरा और फ़ारिया ने तीसरा स्थान हासिल किया।
  • बच्चों की दौड़ (100 व 400 मीटर): नन्हे जुलकरनैन सबसे आगे रहे, अबान ख़ान ने दूसरा और आसिम ने तीसरा स्थान हासिल कर मेडल जीते।


आयोजन की कामयाबी के पीछे आधी आबादी का बेमिसाल किरदार रहा। हिफ़्ज़ा जैसी बच्चियों ने रात भर जागकर मेहमानों के लिए नाश्ते के पैकेट तैयार किए। इरम नाज़, गुंचा और मून जैसी ख़वातीन ने वॉलंटियर के तौर पर आगे बढ़कर तमाम इंतज़ामात और महिला प्रतियोगिताओं की ज़िम्मेदारी संभाली। गांव के सीनियर जनाब अमजद ख़ान उर्फ़ मन्ना जो बिहार के राज्यस्तरीय फ़ुटबाल खिलाड़ी रहे और संतोष ट्रॉफ़ी में बिहार का नाम रौशन किया,  ने मैदान में पहुंचकर तकिया ग्राउंड पर ईद के दिनों में होने वाले रवायती खेलों को ख़वातीन और बच्चों के साथ मिलकर दोबारा ज़िंदा कर दिया।

दस्तरख़्वान, मेहमाननवाज़ी और गांव के ज़ायक़े में अपनेपन की महफ़िल
दोपहर में स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स के कैफ़ेटेरिया में क़रीब 400 लोगों के लिए लज़ीज़ बिरयानी, रोटी, क़ोरमा, हलवा, सलाद, शीर-माल और ठंडे मशरूबात का दस्तरख़्वान सजा। नाश्ते और स्नैक्स में बिस्कुट, मिक्सचर, केक, सैंडविच और फ्रूटी भी रखे गए।

लंच के लिए स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स की ही कैफ़ेटेरिया बुक की गई और बाहर से कैटरिंग टीम बुलाई गई। लोगों ने खाने की तारीफ़ ख़ूब की। इन व्यवस्थाओं के पीछे कई लोगों की मेहनत रही—किसी ने सामान जुटाया, किसी ने वितरण में मदद की, किसी ने मेहमानों का मार्गदर्शन किया।

कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद सफ़ाई और सामान हटाने का काम भी गंभीरता से किया गया, जो आयोजकों की ज़िम्मेदारी और संस्कार को दर्शाता है।

पुरस्कार वितरण और शायरी की महफ़िल
पुरस्कार वितरण समारोह की शुरुआत करते हुए जनाब इमरान ख़ान उर्फ़ गट्टू ने अपनी शायरी से महफ़िल का आग़ाज़ किया और पीरू को ‘मस्क़न-ए-नूर’ क़रार देते हुए अपने पुरदर्द अश’आर से गांव के ताल्लुक़ को बयां किया:

“ऐ बाशिंदगाने पीरू! एक बात मैं बता दूं,
इस मजमे में आके, एक दास्तां सुना दूं।
आएं चलें मिलाकर, सब हाथ को उठाएं,
महमूद के इस चमन को, रहबर जहां बना दूं…”

इसके बाद मंच का संचालन जनाब नुमान ख़ान ने अपने पुरकशिश और बेमिसाल अंदाज़ में किया। मुख्य अतिथि जनाब सरफ़राज़ अहमद साहब ने नई पीढ़ी को मोहब्बत और अख़लाक़ का पैग़ाम दिया। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के डीन एवं अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर रिज़वान ख़ान ने समाजी नेटवर्किंग और बाहमी तावुन (आपसी सहयोग) की अहमियत समझाई।


वरिष्ठ पत्रकार डॉ. ख़ालिद रज़ा ख़ान, जनाब उमर साहब, इंतेशार साहब और कांग्रेस के युवा नेता इमरान ख़ान ने अपने ख़यालात का इज़हार करते हुए नौजवानों को अपनी रिवायत, उच्च नैतिक मूल्यों और अख़लाक़ की हिफ़ाज़त करने की पुरज़ोर वकालत की। अमजद खान उर्फ मन्ना साहब ने पीरू तकिया की यादों को दिल्ली में जीने की बात कही।

सम्मान और पुरस्कार: मेहनत की पहचान
समारोह में विशिष्ट मेहमानों—सरफराज अहमद, रिजवान खान, इंतेशार खान, अमजद खान उर्फ मन्ना खान, इमरान खान और इम्तियाज खान—का सम्मान किया गया। साथ ही, बेहतरीन व्यवस्था के लिए मोनू खान, सोनू खान, राशिद खान, वसीक रज़ा खान (सुद्दू), समर खान और राशिद इकबाल खान को सम्मानित किया गया।

विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार सूची

  • विशिष्ट अतिथि सम्मान: सरफ़राज़ अहमद, प्रोफ़ेसर रिज़वान ख़ान, इंतेशार ख़ान, अमजद ख़ान उर्फ़ मन्ना साहब, इमरान ख़ान और इम्तेयाज़ ख़ान।
  • सर्वश्रेष्ठ आयोजक / सक्रिय सदस्य: वासिक़ रज़ा ख़ान (सुड्डन) और मोनू ख़ान (फ़ैज़ुल्लाह अजमेरी)।
  • विशेष प्रबंधकीय सम्मान: सोनू ख़ान, राशिद ख़ान, समर ख़ान और राशिद इक़बाल ख़ान।
  • सर्वश्रेष्ठ माली योगदान पुरस्कार: एहतेशाम ख़ान उर्फ़ ‘गुड्डू’।
  • विशेष निष्ठा पुरस्कार (दीर्घ यात्रा सेवा): कलीम (1,000 किलोमीटर का सफ़र तय कर सेवा देने हेतु)।
  • सर्वश्रेष्ठ महिला वॉलंटियर: इरम नाज़।
  • बेहतरीन कमेंटेटर: इंतेशार ख़ान साहब और इमरान ख़ान (गट्टू साहब)।
  • क्रिकेट—मैन ऑफ़ द मैच (पहला सेमीफ़ाइनल): संज़ील ख़ान।
  • क्रिकेट—मैन ऑफ़ द मैच (दूसरा सेमीफ़ाइनल): उस्मान ख़ान।
  • क्रिकेट—मैन ऑफ़ द मैच (फ़ाइनल मुकाबला): फ़िरदौस।
  • टूर्नामेंट का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी (मैन ऑफ़ द सीरीज़): संज़ील ख़ान।
  • उभरता हुआ खिलाड़ी (Emerging Player): इशान ख़ान।


सात समंदर पार तक पहुंची गांव की महक: लाइव स्ट्रीमिंग का जादू

इस पूरे मंज़र को एक प्रोफ़ेशनल टीम के ज़रिए यूट्यूब पर लाइव स्ट्रीम किया गया। पीरू से जुड़े तक़रीबन 4,500 प्रवासी जो दुबई, क़तर, सऊदी अरब, कुवैत, अमेरिका, ब्रिटेन, ओमान, अबूधाबी, अफ्रीक़ा और भारत के कई शहरों में बैठे अपनी स्क्रीन पर गांव के मंज़र देखकर अपनी मिट्टी को चूम रहे थे। इस तरह जो लोग मैदान तक नहीं पहुंच सके, वे भी अपनों की खुशी में शामिल हुए। कलीम जैसे नौजवान तो सिर्फ़ इस एक दिन की ख़िदमत के लिए 1,000 किलोमीटर का सफ़र तय करके दिल्ली पहुंचे थे।

दिल्ली और देश भर के प्रवासियों के लिए एक नज़ीर: गांव छोड़ना गलत नहीं, गांव भूलना गलत है
गांव से उखड़कर दिल्ली, मुंबई या परदेस में जा बसने वाली नस्लों के सामने सबसे बड़ा ख़तरा अपनी पहचान खो देने का होता है। इंसान गगनचुंबी इमारतों में बैठकर अकेला हो जाता है। ऐसे में ‘पीरू रिलेटिव्स गेट-टुगेदर’ सिर्फ़ एक गांव का निजी जलसा नहीं, बल्कि देश भर के तमाम प्रवासियों के लिए एक रौशन मशअल-ए-राह (मार्गदर्शक) है। आज की आपाधापी में इंसान अपने फ्लैटों और दफ़्तरों के कमरों में क़ैद होकर अपनों से कटता जा रहा है। लोगों के पास अपने सगे संबंधियों के लिए वक़्त नहीं बचा है।

पीरू वालों ने साबित कर दिया कि दिल्ली में रहकर भी अपने गांव से जुड़े रहा जा सकता है। इसके लिए किसी बहुत बड़े बजट की ज़रूरत नहीं—ज़रूरत है एक अच्छे इरादे, आपसी भरोसे और मिलकर काम करने की सोच की। जब शुरुआत में 30-40 लोगों की सोच थी, तब किसी को अंदाज़ा नहीं था कि मैदान में क़रीब 400 लोग जुटेंगे और ऑनलाइन 4,500 से अधिक लोग जुड़ेंगे। पीरू वालों ने दिखाया है कि अपनी तहज़ीब को ज़िंदा रखने के लिए करोड़ों के बजट की नहीं, बल्कि नेक नीयत, आपसी भरोसे और ख़ुलूस-ए-दिल की ज़रूरत होती है। अगर देश के तमाम महानगरों—मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई—में रहने वाले किसी भी गांव, क़स्बे या ख़ित्ते के प्रवासी साल में महज़ एक दिन भी इस तरह अपनी चौपाल सजा लें, तो न सिर्फ़ पुराने रिश्तों को नई ज़िंदगी मिलेगी, बल्कि हमारी आने वाली नस्लें भी अपनी जड़ों, तहज़ीब और अख़लाक़ से जुड़ी रहेंगी।

नॉस्टैल्जिया: कंक्रीट के जंगलों में अपनी सोंधी मिट्टी की तलाश
यह गेट-टुगेदर दरअसल ‘नॉस्टैल्जिया’—यानी गुज़रे हुए सुनहरे दिनों की याद और अपनी माटी की असीम तड़प—का एक रूहानी इलाज बनकर सामने आया। जब इंसान गांव की खुली फ़ज़ाओं से निकलकर महानगरों की बहुमंज़िला इमारतों में जा बसता है, तो गांव महज़ एक ज़मीनी टुकड़ा नहीं रह जाता; वह एक महक, एक अहसास और एक ख़्वाब बन जाता है।

उर्दू शायर अर्श सिद्दीक़ी ने अपनी नज्म ‘अपनी मिट्टी की ख़ुशबू’ में इसी एहसास को अलफ़ाज़ दिया है:

मैं जब बस्ती की सरहद पर खड़ा हो कर
उफ़क़ में डूबती राहों को तकता था
…अपने आबा की उस मिट्टी की ख़ुशबू के तआक़ुब में चला आया
जो मेरे ख़्वाबों में पलती थी।

मशहूर शायर मुनीश मोहक की ग़ज़ल इस जज़्बे को सबसे सटीक ढंग से ज़ाहिर करती है:

भुलाई जा नहीं सकती कभी भी गांव की मिट्टी,
जहां पाला था मुझ को मां ने वो थी गांव की मिट्टी।
मेरे दादा को और दादी को जितनी प्यारी लगती थी,
मुझे भी लगती है उतनी ही प्यारी गांव की मिट्टी।

गांव और मिट्टी की याद को लेकर एक मशहूर शेर में भी यही कहा गया है:

पीपल वाली छांव रखी है खुशबू बिखरी मिट्टी में
पूरा-पूरा गांव धरा है मेरी मां की चिट्ठी में।

मुनव्वर राणा जैसे शायरों ने हिजरत (माइग्रेशन) के दर्द को अपनी शायरी में यूं उतारा है, “नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में / पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं।” उर्दू अदब की अज़ीम अदीबा क़ुर्रतुलऐन हैदर ने अपनी तख़लीक़ात में शहर और गांव के बीच मुअल्लक़ (झूलते) इंसानी वजूद के जिस अंतर्द्वंद् को चित्रित किया है, जहां नायक अक्सर अपनी जड़ों की तलाश में भटकता रहता है। या अहमद मुश्ताक़ ने जब कहा था कि “बस्ती से यूं तो कितने ही अहबाब चल बसे / लेकिन किसी के जाने से वीरां न हुआ शहर” और कैफ़ भोपाली ने लिखा था कि “राहे-दीवार पे हसरत सी बरसती है ‘कैफ़’ / जब कभी हम अपने उजड़े हुए घर जाते हैं”—यह गेट-टुगेदर उन तमाम ग़मों और अकेलेपन का एक मुकम्मल मुदावा (इलाज) साबित हुआ। अल्लामा इक़बाल की उस नसीहत की तरह, जिसमें उन्होंने अपनी क़ौमी और मक़ामी अस्मिता से जुड़े रहने का दर्स दिया था, पीरू वालों ने दिखा दिया कि शाख़ों से टूटकर पत्ते अपना वजूद खो देते हैं, इसलिए दरख़्त की जड़ों को थामे रखना ही ज़िंदगी है।
प्रवासी और देशांतरवासी या महजरी लेखकों-कवियों का साहित्य और अदब भी यही दर्द और याद बयां करता है। जब इंसान अपने गांव से दूर जाता है, तो वह शहर में कामयाबी तो पाता है, मगर अपनी मिट्टी की ख़ुशबू, अपने लोगों की आवाज़ और अपने बचपन को तलाशता रहता है। यही तड़प प्रवासी साहित्य (Diasporic Literature) की रूब है और यही जज़्बा पीरू रिलेटिव्स इन दिल्ली गेट-टुगेदर में साफ़ झलका।

‘तारीख़-ए-पीरू’ का संदेश: यादें लौटीं, रिश्ते और मज़बूत हुए
शाम जब ढल गई और पटौदी पवेलियन की बत्तियां बुझने लगीं, तो लोग अपने घरों को लौट रहे थे। मगर किसी के हाथ ख़ाली नहीं थे—किसी के पास जीत का कप था, किसी के पास बुज़ुर्गों की दुआएं थीं और सबके दिलों में यह यक़ीन था कि चाहे हम सूरज पर घर बना लें, अपने गांव की छांव कभी मद्धम नहीं पड़ने देंगे। मैदान ख़ाली हो गया, लेकिन दिलों में बनी जगह ख़ाली नहीं हुई। उस दिन की मुस्कानें, मैचों की यादें, बच्चों के मेडल, बुजुर्गों की दुआएं और अपनों से मिलने की खुशी सबके साथ लौटी।

‘तारीख़-ए-पीरू’ सिर्फ़ एक कार्यक्रम का नाम नहीं, बल्कि एक संदेश है—हम जहां भी रहें, अपनी जड़ों को न भूलें; अपने बुजुर्गों की इज़्ज़त और सम्मान करें; बच्चों को आगे बढ़ने का मौक़ा दें; महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित करें और ज़रूरत के वक़्त एक-दूसरे का हाथ थामें।

यह क्या कि सूरज पे घर बनाना और उस पे छांव तलाश करना
खड़े भी होना तो दलदलों पर, फिर अपने पांव तलाश करना
निकल के शहरों में आ भी जाना चमकते ख्वाबों को साथ लेकर
बुलंद-ओ-बाला इमारतों में फिर अपने गांव तलाश करना।

काशिफ खान (पुत्र मोहम्मद इरशाद खान) ने इस भावना को इन शब्दों में पिरोया है:
“हम जहां भी रहें, अपने गांव, अपने रिश्तों और अपनी पहचान को हमेशा ज़िंदा रखें।”

पीरू वालों ने दिल्ली में जो शमा रोशन की है, उम्मीद है कि वतन के हर गांव से हिजरत करने वाले लोग उससे रोशनी हासिल करेंगे। यह आयोजन एक शुरुआत है—मोहब्बत, भाईचारे, अच्छे अख़लाक़ और सामाजिक भलाई के नए रास्तों की शुरुआत। यह कहानी अभी जारी है… और यह हर उस इंसान की कहानी है जो अपनी जड़ों से जुड़ा रहना चाहता है।

(व्यक्तिगत अनुभवों, निजी जानकारी, विभिन्न स्रोतों एवं एजेंसीज़ से प्राप्त जानकारी तथा काशिफ़ ख़ान के लेख की सहायता से)

— भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Pension Mission Shakti Digital