न्यायपालिका पर टिप्पणी करके कानूनी पचड़े में फंसे शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत की मुश्किलें कम होती नजर आ रही हैं. अदालत की अवमानना के मामले में घिरे संजय राउत ने अब सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर बिना शर्त माफी मांग ली है. उन्होंने अपने बयानों पर गहरा खेद जताते हुए स्पष्ट किया है कि उनका इरादा कभी भी अदालत की गरिमा या उसकी स्वतंत्रता को ठेस पहुंचाने का नहीं था.
क्यों गरमाया मामला?
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने विपक्षी नेताओं राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे से मिलने से साफ इनकार कर दिया था. विपक्षी नेता मतदाता सूची के एसआईआर को लेकर सीजेआई को एक ज्ञापन सौंपना चाहते थे. इस पर सीजेआई ने स्पष्ट किया था कि लंबित मामलों पर चर्चा के लिए ऐसी बैठकें करना संविधान के मूल ढांचे और ‘शक्तियों के पृथक्करण’ के सिद्धांत के खिलाफ होगा.
इसके बाद, 12 अक्टूबर को मीडिया से बातचीत के दौरान संजय राउत ने एक विवादित दावा कर दिया था. राउत ने कहा था कि उन्होंने सीजेआई सहित 60 से 70 जजों को लंदन में बीजेपी नेताओं के साथ बैडमिंटन खेलते देखा है. इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) की याचिका में यह भी सामने आया कि राउत ने आरोप लगाया था कि जज सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक कार्यक्रमों और डिनर पार्टियों में शामिल होते हैं. पत्रकार वागले के एक सोशल मीडिया पोस्ट के बाद इस मामले ने और तूल पकड़ लिया, जिसके बाद एससीबीए ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
हलफनामे में क्या बोले संजय राउत?
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद संजय राउत ने अपने हलफनामे में माना कि उनके द्वारा की गई कुछ टिप्पणियां बिना पूरी पुष्टि और सावधानी के थीं. हालांकि, उन्होंने यह भी सफाई दी कि उनका मकसद न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को कम करना या किसी जज की निष्पक्षता पर सवाल उठाना बिल्कुल नहीं था.
चूंकि यह माफीनामा अभी आधिकारिक रूप से कोर्ट के रिकॉर्ड पर नहीं आया है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का निर्देश दिया है. अब इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होनी है, जिस पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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