झारखंड: भारत के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं, जिन्होंने अपनी उपलब्धियों से न सिर्फ अपनी पहचान बनाई, बल्कि समाज को आगे बढ़ने की नई राह भी दिखाई. बाबा कार्तिक उरांव ऐसी ही शख्सियत थे. एक छोटे से आदिवासी गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इंजीनियरिंग के क्षेत्र में पहचान बनाने और फिर देश की राजनीति में अपनी भूमिका निभाने तक का उनका सफर आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करता है.
बाबा कार्तिक उरांव का जीवन इस बात की मिसाल है कि अगर इंसान में आगे बढ़ने का जुनून हो, शिक्षा के प्रति लगन हो और अपने समाज के लिए कुछ करने का जज्बा हो, तो मुश्किल से मुश्किल रास्ते भी आसान बनाए जा सकते हैं. उन्होंने अपनी शिक्षा और प्रतिभा का इस्तेमाल केवल व्यक्तिगत सफलता के लिए नहीं किया, बल्कि आदिवासी समाज की समस्याओं को समझने और उनके समाधान के लिए भी अपना जीवन समर्पित किया.
29 अक्टूबर 2026 को उनकी 102वीं जयंती के अवसर पर उन्हें याद करना केवल एक महान नेता को श्रद्धांजलि देना नहीं है. यह उनके विचारों को समझने और यह सोचने का भी समय है कि आज हम उनके सपनों को पूरा करने के लिए क्या कर रहे हैं.
एक छोटे से गांव से अंतरराष्ट्रीय पहचान तक का सफर
बाबा कार्तिक उरांव का जन्म 29 अक्टूबर 1924 को तत्कालीन बिहार और वर्तमान झारखंड के गुमला जिले के करौंदा लिटाटोली गांव में हुआ था. उनके पिता जयर उरांव और माता बिरसी उरांव एक साधारण ग्रामीण आदिवासी परिवार से ताल्लुक रखते थे. उस दौर में दूरदराज के गांवों में शिक्षा की सुविधाएं सीमित थीं और आर्थिक परेशानियों के कारण कई बच्चों के लिए आगे पढ़ना आसान नहीं था.
लेकिन कार्तिक उरांव ने परिस्थितियों को अपनी राह की रुकावट नहीं बनने दिया. उन्होंने गुमला में शुरुआती पढ़ाई की और आगे की शिक्षा के लिए पटना पहुंचे. इसके बाद उन्होंने बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की.
उनकी प्रतिभा और महत्वाकांक्षा यहीं तक सीमित नहीं रही. बेहतर तकनीकी शिक्षा हासिल करने के लिए वे ब्रिटेन गए. वहां उन्होंने इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उच्च शिक्षा और कई व्यावसायिक योग्यताएं हासिल कीं. उन्हें नौ उच्च शैक्षणिक और पेशेवर योग्यताएं प्राप्त करने के लिए भी याद किया जाता है. ब्रिटेन में अपने करियर के दौरान वे उन्नत इंजीनियरिंग परियोजनाओं से जुड़े, जिनमें परमाणु ऊर्जा इंजीनियरिंग से संबंधित काम भी शामिल था.
उस समय किसी दूरस्थ आदिवासी गांव से निकलकर विदेश में तकनीकी क्षेत्र में अपनी जगह बनाना कोई साधारण उपलब्धि नहीं थी. उनकी सफलता ने यह साबित किया कि प्रतिभा किसी जाति, समुदाय या इलाके की मोहताज नहीं होती.
विदेश में सफलता के बाद अपने लोगों के बीच लौटे
ब्रिटेन में अच्छे करियर और बेहतर अवसरों के बावजूद बाबा कार्तिक उरांव ने भारत लौटने का फैसला किया. उन्होंने रांची स्थित हेवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन में काम किया. लेकिन उनके मन में अपने गांव, अपने लोगों और आदिवासी समाज की स्थिति को लेकर लगातार चिंता बनी रहती थी.
वे जानते थे कि उनके समुदाय के कई लोग गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक असमानता से जूझ रहे हैं. जमीन और अधिकारों से जुड़े सवाल भी गंभीर थे. ऐसे में उन्हें महसूस हुआ कि उनकी शिक्षा और अनुभव का असली महत्व तभी है, जब उनका इस्तेमाल समाज की बेहतरी के लिए किया जाए.
यही सोच उन्हें सार्वजनिक जीवन और राजनीति की ओर ले गई. उनके लिए राजनीति सिर्फ सत्ता हासिल करने का जरिया नहीं थी, बल्कि उन लोगों की आवाज बनने का माध्यम थी, जिनकी समस्याओं पर अक्सर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता था.
राजनीति में रहते हुए आदिवासी समाज की आवाज बने
बाबा कार्तिक उरांव 1967, 1971 और 1980 में लोहरदगा से लोकसभा के लिए चुने गए. वे बिहार विधानसभा के सदस्य भी रहे और केंद्र सरकार में नागरिक उड्डयन तथा संचार जैसे क्षेत्रों से जुड़ी मंत्री पद की जिम्मेदारियां संभालीं.
हालांकि, उनकी पहचान केवल राजनीतिक पदों तक सीमित नहीं थी. वे आदिवासी समाज की शिक्षा, आर्थिक स्थिति, सांस्कृतिक पहचान, जमीन के अधिकार और संवैधानिक संरक्षण जैसे मुद्दों को लेकर गंभीर थे.
उनका मानना था कि किसी समाज की तरक्की के लिए सिर्फ राजनीतिक प्रतिनिधित्व काफी नहीं है. लोगों को शिक्षित होना होगा, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनना होगा और सामाजिक व आर्थिक रूप से मजबूत होना होगा.
उन्होंने अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के माध्यम से आदिवासी समुदायों में जागरूकता और संगठन की भावना को मजबूत करने का प्रयास किया. आदिवासी पहचान और आरक्षण से जुड़े कुछ विचारों पर अलग-अलग समय में बहस भी होती रही है, लेकिन आदिवासी समाज की गरिमा और उसके विकास को लेकर उनकी प्रतिबद्धता उनके सार्वजनिक जीवन का अहम हिस्सा रही.
आधुनिक शिक्षा भी जरूरी, अपनी संस्कृति से जुड़ाव भी
बाबा कार्तिक उरांव की सोच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि वे आधुनिक शिक्षा और अपनी सांस्कृतिक पहचान को एक-दूसरे का विरोधी नहीं मानते थे.
वे चाहते थे कि आदिवासी बच्चे विज्ञान, तकनीक और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ें. वे डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक और प्रशासनिक अधिकारी बनें. साथ ही, वे अपनी भाषा, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत पर भी गर्व करें.
आज के दौर में यह विचार और भी प्रासंगिक है. दुनिया तेजी से बदल रही है. तकनीक और रोजगार के नए अवसर सामने आ रहे हैं, लेकिन कई आदिवासी भाषाओं और पारंपरिक ज्ञान को सुरक्षित रखने की चुनौती भी बनी हुई है.
बाबा कार्तिक उरांव का जीवन हमें यही सीख देता है कि आधुनिक दुनिया में आगे बढ़ने के लिए अपनी जड़ों को छोड़ना जरूरी नहीं है.
8 दिसंबर 1981 को 57 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया. उनका असमय जाना देश और आदिवासी समाज के लिए बड़ी क्षति थी. हालांकि, उनके विचार आज भी नई पीढ़ी को शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक जिम्मेदारी की राह दिखाते हैं.
आज भी आदिवासी बच्चों के सामने हैं कई चुनौतियां
आजादी के बाद देश में शिक्षा और विकास के क्षेत्र में काफी बदलाव आए हैं. झारखंड सहित देश के कई हिस्सों में स्कूलों और सरकारी योजनाओं का विस्तार हुआ है. इसके बावजूद दूरदराज के गांवों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच एक बड़ी चुनौती बनी हुई है.
कई बच्चों को स्कूल में पढ़ाई के बाद घर पर मार्गदर्शन नहीं मिल पाता. कहीं बिजली की समस्या है, कहीं किताबों और पढ़ाई की दूसरी सुविधाओं का अभाव है. कई परिवार आर्थिक तंगी के कारण अपने बच्चों को अतिरिक्त शैक्षणिक सहायता नहीं दे पाते.
ऐसे हालात में बाबा कार्तिक उरांव की विरासत को आगे बढ़ाने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि शिक्षा को समाज की साझा जिम्मेदारी बनाया जाए.
उनका जीवन बताता है कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं है. यह व्यक्ति को आत्मविश्वास देती है, अपने अधिकारों को समझने की ताकत देती है और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का अवसर भी प्रदान करती है.
कार्तिक उरांव रात्रि पाठशाला: गांवों में शिक्षा की नई पहल
बाबा कार्तिक उरांव के विचारों से प्रेरित होकर सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी डॉ. अरुण कुमार उरांव ने ग्रामीण बच्चों की शिक्षा के लिए कार्तिक उरांव रात्रि पाठशाला की पहल शुरू की. उनके मुताबिक, भारतीय पुलिस सेवा में काम करते हुए उन्हें झारखंड के दूरदराज के इलाकों में रहने वाले परिवारों और बच्चों की मुश्किलों को करीब से देखने का अवसर मिला.
लातेहार, पूर्वी सिंहभूम और संथाल परगना जैसे क्षेत्रों में काम करने के दौरान उन्होंने महसूस किया कि कई बच्चों में सीखने की अच्छी क्षमता और आगे बढ़ने की इच्छा है, लेकिन उन्हें पर्याप्त शैक्षणिक सहयोग नहीं मिल पाता.
माता-पिता भी चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर बेहतर जीवन जिएं. लेकिन सीमित आय, कामकाज की व्यस्तता और खुद औपचारिक शिक्षा के कम अवसर मिलने के कारण वे हमेशा बच्चों की पढ़ाई में मदद नहीं कर पाते.
इन्हीं अनुभवों से एक विचार सामने आया कि गांवों के पढ़े-लिखे युवा अपने आसपास के छोटे बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी क्यों न उठाएं?
इस सोच के तहत स्थानीय कॉलेजों में पढ़ने वाले युवक-युवतियों को स्वयंसेवक शिक्षक के रूप में जोड़ा गया. ये युवा अपनी पढ़ाई और रोजमर्रा के काम पूरे करने के बाद बच्चों को पढ़ाते हैं. इसके लिए उन्हें वेतन नहीं दिया जाता. वे सामाजिक जिम्मेदारी और सेवा की भावना से अपना समय देते हैं.
इस पहल का उद्देश्य केवल बच्चों का होमवर्क पूरा करवाना नहीं है. इसके जरिए गांवों में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने और युवाओं में नेतृत्व, अनुशासन तथा समाज सेवा की भावना विकसित करने का भी प्रयास किया जा रहा है.
141 गांवों के करीब 5,000 बच्चों तक पहुंच
डॉ. अरुण कुमार उरांव के अनुसार, कार्तिक उरांव रात्रि पाठशाला की पहल अब दक्षिण छोटानागपुर क्षेत्र के 141 गांवों तक पहुंच चुकी है. इन शिक्षण केंद्रों से लगभग 5,000 बच्चे जुड़े हैं, जिनमें बड़ी संख्या आदिवासी और ग्रामीण परिवारों के बच्चों की है.
इन आंकड़ों के पीछे हजारों परिवारों की उम्मीदें जुड़ी हैं. कोई माता-पिता अपनी बेटी को शिक्षिका बनते देखना चाहते हैं, तो कोई किसान चाहता है कि उसका बेटा इंजीनियर बने. दिहाड़ी मजदूरी करके परिवार चलाने वाले लोग भी चाहते हैं कि उनके बच्चों को वे अवसर मिलें, जो उन्हें खुद नहीं मिल पाए.
रात्रि पाठशालाओं में बच्चों को नियमित पढ़ाई में सहायता देने के साथ अनुशासन, साफ-सफाई, पर्यावरण के प्रति जागरूकता, बड़ों का सम्मान और अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान जैसे विषयों पर भी ध्यान दिया जाता है.
स्वयंसेवक शिक्षकों की क्षमता बढ़ाने के लिए हर दो से तीन महीने के अंतराल पर प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित करने का प्रयास किया जाता है. इनमें सेवानिवृत्त अधिकारी, अनुभवी शिक्षक, चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े पेशेवर और अन्य विशेषज्ञ अपने अनुभव साझा करते हैं.
इस पहल के पीछे सोच साफ है कि अगर गांव के युवाओं को सही मार्गदर्शन और जरूरी सहयोग मिले, तो वे अपने ही समुदाय में शिक्षा की मजबूत नींव रख सकते हैं.
कार्तिक उरांव एकेडमी ऑफ एक्सीलेंस की शुरुआत
रात्रि पाठशाला के काम को अधिक व्यवस्थित और मजबूत आधार देने के लिए रांची जिले के मांडर स्थित उचरी में कार्तिक उरांव एकेडमी ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना की गई. इस संस्थान का औपचारिक उद्घाटन 6 अप्रैल 2026 को हुआ.
फिलहाल तीन कमरों से शुरू हुई यह पहल आगे चलकर शिक्षक प्रशिक्षण, बेहतर शिक्षण पद्धतियों, व्यक्तित्व विकास और सामुदायिक भागीदारी का केंद्र बनाने की दिशा में काम कर रही है.
योजना है कि बच्चों को डिजिटल शिक्षा, विज्ञान और तकनीक की जानकारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की शुरुआती तैयारी तथा अपनी भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत को समझने के अवसर दिए जाएं.
संस्थान अभी शुरुआती दौर में है और संसाधनों की सीमाएं भी हैं. फिर भी इसके पीछे उद्देश्य यही है कि ग्रामीण बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल करने के लिए अपने गांव और आसपास ही बेहतर अवसर मिल सकें.
स्मारकों से आगे बढ़कर विचारों को अपनाने की जरूरत
महान व्यक्तित्वों की जयंती पर उनकी प्रतिमाओं पर माल्यार्पण करना, समारोह आयोजित करना और उनके योगदान को याद करना जरूरी है. लेकिन किसी व्यक्ति की विरासत को जीवित रखने के लिए इतना ही काफी नहीं है.
बाबा कार्तिक उरांव के विचार तब आगे बढ़ेंगे, जब किसी गरीब परिवार की बेटी उच्च शिक्षा हासिल करेगी, जब गांव का कोई युवा बच्चों को मुफ्त पढ़ाएगा और जब आदिवासी समाज का कोई विद्यार्थी अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखते हुए विज्ञान या तकनीक के क्षेत्र में नई उपलब्धि हासिल करेगा.
डॉ. अरुण कुमार उरांव का कहना है कि रात्रि पाठशाला की पहल एक छोटा प्रयास है. 141 गांवों और करीब 5,000 बच्चों तक पहुंचना उत्साहजनक जरूर है, लेकिन अभी भी बहुत से गांवों में बच्चों को बेहतर शैक्षणिक सुविधाओं की जरूरत है.
इसलिए इस काम को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षकों, युवाओं, अधिकारियों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों की भागीदारी जरूरी है.
युवाओं से समाज के लिए समय निकालने की अपील
बाबा कार्तिक उरांव की 102वीं जयंती पर शिक्षित युवाओं और पेशेवर लोगों से अपील की गई है कि वे अपनी क्षमता के अनुसार समाज के लिए योगदान दें.
इसके लिए किसी बड़े संगठन की स्थापना करना जरूरी नहीं है. कोई युवा सप्ताह में कुछ घंटे जरूरतमंद बच्चों को पढ़ा सकता है. कोई शिक्षक कमजोर विद्यार्थियों को अतिरिक्त मार्गदर्शन दे सकता है. कोई परिवार आर्थिक रूप से जरूरतमंद बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाने में मदद कर सकता है. इसी तरह, कोई पेशेवर अपने गांव में छोटी लाइब्रेरी या डिजिटल लर्निंग सेंटर शुरू करने में सहयोग दे सकता है.
छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़ा बदलाव ला सकते हैं. सरकार की योजनाओं और सुविधाओं की अपनी अहमियत है, लेकिन समाज की सक्रिय भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है.
बाबा कार्तिक उरांव ने अपनी शिक्षा और प्रतिभा से ऊंचाइयां हासिल कीं, लेकिन अपने लोगों से जुड़ाव कभी नहीं छोड़ा. यही बात उन्हें आज भी खास बनाती है.
बच्चों के सपनों में जिंदा रहेगी उनकी विरासत
डॉ. अरुण कुमार उरांव के लिए बाबा कार्तिक उरांव की विरासत को आगे बढ़ाना केवल एक सामाजिक पहल नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जिम्मेदारी का विषय भी है. उनका मानना है कि किसी महान व्यक्ति से पारिवारिक जुड़ाव होना अपने आप में उपलब्धि नहीं है. असली जिम्मेदारी उनके मूल्यों को समझने और समाज के हित में काम करने की है.
रात्रि पाठशालाओं में किताबें लेकर बैठने वाले बच्चे इस सोच को आगे बढ़ाने की उम्मीद हैं. हो सकता है कि इनमें से कोई आगे चलकर डॉक्टर बने, कोई वैज्ञानिक, कोई शिक्षक और कोई प्रशासनिक अधिकारी. इनमें से कोई बच्चा भविष्य में अपने गांव और पूरे समाज की तस्वीर बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
इस पहल का मकसद केवल बच्चों को पढ़ाना नहीं, बल्कि उन्हें आत्मविश्वासी, जिम्मेदार और समाज के प्रति संवेदनशील नागरिक बनाना भी है.
बाबा कार्तिक उरांव की जयंती पर सबसे बड़ा संकल्प यही होना चाहिए कि झारखंड का कोई भी प्रतिभाशाली बच्चा केवल गरीबी, सामाजिक पिछड़ेपन या गांव की दूरी के कारण शिक्षा से वंचित न रह जाए.
एक ऐसे समाज का निर्माण हो, जहां शिक्षा सबकी साझा जिम्मेदारी बने, युवा अपने समुदाय की तरक्की में भागीदार बनें और आदिवासी समाज आधुनिकता के साथ कदम मिलाते हुए अपनी सांस्कृतिक पहचान पर भी गर्व करे.
बाबा कार्तिक उरांव का जीवन हमें सिखाता है कि सफलता की असली पहचान केवल खुद आगे बढ़ने में नहीं, बल्कि दूसरों को भी आगे बढ़ने का अवसर देने में है. उनकी 102वीं जयंती पर यही संकल्प उनके प्रति सबसे सच्ची श्रद्धांजलि हो सकता है.
लेखक: डॉ. अरुण कुमार उरांव, सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी एवं संस्थापक, कार्तिक उरांव रात्रि पाठशाला, झारखंड.
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