भारत के इतिहास में 1 नवंबर की तारीख बेहद खास मानी जाती है. आज से ठीक 70 साल पहले, यानी 1 नवंबर 1956 को देश के नक्शे में ऐसा बड़ा बदलाव हुआ, जिसने भारत की प्रशासनिक व्यवस्था को एक नई दिशा दी. इसी दिन राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 लागू हुआ था. इस कानून के जरिए राज्यों की सीमाओं को नए सिरे से तय किया गया और भाषाई पहचान को राज्य गठन का एक अहम आधार बनाया गया. आज हम भारत को जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के रूप में देखते हैं, उनकी मौजूदा व्यवस्था की नींव काफी हद तक इसी फैसले से जुड़ी है.
आजादी के बाद क्यों उठने लगी अलग राज्यों की मांग?
1947 में आजादी मिलने के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक देश को प्रशासनिक रूप से व्यवस्थित करना था. उस समय देश में ब्रिटिश शासन के पुराने प्रांतों के अलावा सैकड़ों रियासतें भी थीं, जिनका धीरे-धीरे भारतीय संघ में विलय किया गया. शुरुआती दौर में राज्यों को पार्ट A, पार्ट B और पार्ट C जैसी अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया था.
हालांकि, समय के साथ एक बड़ी मांग जोर पकड़ने लगी. अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोग चाहते थे कि उनके क्षेत्र को अपनी भाषा और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर अलग राज्य का दर्जा मिले. लोगों का मानना था कि अपनी भाषा में प्रशासन और सरकारी कामकाज होने से आम जनता को ज्यादा सुविधा मिलेगी.
इस मांग ने 1952 में उस समय बड़ा रूप ले लिया, जब तेलुगु भाषी लोगों के लिए अलग आंध्र राज्य बनाने की मांग को लेकर पोट्टी श्रीरामुलु ने आमरण अनशन शुरू किया. लंबे अनशन के बाद उनकी मृत्यु हो गई. इस घटना से देशभर में आंदोलन तेज हो गए और आखिरकार 1953 में आंध्र राज्य का गठन किया गया.
फजल अली आयोग ने तैयार की पुनर्गठन की रूपरेखा
आंध्र राज्य बनने के बाद दूसरे क्षेत्रों में भी भाषाई आधार पर अलग राज्यों की मांग तेज होने लगी. सरकार के सामने चुनौती थी कि इन मांगों को किस तरह पूरा किया जाए, ताकि देश की एकता और प्रशासनिक व्यवस्था पर कोई नकारात्मक असर न पड़े.
इसी उद्देश्य से केंद्र सरकार ने 1953 में फजल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया. आयोग ने अलग-अलग क्षेत्रों की भाषा, संस्कृति, आर्थिक स्थिति और प्रशासनिक जरूरतों का अध्ययन किया. इसके बाद अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपीं.
इन सिफारिशों के आधार पर संसद ने राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 पारित किया, जो 1 नवंबर 1956 से लागू हुआ. यह आजादी के बाद भारतीय राज्यों की सीमाओं में किया गया सबसे बड़ा बदलाव था.
1956 में क्या-क्या बदला?
इस अधिनियम के लागू होते ही देश की पुरानी पार्ट A, B और C वाली व्यवस्था समाप्त कर दी गई. इसके स्थान पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की नई व्यवस्था लागू हुई.
इस पुनर्गठन के बाद भारत में कुल 14 राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए. राज्यों की सीमाओं में बड़े स्तर पर बदलाव किए गए, ताकि भाषाई और प्रशासनिक जरूरतों के बीच बेहतर तालमेल बनाया जा सके.
इस दौरान कुछ प्रमुख बदलाव भी देखने को मिले:
- आंध्र प्रदेश का गठन हुआ. इसमें आंध्र राज्य और हैदराबाद राज्य के तेलुगु भाषी क्षेत्रों को मिलाया गया.
मलयालम भाषी क्षेत्रों को मिलाकर केरल राज्य बनाया गया.
मध्य भारत, विंध्य प्रदेश, भोपाल और पुराने मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों को मिलाकर नए मध्य प्रदेश का गठन किया गया.
मैसूर राज्य का विस्तार किया गया, जिसे बाद में कर्नाटक नाम दिया गया.
त्रावणकोर-कोचीन के साथ मालाबार क्षेत्र को जोड़कर केरल का गठन किया गया.
इसके अलावा दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप क्षेत्र को केंद्र शासित प्रदेशों की व्यवस्था में रखा गया. उस समय लक्षद्वीप का प्रशासनिक नाम लक्षद्वीप, मिनिकॉय और अमीनदीवी द्वीप समूह था.
क्या भाषाई आधार पर राज्यों का गठन देश के लिए फायदेमंद रहा?
राज्य पुनर्गठन का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि लोगों को अपनी भाषा और संस्कृति के अनुरूप प्रशासनिक पहचान मिली. इससे स्थानीय स्तर पर सरकारी कामकाज आसान बनाने में मदद मिली. लोगों को अपनी भाषा में शिक्षा, प्रशासन और क्षेत्रीय मुद्दों को उठाने के बेहतर अवसर मिले.
हालांकि, यह फैसला केवल भाषाओं को ध्यान में रखकर नहीं लिया गया था. आर्थिक स्थिति, प्रशासनिक सुविधा, क्षेत्रीय संतुलन और राष्ट्रीय एकता जैसे पहलुओं को भी महत्व दिया गया. सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि क्षेत्रीय पहचान को सम्मान देते हुए देश की एकता को मजबूत रखा जाए.
1956 के बाद भी बदलता रहा भारत का नक्शा
यह समझना जरूरी है कि 1956 में हुआ पुनर्गठन भारत के राज्यों की सीमाओं में आखिरी बदलाव नहीं था. इसके बाद भी कई नए राज्य अस्तित्व में आए.
1960 में महाराष्ट्र और गुजरात अलग-अलग राज्य बने. 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद हरियाणा बना और हिमाचल प्रदेश की सीमाओं में भी बदलाव हुआ. आगे चलकर पूर्वोत्तर भारत में कई नए राज्यों का गठन हुआ. वहीं 2000 में झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड बने. इसके बाद 2014 में तेलंगाना भारत का 29वां राज्य बना. 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद देश में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की व्यवस्था फिर बदली.
आज भारत में 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश हैं.
भारतीय इतिहास में क्यों याद किया जाता है 1 नवंबर 1956?
राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 सिर्फ सीमाओं को बदलने वाला कानून नहीं था, बल्कि इसने भारत की विविधता को समझने और उसे प्रशासनिक व्यवस्था में जगह देने का रास्ता खोला. इस फैसले ने दिखाया कि अलग-अलग भाषाएं, संस्कृतियां और क्षेत्रीय पहचान होने के बावजूद देश को एक सूत्र में बांधकर रखा जा सकता है.
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