सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने राज्यों की कर निर्धारण शक्तियों पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए बिक्री कर (सेल्स टैक्स) पर अतिरिक्त कर और सरचार्ज लगाने के राज्य विधानसभाओं के विधायी अधिकार को बरकरार रखा है. प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस के.वी. विश्वनाथन, जस्टिस एस.वी. भट्टी, जस्टिस जॉयमाल्या बागची, जस्टिस एन.वी. अंजारिया और जस्टिस वी. मोहना की संविधान पीठ ने करीब 27 साल पुराने कानूनी संदर्भ पर यह अहम निर्णय दिया. अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची (प्रविष्टि 54) के तहत राज्यों के पास यह विधायी संप्रभुता मौजूद है.
‘एस. कोदार’ फैसले की वैधता कायम: अतिरिक्त टैक्स का मूल स्वरूप सेल्स टैक्स ही
संविधान पीठ ने अपने पूर्ववर्ती ऐतिहासिक ‘एस. कोदार बनाम स्टेट ऑफ केरल’ मामले के निर्णय को सही ठहराते हुए कहा कि अतिरिक्त बिक्री कर को केवल इसलिए असंवैधानिक या अवैध नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि वह मूल बिक्री कर के ऊपर लगाया गया है. शीर्ष अदालत ने रेखांकित किया कि अतिरिक्त कर या अधिभार (सरचार्ज) लगाने से कर का मूल स्वरूप नहीं बदलता; वह मूलतः बिक्री कर ही रहता है और यह केंद्र सरकार की आयकर शक्ति (संघ सूची की प्रविष्टि 82) के अधिकार क्षेत्र में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं है.
ओडिशा के 27 साल पुराने मामले से उपजा था संवैधानिक विवाद
यह विवाद ‘मेसर्स अर्जुन फ्लोर मिल्स बनाम स्टेट ऑफ ओडिशा’ मामले से जुड़ा था, जिसमें ओडिशा सेल्स टैक्स एक्ट 1947 की धारा 5A की वैधता को चुनौती दी गई थी. इस प्रावधान के जरिए ओडिशा सरकार ने डीलरों के वार्षिक टर्नओवर के आधार पर 10 प्रतिशत और 15 प्रतिशत अतिरिक्त बिक्री कर लागू किया था. अपीलकर्ताओं का तर्क था कि टर्नओवर पर अतिरिक्त टैक्स लगाना एक प्रकार से आय पर कर लगाने जैसा है, जो केंद्र के क्षेत्राधिकार में आता है. हालांकि, संविधान पीठ ने इस दलील को खारिज कर राज्यों के विधायी अधिकार पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी.
जीएसटी युग में भी सिद्धांत का महत्व बरकरार
संविधान पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि वस्तु एवं सेवा कर (GST) व्यवस्था लागू होने के बाद पुराने सेल्स टैक्स कानूनों की जगह नए कराधान ढांचे ने ले ली है, जिसके कारण मूल संदर्भ में उठाया गया यह प्रश्न आज के समय में काफी हद तक अकादमिक हो चुका है. इसके बावजूद, कोर्ट ने यह सिद्धांत स्पष्ट कर दिया कि राज्यों के पास अपने संवैधानिक दायरे में कर और अधिभार लगाने का अधिकार आज भी सुरक्षित है.
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