1962 भारत-चीन युद्ध
आए मेरे वतन के लोगों,
जरा आँख में भर लो पानी,
जो शहीद हुए हैं उनकी
जरा याद करो क़ुर्बानी.
8 सितंबर 1962 को चीनी सैनिकों ने विवादित थागला रिज के उत्तर में स्थित छोटे भारतीय चौकी त्सेनजंग को घेर लिया. रक्षा मंत्री वीके कृष्णा मेनन ने सेना प्रमुख जनरल पीएन थापर की सलाह को ठुकराते हुए सेना को आगे बढ़ने का आदेश दिया. सेना ने हिचकिचाते हुए भी अपनी जगह पर डटे रहने का फैसला किया.
30 सितंबर को विदेश यात्रा से लौटे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस बात से आगबबूला हो गए कि सरकार के आदेश लागू नहीं हुए. उन्होंने फिर से थापर की सलाह को नजरअंदाज करते हुए चिल्लाकर कहा,
मुझे परवाह नहीं अगर चीनी दिल्ली तक आ जाएं, उन्हें थागला से बाहर निकालना ही होगा.
17 अक्टूबर को 7 ब्रिगेड ने अनिच्छा से थागला से चीनी सैनिकों को हटाने का हमला शुरू किया.
आम धारणा के विपरीत, सैन्य कार्रवाई की शुरुआत भारत ने ही की थी. यह निर्णय दोहरी स्वतंत्रता का उदाहरण था, वास्तविकता से भी पूरी तरह स्वतंत्र.
नामका चू में 7 ब्रिगेड का सफाया
थागला पर भारतीय प्रयास विफल होने के बाद चीनी सेना ने 19 अक्टूबर को नामका चू नदी के पार जवाबी हमला बोल दिया. 23 अक्टूबर तक पीएलए की लगभग तीन रेजिमेंटों ने ब्रिगेडियर जॉन डालवी की कमान वाली 7 ब्रिगेड को पूरी तरह नष्ट कर दिया और तवांग से मात्र दस मील दूर पहुंच गई. डालवी बंदी बना लिए गए.
24 अक्टूबर को चीनी सेना बिना विरोध के तवांग में दाखिल हो गई. उसी रात वे नेफा के दूसरे छोर पर वालोंग के सामने भी जमा होने लगे. तवांग और वालोंग दोनों नेफा के अंदर काफी गहरे स्थित थे.
पश्चिमी क्षेत्र में भी लेफ्टिनेंट जनरल दौलत सिंह के कुशल संसाधन प्रबंधन के बावजूद चीनी सेना ने 21 अक्टूबर तक अपने दावे की रेखा के अंदर लगभग सारा क्षेत्र कब्जा कर लिया. इसके बाद सभी क्षेत्रों में युद्ध में एक ठहराव आ गया.
चीन का शांति प्रस्ताव और दिल्ली का इनकार
24 अक्टूबर को चीन ने एक बयान जारी कर तीन प्रस्ताव रखे. दोनों पक्ष नवंबर 1959 की वास्तविक नियंत्रण रेखा का सम्मान करें और अपनी सेनाएं उस रेखा से बीस किलोमीटर पीछे हटाएं. यदि भारत सहमत हो तो चीन पूर्वी क्षेत्र में मैकमोहन रेखा के उत्तर में वापस चला जाएगा. और दोनों प्रधानमंत्री नई दिल्ली या पेकिंग में बैठकर मैत्रीपूर्ण समाधान निकालें.
उसी दिन नई दिल्ली ने इन प्रस्तावों को खारिज कर दिया. 4 नवंबर को चाऊ एनलाई ने नेहरू को पत्र लिखकर चीनी प्रस्तावों की सिफारिश की. नेहरू ने 7 नवंबर को जवाबी प्रस्ताव दिया कि चीनी 8 सितंबर की स्थिति में लौट जाएं, उसके बाद बातचीत होगी.
अमेरिका से मदद और बदलता माहौल
इस कूटनीतिक खींचतान के दौरान दो बड़ी घटनाएं हुईं. 28 अक्टूबर को रूस क्यूबा से पीछे हट गए. 29 अक्टूबर को अमेरिकी राजदूत जॉन केनेथ गालब्रेथ ने नेहरू से मुलाकात कर भारत को जितने भी सैन्य उपकरण चाहिए देने की पेशकश की. पांच दिनों के अंदर सामान आने लगा और जल्द ही अमेरिकी तथा ब्रिटिश विमान दिन में आठ-आठ उड़ानें भरकर बीस-बीस टन हथियार उतारने लगे.
विडंबना यह थी कि कुछ सप्ताह पहले ही नेहरू ने पश्चिमी सैन्य सहायता लेने के सुझाव को सैन्य गुट में शामिल होने के बराबर बताया था और कहा था कि सीमा पर आपदा आने पर भी भारत कभी ऐसा नहीं करेगा. 7 ब्रिगेड की आपदा नवंबर में 4 डिवीजन पर आने वाली आपदा के सामने छोटी थी.
तवांग और वालोंग तक तेजी से चीनी आगे बढ़ने के बाद आए ठहराव ने राष्ट्रीय नेताओं को आत्ममंथन और यथार्थवाद की ओर नहीं धकेला. बल्कि हार ने जोश और उत्साह की लहर पैदा की, जो बाद में केवल कारगिल संघर्ष में ही दोबारा दिखी. लोकसभा ने आपातकाल पर भारतीय जनता की अद्भुत और स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया की प्रशंसा की. डॉ राममनोहर लोहिया ने कहा, हमारे शहीद जवानों का खून एक नए, वीर राष्ट्र का बीज बन रहा है. कोई आश्चर्य नहीं कि नेहरू ने टिप्पणी की, हमने इतना अच्छा समय कभी नहीं देखा.
सूती वर्दी और 303 राइफल से लड़ते जवान
नामका चू की करारी हार के कारणों पर विचार करने के बजाय नेताओं ने खुद को यह विश्वास दिलाया कि वे चीनियों को पीछे धकेल सकते हैं. 7 ब्रिगेड को संदिग्ध युद्ध में झोंकने का फैसला उच्चतम स्तर पर मोर्चे पर कमांडरों की सलाह को दरकिनार कर लिया गया था. नेता तथ्यों से अनजान थे.
12-14 हजार फीट की ऊंचाई पर लड़ रहे जवानों के पास केवल सूती वर्दी, एक-एक कंबल और प्राचीन 303 राइफलें थीं, जिनमें लगभग चालीस कारतूस थे. पश्चिमी छोटे हथियारों की भारी हवाई आपूर्ति ने भी इस हकीकत को ज्यादा नहीं बदला. राहत मांगने और सैन्य नेताओं को अगली लड़ाई का समय तथा स्थान चुनने का अवसर देने के बजाय संसद और सेना दोनों में राजनेता फिर से एक और दौर के लिए दबाव बनाते रहे.
बॉमडिला की बजाय से ला पर अड़े जनरल कौल
नेफा की प्रारंभिक पराजयों के बाद नवगठित IV कोर के कमांडर नियुक्त लेफ्टिनेंट जनरल बीएम कौल फुफ्फुसीय शोफ से पीड़ित होकर दिल्ली लौट गए. लेफ्टिनेंट जनरल हरबख्श सिंह ने उनका स्थान संभाला. उन्होंने बदली हुई सामरिक स्थिति का अध्ययन कर बॉमडिला को अगला रक्षा बिंदु तय किया. लेकिन केवल चार दिन बाद कौल, जो अब स्वस्थ हो चुके थे, लौट आए. उनके साथ डीएमओ ब्रिगेडियर डीके पालित भी थे. पालित कौल के प्रिय थे और दिल्ली दरबार की कार्यप्रणाली से भली-भांति परिचित थे. वे पहले उसी बदकिस्मत 7 ब्रिगेड की कमान संभाल चुके थे.
उपलब्ध सैनिकों और आपूर्ति को देखते हुए सैन्य तर्क बॉमडिला में एकाग्रता की मांग करता था. 1959 में लेफ्टिनेंट जनरल थोराट द्वारा तैयार नेफा की तीन-स्तरीय रक्षा योजना में कम से कम चार ब्रिगेड की जरूरत बताई गई थी. 1961 में थोराट से पूर्वी कमान संभालने वाले लेफ्टिनेंट जनरल एलपी सेन ने दो डिवीजन या छह ब्रिगेड की आवश्यकता बताई थी. नामका चू की तबाही के बाद 4 डिवीजन के पास केवल दो ब्रिगेड बचे थे. लेकिन दिल्ली से ताजा लौटे कौल और पालित ने यह बात फैलाई कि बॉमडिला से साठ मील आगे और तवांग के करीब स्थित से ला को अवश्य थामा जाना चाहिए. राजनेता इसकी हानि सहन नहीं कर सकते थे.
नेहरू के जन्मदिन पर वालोंग का मूर्खतापूर्ण हमला
14 नवंबर 1962 प्रधानमंत्री का तिहत्तरवां जन्मदिन था. ऐसे मौकों के महत्व से सचेत कौल ने उन्हें उपयुक्त उपहार देना चाहा. उन्होंने वालोंग क्षेत्र में हमला बोलकर चीनी सेना को मैकमोहन रेखा के उस पार धकेलने का आदेश दिया. यह शायद उनका अब तक का सबसे मूर्खतापूर्ण आदेश था.
पीएलए के पास रीमा में पूरा डिवीजन तैनात था, जबकि भारतीय सेना की नई 2 डिवीजन के पास वालोंग में केवल तीन बटालियन थीं. पीएलए ने जबरदस्त जवाब दिया. 11 ब्रिगेड ने बहादुरी से लड़ाई लड़ी, लेकिन 17 नवंबर तक लगभग पूरी तरह नष्ट हो गई. उसी समय दिल्ली के अखबार हमले की तारीफ कर रहे थे.
से ला से बॉमडिला तक पूरी पराजय
से ला पर चीनी सेना का सामना करने के फैसले ने बॉमडिला की सेना को पतला कर दिया, जहां अब केवल छह कंपनियां बची थीं. कौल और पालित ने यह कल्पना नहीं की कि चीनी से ला को बड़े पैमाने पर बाईपास कर सकते हैं. लेकिन उन्होंने ठीक यही किया. वे बेली ट्रेल नामक रास्ते से आए, जिसे ब्रिटिश अधिकारी ने तवांग जाने वाले पारंपरिक याक चरवाहों के मार्ग के रूप में फिर से खोजा था.
से ला में मुख्य रक्षा केंद्रित 4 डिवीजन बहुत बिखरी हुई थी और पीएलए ने उसके पीछे से हमला शुरू कर दिया. 62 ब्रिगेड को से ला खाली करने के आदेश जब निकले, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. वे कट गए और उनके कमांडर ब्रिगेडियर होशियार सिंह 17 नवंबर को लड़ते हुए शहीद हो गए. अगले दिन से ला और बॉमडिला के बीच दिरांग द्जोंग स्थित डिवीजनल मुख्यालय गिर गया. 20 नवंबर को बॉमडिला गिर गया. नेफा में पूरी तरह से पराजय हो चुकी थी.
नेहरू का राष्ट्र के नाम संदेश और युद्धविराम
उस रात जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्र को संबोधित किया. असम के लोगों के लिए उनके संबोधन में विशेष स्थान था. उन्होंने कहा, नेफा के उत्तरी भाग में विशाल चीनी सेनाएं आगे बढ़ रही हैं. हमें वालोंग, से ला में पराजय हुई है और आज नेफा का छोटा कस्बा बॉमडिला भी गिर गया है. हम तब तक नहीं रुकेंगे जब तक आक्रमणकारी भारत से बाहर न चला जाए या बाहर न निकाल दिया जाए. मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं, विशेष रूप से असम के हमारे देशवासियों से, जिनके प्रति इस क्षण हमारा हृदय व्यथित है.
उसी रात नेहरू ने अमेरिका से भारतीय क्षेत्र पर चीनी सेनाओं के खिलाफ हवाई हमलों के लिए तत्काल अपील की. सौभाग्य से 21 नवंबर को चीन ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा कर दी.
यह लेख 1962 के नेफा संघर्ष की उन घटनाओं और निर्णयों का संक्षिप्त लेकिन तथ्यपरक चित्रण है, जो राजनीतिक हठ, सैन्य सलाह की उपेक्षा और वास्तविकता से कटने का परिणाम थे. शहीदों की कुर्बानी को याद रखते हुए हमें इतिहास से सबक लेना चाहिए.
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