Jaati Zinda Hai By Suraj Yengde
Jaati Zinda Hai Hindi Book Review: आजकल ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ जोरों पर है. सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक, जाति-आधारित आरक्षण को खत्म करने या इसे आर्थिक आधार पर बदलने की मांग तेज हो रही है. ऐसे में भारत के जातीय विमर्श को गहराई से समझना जरूरी हो जाता है. डॉ. सुरज मिलिंद येनगड़े की किताब ‘जाति जिंदा है’ (मूल अंग्रेजी: Caste Matters, पेंगुइन स्वदेश) इसी विमर्श को सामने लाती है.
येनगड़े खुद दलित परिवार से हैं. नांदेड़ की दलित बस्ती में पले-बढ़े, उन्होंने जाति के रोजमर्रा के अपमान, अपमान और लचीलेपन को अपनी जिंदगी से गुजरा है. किताब में वे अपनी व्यक्तिगत यादों को सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण से जोड़ते हैं. वे बताते हैं कि जाति सिर्फ आरक्षण या अत्याचार की घटनाओं तक सीमित नहीं है. यह एक ऐसी व्यवस्था है जो ऊपरी जातियों के विशेषाधिकार को बनाए रखती है, लेकिन शायद ही कभी उस पर सवाल उठाया जाता है.
जाति सिर्फ ‘नीचे वालों’ की समस्या नहीं
किताब का मुख्य तर्क यह है कि जाति की चर्चा को सिर्फ दलित-बहुजनों पर होने वाले अत्याचार या आरक्षण तक सीमित कर देना अधूरा है. जाति वह व्यवस्था है जो सवर्ण समाज को लाभ पहुंचाती है और जिसे वे अक्सर नकारते या अनदेखा करते हैं. येनगड़े कहते हैं कि जब तक ब्राह्मणवाद (जाति की श्रेष्ठता का विचार) के खिलाफ सवर्ण खुद नहीं खड़े होंगे, तब तक असली बदलाव मुश्किल है. किताब का आखिरी अध्याय ‘ब्राह्मणों के खिलाफ ब्राह्मणवाद’ इसी आह्वान से भरा है.
आरक्षण हटाओ आंदोलन के समर्थक अक्सर कहते हैं कि आरक्षण योग्यता को नुकसान पहुंचाता है या अब जरूरत नहीं रही. येनगड़े की किताब इस सोच को चुनौती देती है. वे याद दिलाते हैं कि जाति अभी भी राजनीति, नौकरशाही, न्यायपालिका और रोजमर्रा की जिंदगी में कांच की छत की तरह मौजूद है. दलितों के लिए अपमान, भेदभाव और हिंसा आम हैं. आरक्षण को सिर्फ ‘रियायत’ मानना और जाति व्यवस्था को नजरअंदाज करना, समस्या को उल्टा कर देता है.
दलित प्रेम और आंतरिक चुनौतियां
किताब का सबसे प्रभावशाली हिस्सा ‘दलित प्रेम’ की अवधारणा है. येनगड़े इसे जाति की बीमारी का सबसे शक्तिशाली इलाज बताते हैं. यह प्रेम, करुणा, माफी और न्याय का मिश्रण है, जो बंद दिमागों में घुसकर बदलाव ला सकता है. वे कहते हैं कि भारत में अरेंज्ड मैरिज का चलन आंशिक रूप से दलित प्रेम के डर से है, क्योंकि यह रूढ़िवादी सोच को तोड़ सकता है.
साथ ही, येनगड़े दलित समुदाय के अंदर की विभाजनों पर भी खुलकर लिखते हैं. वे ‘टोकन दलित’, ‘एलीट दलित’, ‘सेल्फ-ऑब्सेस्ड दलित’ और ‘रेडिकल दलित’ जैसी श्रेणियों की बात करते हैं. कुछ दलित आरक्षण का लाभ लेकर समुदाय से दूरी बना लेते हैं या ‘दलित पूंजीवाद’ का सपना देखते हैं. येनगड़े इसे अधूरा और भ्रामक मानते हैं, क्योंकि पूंजीवाद खुद जाति से जुड़ा हुआ है और उत्पीड़न को खत्म नहीं करता.
वैश्विक नजरिया और वर्तमान प्रासंगिकता
किताब जाति को सिर्फ भारतीय समस्या नहीं मानती. यह नस्ल, वर्ग और लिंग जैसे अन्य उत्पीड़नों से उसकी समानता दिखाती है. येनगड़े बाद में Caste: A Global Story में इसे और विस्तार देते हैं, लेकिन Caste Matters में ही दलित अनुभव को वैश्विक संदर्भ में रखने की कोशिश दिखती है.
आज जब आरक्षण हटाने की मांग तेज है, तो किताब याद दिलाती है कि आरक्षण का मुद्दा जाति व्यवस्था के अंत से जुड़ा है. जैसा कि केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने हाल में कहा कि जाति व्यवस्था खत्म करो, फिर आरक्षण की जरूरत नहीं रहेगी. लेकिन जाति व्यवस्था खत्म करने के लिए सिर्फ नीतिगत बदलाव काफी नहीं. इसके लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और मानसिक बदलाव जरूरी है, जिसकी शुरुआत सवर्ण समाज की आत्म-आलोचना और दलित अनुभव को सुनने से होती है.
‘जाति जिंदा है’ कोई आसान किताब नहीं. यह गुस्से, प्रेम, आलोचना और आह्वान का मिश्रण है. कुछ पाठकों को यह कड़वी लगेगी, कुछ को प्रेरणादायक. लेकिन आरक्षण हटाओ आंदोलन के इस दौर में यह किताब पढ़ना जरूरी है. क्योंकि बिना जाति को समझे, बिना उसके विशेषाधिकार को स्वीकार किए, और बिना दलित अनुभव को केंद्र में रखे, कोई भी बहस अधूरी रहेगी.
जाति तब तक मायने रखेगी, जब तक हम उसे मिटाने का ईमानदार प्रयास नहीं करते. येनगड़े की किताब उसी प्रयास की ओर इशारा करती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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