Vani Prakashan Books 2026: प्रख्यात आलोचक शंभुनाथ जी द्वारा लिखित और वाणी प्रकाशन (2026) द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘छायावाद का देश’ हिंदी साहित्य के स्वर्ण युग का एक नया और गहरा पुनर्मूल्यांकन है. यह किताब समकालीन संकटों के बीच छायावादी कवियों की रचनाओं को एक नए दृष्टिकोण से परखती है.
इस पुस्तक में छायावाद को केवल एक काव्य-आंदोलन न मानकर एक सांस्कृतिक और भावात्मक ‘देश’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है. लेखक ने प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी वर्मा के साहित्य के जरिए आज के उपभोक्तावाद, हिंसा और पर्यावरणीय संकट के दौर में विश्व-मानवतावादी मूल्यों और प्रकृति-प्रेम की प्रासंगिकता को रेखांकित किया है
एक युगांतरकारी साहित्यिक विमर्श
हिंदी साहित्य के स्वर्ण युग छायावाद को समकालीन संदर्भ में पुनर्मूल्यांकित करने वाली एक महत्वपूर्ण कृति प्रख्यात आलोचक, विचारक और शिक्षाविद् शंभुनाथ जी की पुस्तक ‘छायावाद का देश’ है.वाणी प्रकाशन द्वारा वर्ष 2026 में प्रकाशित यह पुस्तक उत्तर-मानवतावाद (post-humanism) के युग में जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा की रचनाओं का एक गहन और नया पुनर्निरीक्षण प्रस्तुत करती है.
समकालीन संकट और छायावादी दृष्टि
इस पुस्तक का शीर्षक ही अत्यंत सार्थक है. लेखक छायावाद को केवल एक साहित्यिक आंदोलन नहीं, बल्कि एक ‘देश’ मानते हैं एक ऐसा सांस्कृतिक और भावात्मक भू-भाग, जो 20वीं शताब्दी की राष्ट्रीय चेतना, प्रकृति-प्रेम, उदात्त मानवतावाद और सौंदर्यबोध की जीवंत अभिव्यक्ति था.
आज के पर्यावरणीय संकट, सामुदायिक विभेद, उपभोक्तावाद और हिंसा के दौर में यह पुस्तक हमें याद दिलाती है कि छायावाद सिर्फ एक काव्य-धारा नहीं, बल्कि जीवन को देखने की एक मुकम्मल दृष्टि थी. पुस्तक की भूमिका के अनुसार, यह सभ्यता के मलबे से दबते गए एक महान सांस्कृतिक आंदोलन का पुनः उद्घाटन है, जो देशप्रेम और प्रकृति प्रेम के साथ ‘अ-पर’ की एक विश्वमानवतावादी आवाज रहा है.
साहित्यिक गहराई और प्रासंगिकता
कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में लंबे समय तक अध्यापन कर चुके शंभुनाथ जी (जन्म: 21 मई 1948) वर्तमान में भारतीय भाषा परिषद के निदेशक और ‘वागर्थ’ मासिक के संपादक हैं. उनकी लेखनी में गहन शोध और समकालीन प्रासंगिकता का सुंदर समन्वय दिखता है. इस पुस्तक में उन्होंने प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी की कविता, नाटक, उपन्यास और कहानियों को समग्रता में समेटा है.
यह कृति छायावाद को राष्ट्रीयता और विश्व-मानवता के बीच के सेतु के रूप में स्थापित करती है और मानवीय मूल्यों के क्षरण के बीच इसकी प्रासंगिकता पर विचार करती है. साहित्यिक हलकों में सराही गई यह पुस्तक हमें अपनी जड़ों से जुड़ने और उस ‘खोए देश’ को फिर से पाने का निमंत्रण देती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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