Bharat Express DD Free Dish

‘BA के बाद MA, फिर क्या?’ वित्त मंत्री और नीति आयोग की रिपोर्ट ने स्वीकारी शिक्षा तंत्र की नाकामी

नीति आयोग की रिपोर्ट और वित्त मंत्री के बयान ने देश की शिक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. स्नातकों में 13% बेरोजगारी दर के बीच, रिपोर्ट चेतावनी देती है कि बिना कौशल-आधारित शिक्षा के ‘विकसित भारत 2047’ का सपना अधूरा रह जाएगा.

NITI Aayog Report Highlights Deep Gap In Indian Education System Bharat Express
Edited by Vaibhav Gupta

नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट ‘Reimagining Skilling for Viksit Bharat@2047’ ने एक बार फिर वही बात कही है जो लंबे समय से जानी-पहचानी है कि हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था और श्रम बाजार के बीच गहरा अंतराल है. भारतीय युवा (खासकर 19-29 आयु वर्ग के पढ़े-लिखे) बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं.

स्नातकों में बेरोजगारी दर 13 प्रतिशत है, जबकि युवतियों में यह 20.4 प्रतिशत तक पहुंच जाती है. राष्ट्रीय बेरोजगारी दर 3.2 प्रतिशत के मुकाबले यह आंकड़ा चौंकाने वाला है. रिपोर्ट के अनुसार केवल 8.25 प्रतिशत स्नातक ही अपनी योग्यता के अनुरूप काम कर रहे हैं. बाकी ज्यादातर generic डिग्री (बीए, बीएससी, बीकॉम) लेकर ऐसे कामों में लगे हैं जो उनकी पढ़ाई से मेल नहीं खाते.

‘विश्वविद्यालय ज्यादातर डिग्रीधारी युवा पैदा करते हैं’

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस को दिए साक्षात्कार में यही बात दोहराई. उन्होंने साफ कहा कि हमारे कॉलेज और विश्वविद्यालय ज्यादातर डिग्रीधारी युवा पैदा करते हैं, जो न तो खुद को कर्मचारी के रूप में संभाल सकते हैं और न ही कोई काम शुरू करने की क्षमता रखते हैं. ‘After BA, you go for MA. Then?’ यह सवाल उन्होंने खुद उठाया.

केंद्र की नीतियां का पड़ता है असर

नीति आयोग मोदी सरकार द्वारा स्थापित एक महत्वपूर्ण संस्था है. वित्त मंत्री भी उसी सरकार का हिस्सा हैं. जब ये दोनों स्रोत शिक्षा व्यवस्था पर इतनी स्पष्ट टिप्पणी कर रहे हैं, तो जिम्मेदारी का सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 12 वर्षों से देश का नेतृत्व कर रहे हैं. उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक कई राज्यों में भाजपा या एनडीए की सरकारें हैं. शिक्षा राज्य का विषय है, लेकिन केंद्र की नीतियां, फंडिंग, पाठ्यक्रम सुधार और कौशल विकास कार्यक्रमों का प्रभाव पूरे देश पर पड़ता है.

जब कोई सरकारी स्कूल की खस्ताहाल स्थिति की वीडियो सोशल मीडिया पर डालता है, तो अक्सर वीडियो बनाने वाले की मंशा पर सवाल उठाए जाते हैं. यह बहस अलग हो सकती है. लेकिन नीति आयोग और वित्त मंत्री की मंशा संदेह से परे है. वे खुद सिस्टम की कमजोरी स्वीकार कर रहे हैं.

कौशल आधारित शिक्षा की ओर बढ़ना जरूरी

प्रधानमंत्री का लक्ष्य 2047 तक विकसित भारत (Viksit Bharat) बनाना है. यह लक्ष्य शिक्षा की गुणवत्ता सुधारे बिना हासिल करना मुश्किल है. डिग्री बांटने वाली व्यवस्था से कौशल आधारित, उद्योग-जुड़ी शिक्षा की ओर बढ़ना जरूरी है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020, स्किल इंडिया, अप्रेंटिसशिप बढ़ाने के प्रयास हुए हैं, लेकिन रिपोर्ट बताती है कि परिणाम अभी भी अपर्याप्त हैं. ज्यादातर स्नातक अभी भी सरकारी नौकरी की होड़ में हैं. एक तरफ 55 हजार पदों के लिए करोड़ों आवेदन, दूसरी तरफ कौशल की कमी.

‘फेल’ शब्द हटाना समाधान नहीं

समस्या नई नहीं है, यह दशकों पुरानी संरचनात्मक खामी है. पाठ्यक्रम उद्योग की जरूरतों से कटे हुए, प्रैक्टिकल ट्रेनिंग की कमी, और डिग्री को ही सफलता का मापदंड मानने वाली मानसिकता. लेकिन 12 साल के शासन के बाद भी अगर सरकार की अपनी संस्था और मंत्री यह कह रहे हैं कि डिग्री नौकरी के लायक नहीं बना रही, तो जवाबदेही से बचा नहीं जा सकता. बिहार के शिक्षा मंत्री की तरह मार्कशीट से ‘फेल’ शब्द हटाने जैसी घोषणाएं समस्या का समाधान नहीं हैं. वे सिर्फ असुविधाजनक सच्चाई को छिपाने का तरीका हैं.

आकड़े नहीं बल्कि चेतावनी

विकसित राष्ट्र बनने के लिए ईमानदारी से शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल उठाने होंगे. स्कूल की इमारत से लेकर विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम तक, शिक्षक प्रशिक्षण से लेकर उद्योग-शैक्षणिक साझेदारी तक. नीति आयोग की रिपोर्ट सिर्फ आंकड़े नहीं दे रही, बल्कि चेतावनी दे रही है. अब जरूरत है कि इस चेतावनी को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठाकर ठोस सुधार में बदला जाए. क्योंकि युवाओं का भविष्य और 2047 का सपना दोनों इसी पर निर्भर हैं.

यह भी पढ़ें: ‘2 घंटे में 10 बार शुरू हुआ पेपर’, 2,445 छात्र प्रभावि; NBEMS ने कहा दोबारा होगा एग्जाम

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read