भारत जैसे विशाल और विविध देश में एक सवाल लंबे समय से बहस का विषय रहा है—क्या हमारे राज्यों का आकार प्रशासन को आसान बनाता है या मुश्किल? उत्तर प्रदेश की आबादी आज दुनिया के कई बड़े देशों से ज्यादा है. दूसरी ओर, देश की कुल आबादी और अर्थव्यवस्था पिछले कई दशकों में जिस तेजी से बढ़ी है, उससे सरकार के सामने चुनौतियां भी पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा जटिल हो गई हैं. ऐसे में बड़े राज्यों को छोटे और अधिक प्रबंधनीय प्रशासनिक हिस्सों में बांटने की मांग समय-समय पर उठती रही है.
तेलंगाना ने फिर शुरू की बहस
2014 में आंध्र प्रदेश से अलग होकर तेलंगाना एक नया राज्य बना. इसके पीछे लंबे समय तक चला क्षेत्रीय आंदोलन था. राज्य बनने के बाद तेलंगाना ने आर्थिक विकास के कई मोर्चों पर तेजी दिखाई और उसकी प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ी. समर्थकों के लिए यह उदाहरण इस बात का संकेत है कि अपेक्षाकृत छोटा प्रशासनिक क्षेत्र सरकार को स्थानीय जरूरतों पर ज्यादा ध्यान देने का अवसर दे सकता है.
लेकिन भारत में राज्य बनाना सिर्फ प्रशासनिक सीमाएं खींचने का मामला नहीं है. इसके पीछे भाषा, संस्कृति, इतिहास, क्षेत्रीय पहचान और आर्थिक परिस्थितियां भी जुड़ी होती हैं. यही वजह है कि नए राज्यों की मांग देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग समय पर सामने आती रही है.
विदर्भ को अलग राज्य बनाने की मांग महाराष्ट्र में लंबे समय से मौजूद है. उत्तर प्रदेश को छोटे राज्यों में बांटने की बात भी कई बार राजनीतिक मंचों पर उठी है. तमिलनाडु में भी कुछ नेताओं और संगठनों ने उत्तरी हिस्से को अलग राज्य बनाने की मांग रखी है. इन मांगों के पीछे तर्क अलग-अलग हैं, लेकिन एक साझा सवाल जरूर है—क्या बड़े राज्य प्रशासन की दृष्टि से बहुत ज्यादा बोझिल हो चुके हैं?
सिर्फ भाषा के आधार पर नहीं बने थे राज्य
भारत में राज्यों के गठन को अक्सर भाषाई आधार से जोड़कर देखा जाता है. आज के कई राज्यों की पहचान निश्चित रूप से भाषा से मजबूत रूप से जुड़ी है, लेकिन देश का प्रशासनिक इतिहास इससे कहीं अधिक जटिल रहा है.
एक ही राज्य के भीतर कई भाषाएं, बोलियां, संस्कृतियां और ऐतिहासिक क्षेत्र मौजूद हैं. उत्तर प्रदेश को ही देखें तो पश्चिमी हिस्से की ब्रज और खड़ी बोली की सांस्कृतिक पहचान मध्य क्षेत्र की अवधी से अलग है. इसी तरह बिहार में मिथिला, मगध और भोजपुर जैसे क्षेत्रों की अपनी अलग सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान है.
इसी तरह मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के भीतर भी अलग-अलग क्षेत्रीय पहचान देखने को मिलती है. सवाल यह है कि क्या इन विविधताओं को प्रशासनिक ढांचे में भी अलग पहचान मिलनी चाहिए?
दशकों पहले उठी थी पुनर्गठन की बात
1973 में डॉ. रशीदुद्दीन खान ने सेमिनार पत्रिका में भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का तर्क दिया था. उनके प्रस्ताव में देश को कई अलग-अलग सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों के आधार पर देखने की कोशिश की गई थी.
उत्तर प्रदेश और बिहार के संदर्भ में उन्होंने उत्तरांचल, रोहिलखंड, ब्रज, अवध, भोजपुर, मिथिला, मगध और झारखंड जैसे क्षेत्रों की पहचान की थी. इनमें उत्तरांचल यानी आज का उत्तराखंड और झारखंड बाद में अलग राज्य बन गए. बाकी क्षेत्र आज भी बड़े राज्यों का हिस्सा हैं.
इस दृष्टिकोण के समर्थकों का तर्क है कि अगर किसी क्षेत्र की भाषा, संस्कृति, भौगोलिक परिस्थितियां और आर्थिक जरूरतें अलग हैं, तो उसके प्रशासन को भी उसी हिसाब से व्यवस्थित किया जा सकता है.
आज का भारत 1970 के दशक के भारत जैसा नहीं है. आबादी में भारी वृद्धि हुई है, अर्थव्यवस्था कई गुना बड़ी हुई है और सरकारी योजनाओं तथा प्रशासनिक जिम्मेदारियों का दायरा भी लगातार बढ़ा है.
देश की बड़ी आबादी युवा है. युवाओं के लिए रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास और बुनियादी ढांचे की जरूरतें पहले से कहीं ज्यादा हैं. साथ ही तकनीक ने सरकारी कामकाज को बदल दिया है. लोगों की उम्मीदें भी बढ़ी हैं. ऐसे में प्रशासन से सिर्फ योजनाएं बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें जमीन पर तेजी और प्रभावी तरीके से लागू करने की अपेक्षा की जाती है.
यहीं से छोटे राज्यों की बहस को एक नया आधार मिलता है.
क्या छोटा राज्य मतलब बेहतर शासन?
छोटे राज्य अपने आप बेहतर शासन की गारंटी नहीं देते. असली सवाल प्रशासन की क्षमता, संस्थाओं की मजबूती, वित्तीय संसाधनों, जवाबदेही और स्थानीय स्तर तक निर्णय लेने की शक्ति का है.
फिर भी छोटे प्रशासनिक क्षेत्र का एक संभावित फायदा यह हो सकता है कि सरकार और जनता के बीच दूरी कम हो. जब किसी सरकार को बहुत बड़े भूगोल और करोड़ों लोगों की अलग-अलग जरूरतों को संभालना पड़ता है, तो स्थानीय समस्याओं पर समान स्तर का ध्यान देना मुश्किल हो सकता है.
विकेंद्रीकरण का मतलब केवल राजधानी से जिलों तक आदेश भेजना नहीं है. स्थानीय अधिकारियों और संस्थाओं के पास निर्णय लेने की पर्याप्त शक्ति भी होनी चाहिए. साथ ही उनकी निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था जनता के करीब होनी चाहिए.
नए राज्य बनाने की मांग को अक्सर राजनीतिक महत्वाकांक्षा से जोड़कर देखा जाता है. यह बात कुछ मामलों में राजनीतिक बहस का हिस्सा हो सकती है, लेकिन हर क्षेत्रीय मांग को केवल सत्ता की राजनीति मान लेना भी पर्याप्त नहीं होगा.
कई क्षेत्रों की अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियां होती हैं. वहां के लोग लंबे समय से प्रशासनिक उपेक्षा, क्षेत्रीय असंतुलन या अलग पहचान जैसे मुद्दे उठा सकते हैं. इसलिए किसी नए राज्य की मांग पर विचार करते समय सिर्फ राजनीतिक लाभ-हानि नहीं, बल्कि प्रशासनिक क्षमता, आर्थिक व्यवहार्यता और स्थानीय परिस्थितियों को भी देखना जरूरी है.
1955 के राज्य पुनर्गठन आयोग ने भी भारतीय संघ की प्रकृति को अमेरिका जैसे संघीय मॉडल से अलग बताया था. भारतीय संविधान के तहत संघ की एकता स्थायी है, जबकि राज्यों की सीमाओं में बदलाव संवैधानिक प्रक्रिया के जरिए किया जा सकता है.
आगे की बहस किस दिशा में जाएगी?
भारत में छोटे राज्यों का सवाल खत्म होने वाला नहीं है. आबादी बढ़ रही है, शहर फैल रहे हैं, क्षेत्रीय असमानताएं चर्चा में बनी हुई हैं और लोगों की सरकारी सेवाओं को लेकर अपेक्षाएं भी बढ़ रही हैं.
तेलंगाना का अनुभव इस बहस में एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, लेकिन किसी एक राज्य के प्रदर्शन के आधार पर पूरे देश के लिए एक ही निष्कर्ष निकालना भी सही नहीं होगा. हर नए राज्य के मामले में उसकी आर्थिक क्षमता, प्रशासनिक ढांचा, संसाधन, भौगोलिक स्थिति और स्थानीय जनमत को अलग-अलग देखना पड़ेगा.
आखिरकार बहस सिर्फ इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि राज्य बड़ा हो या छोटा. असली मुद्दा यह है कि सरकार जनता तक कितनी आसानी से पहुंचती है, फैसले कितनी तेजी से होते हैं और लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, पानी और दूसरी जरूरी सेवाएं कितनी प्रभावी ढंग से मिलती हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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