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पाकिस्तान से भी बड़ा खतरा थीं रियासतें? 1947 के वो 21 दिन, जब बिखर सकता था भारत

Princely States of India 1947: जोसी जोसेफ की किताब Birth of a Nation बताती है कि 1947 में 560 से ज्यादा रियासतों के एकीकरण की चुनौती कितनी बड़ी थी और सरदार पटेल ने भारत को विखंडन से कैसे बचाया.

Edited by Sahil Singh

Princely States of India 1947: जोसी जोसेफ की किताब Birth of a Nation: The Twenty-One Days That Made India भारत के इतिहास के उस अत्यंत महत्वपूर्ण और लगभग अनसुने अध्याय पर प्रकाश डालती है, जब आजादी सिर्फ ब्रिटिश शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि सैकड़ों रियासतों के एकीकरण और राष्ट्र के विखंडन से बचाव की भी लड़ाई थी.

किताब का केंद्र 25 जुलाई से 14 अगस्त 1947 के वे 21 दिन हैं, जब भारत के नक्शे पर लगभग 560 रियासतें फैली हुई थीं. ये रियासतें देश के दो-पांचवें हिस्से पर कब्जा किए हुए थीं और आबादी के एक चौथाई हिस्से पर शासन कर रही थीं. कई राजा-नवाब स्वतंत्र राष्ट्र बनने की योजना बना रहे थे. सरदार वल्लभभाई पटेल के शब्दों में “राजा-स्थान” का खतरा पाकिस्तान से भी बड़ा था, जबकि नेहरू “बाल्कनाइजेशन” यानी अनगिनत विभाजनों की आशंका जता रहे थे.

रियासतों की स्वतंत्रता की साजिशें

त्रावणकोर के दीवान सर सी.पी. रामास्वामी अय्यर (सर सी.पी.) और भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह खान जैसे शासक स्वतंत्र राज्य बनाने की कोशिश कर रहे थे. सर सी.पी. तेज दिमाग वाले वकील थे, जबकि भोपाल के नवाब पोलो खेलने वाले दूरदर्शी नेता थे. कई रियासतों के पास द्वितीय विश्व युद्ध से लौटे अनुभवी सैनिक थे. कुछ शासक ब्रिटेन, पाकिस्तान और भारत के बीच खेल खेल रहे थे, अपनी मुद्रा छापने, विदेशी संबंध बनाने और सैन्य तैयारियों की योजना बना रहे थे. ट्रैवनकोर ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी, हैदराबाद भी इसी राह पर था, जबकि जुनागढ़, भोपाल, इंदौर, जोधपुर जैसी रियासतें डोल रही थीं.

25 जुलाई 1947 का हमला और उसका प्रभाव

किताब की शुरुआत ट्रैवनकोर के दीवान सर सी.पी. पर के.सी.एस. मणि के हमले से होती है. यह घटना केवल स्थानीय नहीं थी. जोसेफ के अनुसार, इसने उन रियासतों में डोमिनो प्रभाव पैदा किया जो स्वतंत्रता की ओर बढ़ रही थीं. सर सी.पी. कई विद्रोही रियासतों के लिए प्रेरणा स्रोत थे. उनके घायल होने के बाद कई योजनाएं प्रभावित हुईं.

गुप्त दस्तावेज, जासूसी और छिपे नायक

किताब हाल ही में उपलब्ध हुए अभिलेखीय दस्तावेजों पर आधारित है. इनमें भोपाल के नवाब का लंदन को भेजा गया गुप्त मेमो (जिसमें तटस्थता का वादा था), ब्रिटिश अधिकारी का आपत्तिजनक फाइलें जलाने का आदेश, और हैदराबाद के महल से जासूसी रिपोर्टें शामिल हैं. हैदराबाद प्रशासन में मंत्री अरमुथु अयंगार (या इसी नाम के जासूस) दिल्ली को नियमित खुफिया जानकारी भेजते रहे. वी.पी. मेनन (जो एक टाइपिस्ट से उठकर स्टेट्स डिपार्टमेंट के प्रमुख वास्तुकार बने) और सरदार पटेल की टीम इन जानकारियों के आधार पर रणनीति बनाती रही.

अभिलेखों का विनाश

ब्रिटिश पॉलिटिकल डिपार्टमेंट के प्रमुख सर कॉनराड कॉरफील्ड ने रियासतों से जुड़े लगभग 90 प्रतिशत दस्तावेज नष्ट कर दिए, जिनमें शासकों के घोटाले और कमजोरियां दर्ज थीं. नेहरू इस पर बहुत नाराज हुए. यह घटना इतिहास की कई महत्वपूर्ण कड़ियों को हमेशा के लिए छिपा गई.

स्टेट्स डिपार्टमेंट की भूमिका

पटेल के नेतृत्व में नया स्टेट्स डिपार्टमेंट इन चुनौतियों से निपट रहा था. रणनीति यह थी कि पहले रक्षा, विदेश और संचार के विषयों पर समझौता करवाया जाए, बाकी बाद में. कई रियासतें आखिरी क्षण तक मोलभाव करती रहीं. 15 अगस्त की सुबह भी हैदराबाद और कश्मीर ने किसी भी डोमिनियन में शामिल होने की घोषणा नहीं की थी, जुनागढ़ पाकिस्तान में शामिल हो चुका था, और भोपाल का निर्णय अनिश्चित था.

उत्तर-पूर्व और अन्य क्षेत्र

किताब उत्तर-पूर्व की रियासतों (त्रिपुरा, खासी राज्य आदि) के एकीकरण की नाटकीय कहानियों को भी शामिल करती है. त्रिपुरा की रानी कंचन प्रभा देवी ने रीजेंसी काउंसिल की अध्यक्ष के रूप में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए.

किताब का महत्व

जोसी जोसेफ ने इस किताब को जांच-पत्रकारिता की शैली में लिखा है. यह महज संवैधानिक इतिहास नहीं, बल्कि जासूसी, महल की साजिशों, अंतिम क्षण के विश्वासघात और गुप्त बातचीत से भरा रोमांचक वृत्तांत है. लेखक का जोर उन “छोटे लोगों” पर है सिविल सेवकों, जासूसों और मध्यस्थों जिनके प्रयासों ने राष्ट्र को एक रखा. उनका मानना है कि भारतीय स्वतंत्रता सिर्फ सबसे खूनी विभाजन या सबसे बड़े गणराज्य का जन्म नहीं थी, बल्कि वंशानुगत सत्ता के सबसे बड़े समर्पण की भी कहानी थी.

यह किताब याद दिलाती है कि भारत का जन्म कोई अपरिहार्य घटना नहीं थी. वह एक नाजुक, खतरनाक और कठिन प्रक्रिया थी. आज जब हम स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, तब यह समझना जरूरी है कि राष्ट्र का निर्माण सिर्फ 15 अगस्त की आधी रात को नहीं हुआ था. वह उन 21 दिनों की गहन कूटनीति, साहस और दृढ़ता का परिणाम था, जिन्होंने भारत को विखंडन से बचाया और एक राष्ट्र का स्वरूप दिया.

किताब न केवल इतिहास प्रेमियों के लिए, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है जो जानना चाहता है कि आधुनिक भारत का नक्शा और उसकी एकता कितनी मेहनत और कितने जोखिमों के बाद बनी.

-भारत एक्सप्रेस



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