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ऐसे बना था ‘जन गन मन’ भारत का राष्ट्रगान, जानिए इसका ऐतिहासिक सफर

जन गन मन जिसे गाकर 140 करोड़ भारतीयों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं . ये केवल कोई गीत नहीं है, ये भारत के गौरव को दर्शानें वाले बोल है. ये हमे भारत को आजाद कराने वाले लोगों के बलिदानों एवं उनके संघर्षों काी याद दिलाता है.

जन गन मन जिसे गाकर 140 करोड़ भारतीयों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं . ये केवल कोई गीत नहीं है, ये भारत के गौरव को दर्शानें वाले बोल है. ये हमे भारत को आजाद कराने वाले लोगों के बलिदानों एवं उनके संघर्षों काी याद दिलाता है.
हमारी आजादी के अब 78 साल पूरे होने वाले है और हमारे राष्ट्रगान का इतिहास जानना हमारे लिए जरुरी है. आइए इस फोटो गैलरी के माध्यम से जानते है इसका पूरा इतिहास.

इस राष्ट्रगान का इतिहास उतना पूराना नही जितना हम सोचते बल्कि ये आजादी से भी कई दशक पूराना है जिसका एक अलग सफर रहा है.

भारत का राष्ट्रगान जन-गण-मन प्रसिद्ध लेखक और कवि रबीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा लिखे गए बंगाली गीत भारतो-भाग्यो बिधाता का हिंदी संस्करण है. इस बंगाली गीत को टैगोर ने 5 स्टेंजा में लिखा था जो साल 1905 में पहली बार बंगाल की पत्रिका तत्वबोधिनी पत्रिका में प्रकाशित हुआ था.

इस गीत को साल 1919 में टैगोर ने अंग्रेजी में अनुवाद किया था जिसे उन्होंने द मार्निंग सॉंग ऑफ इंडिया नाम दिया था. फिर साल 1943 में इस बंगाली गीत को हिंदी अनुवाद किया गया.

साल 1942 में जर्मनी में भारतीय सैनिकों को ब्रिटिश के खिलाफ प्रशिक्षण देते समय सुभाष चंद्र बोस मन में सैनिकों का हौसला बढ़ाने के लिए देश गीत का विचार आया. उस समय तक भारतो-भाग्यो बिधाता भारत में एक लोकप्रिय गीत बना चुका था.

राष्ट्रगान तय करने के लिए बर्लिन में एक मीटिंग हुई जिसमें बोस ने आज़ाद भारत के राष्ट्रगान के लिए ये गीत सबसे उत्तम लगा और उन्होंने भारतो-भाग्यो बिधाता को देश का राष्ट्रगान घोषित किया.

इस गीत को पूरे भारत में पहुचानें के लिए  बोस ने अपनी ऑर्मी के दो जनरल मुमताज़ हुसैन और आबिद हसन साफ़रानी इसका हिंदी अनुवाद करने को कहा जिसे उन्होंने शुभ सुख चैन नाम दिया गया जिसे 1943 में इंडियन नेशनल ऑर्मी के कैप्टन राम सिंह ठाकुर ने इस गीत को मिलेट्री बीट के साथ संगीतबद्ध किया.

-भारत एक्सप्रेस



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