1946 का बंबई नौसैनिक विद्रोह ब्रिटिश शासन के खिलाफ निर्णायक सैन्य बगावत साबित हुआ. हजारों भारतीय नाविकों ने नस्लीय भेदभाव और खराब हालात के विरोध में जहाजों पर तिरंगा फहराया और ‘भारत छोड़ो’ का नारा बुलंद किया. देशभर में फैले इस विद्रोह ने अंग्रेजों को साफ संदेश दे दिया कि अब भारत पर उनका शासन टिकने वाला नहीं है और इसी के बाद आज़ादी की राह तेज हो गई.
स्वतंत्रता का अंतिम निर्णायक संग्राम
आज बंबई (अब मुंबई) के नौसैनिक विद्रोह की 80वीं वर्षगांठ है. यह वह ऐतिहासिक घटना है जिसने ब्रिटिश शासकों को स्पष्ट संदेश दिया कि अब भारत में उनका शासन टिकाऊ नहीं रहा. 1946 में शुरू हुआ यह रॉयल इंडियन नेवी (RIN) विद्रोह भारत की स्वतंत्रता संग्राम की अंतिम और निर्णायक कड़ी साबित हुआ, जिसे कई इतिहासकार ‘स्वतंत्रता का अंतिम युद्ध’ (Last War of Independence) कहते हैं.
देशभर में फैली आग
यह विद्रोह 18 फरवरी 1946 को बॉम्बे के HMIS तलवार (सिग्नल स्कूल) से शुरू हुआ, जहां सैकड़ों भारतीय नाविकों (रेटिंग्स) ने खराब भोजन, नस्लीय भेदभाव, बेहतर वेतन और सेवा शर्तों की मांग को लेकर हड़ताल कर दी. जल्द ही यह विद्रोह पूरे देश में फैल गया- 20,000 से अधिक नाविकों ने 78 जहाजों और 20 से ज्यादा तटीय ठिकानों पर कब्जा कर लिया. कराची से कलकत्ता तक, यह आंदोलन जन-समर्थन के साथ सड़कों पर उतर आया, जिसमें मजदूरों की हड़ताल और आम जनता की भागीदारी भी शामिल हो गई.
सेवा शर्तों से आगे बढ़ा राष्ट्रवादी विद्रोह
यह विद्रोह मात्र सेवा शर्तों तक सीमित नहीं रहा, इसमें जल्दी डिमॉबिलाइजेशन, राजनीतिक कैदियों की रिहाई और ‘भारत छोड़ो’ की मांग भी शामिल हो गई. नाविकों ने जहाजों पर तिरंगा फहराया और ‘Quit India’के नारे लगाए. ब्रिटिश प्रशासन घबरा गया, क्योंकि यह सेना उनकी सबसे मजबूत ताकत थी और यह विद्रोह का संकेत था.
1946 के इन सैन्य विद्रोहों (नौसेना के बाद वायुसेना और थलसेना में भी असंतोष) ने ब्रिटिशों को एहसास दिलाया कि अब वे भारत पर नियंत्रण नहीं रख सकते. परिणामस्वरूप, अगले ही वर्ष 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिल गई.
इस विद्रोह को विस्तार से समझने और उसके महत्व को रेखांकित करने वाली एक महत्वपूर्ण पुस्तक है *प्रमोद कपूर* की “1946 Royal Indian Navy Mutiny: Last War of Independence” (Roli Books द्वारा प्रकाशित). इस किताब में प्रमोद कपूर ने मूल दस्तावेजों, समाचार पत्रों, विद्रोहियों के संस्मरणों और उनके परिजनों के साक्षात्कारों के आधार पर इस घटना का जीवंत चित्रण किया है.
वे बताते हैं कि कैसे आजाद हिंद फौज की प्रेरणा और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों ने नाविकों में राष्ट्रवादी भावना जगाई. किताब इस “भूले हुए विद्रोह” को फिर से जीवंत करती है और सवाल उठाती है कि क्यों इसे स्वतंत्रता संग्राम में उचित स्थान नहीं मिला, जबकि यह 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश राज के लिए सबसे बड़ा खतरा था.
- भारत एक्सप्रेस
Edited By: Shubhra Rai (Intern)
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