Bharat Express DD Free Dish
Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital
Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital

बेगमपुल से दरियागंज: देसी पल्प की दिलचस्प दास्तान

खक- संपादक यशवंत व्यास की हालिया किताब “बेगमपुल से दरियागंज” हिंदी साहित्य की उस अनदेखी, लेकिन जीवंत दुनिया का एक ऐसा दस्तावेज है जो ‘पल्प’ या लुगदी साहित्य के शौकीनों के लिए किसी खजाने से कम नहीं.

Edited by Vaibhav Gupta

लेखक- संपादक यशवंत व्यास की हालिया किताब “बेगमपुल से दरियागंज” हिंदी साहित्य की उस अनदेखी, लेकिन जीवंत दुनिया का एक ऐसा दस्तावेज है जो ‘पल्प’ या लुगदी साहित्य के शौकीनों के लिए किसी खजाने से कम नहीं. अगर आप उन दिनों को याद करते हैं जब स्कूल की किताबों में छुपाकर पढ़ी जाने वाली सस्ते कागजों की वो कहानियां – अपराध, रोमांच, जासूसी और प्रेम की उलझनों से भरी – आपके दिल की धड़कनें तेज कर देती थीं, तो यह किताब आपको उसी तिलिस्म में वापस ले जाएगी.

एक यात्रा जो सड़कों से साहित्य तक

किताब का शीर्षक ही उसकी आत्मा को बयां करता है – ‘बेगमपुल’ मेरठ का वो पुराना बाजार है जहां 20वीं सदी के मध्य हिंदी पल्प साहित्य का जन्म हुआ, और ‘दरियागंज’ दिल्ली का वो प्रसिद्ध किताबों का अड्डा जहां ये किताबें लाखों पाठकों तक पहुंचीं. यशवंत व्यास इस किताब में हिंदी पल्प की जड़ों, विकास और उसके आकार देने वाले लेखकों-प्रकाशकों की कहानी बुनते हैं. यह सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि जीवंत किस्सों का संग्रह है – जैसे वेद प्रकाश कांबोज के ‘अज्ञात अपराधी’ उपन्यास की जो गुलजार की फिल्म ‘अंगूर’ में संजीव कुमार के किरदार को प्रेरित करता था, या दिनेश पंडित की ‘डकैती’ जैसी कहानियां जो हसीन दिलरुबा की दुनिया रचती थीं.

एक पूरे दौर की धड़कन

लेखक ने बनारस से इलाहाबाद, मेरठ से दिल्ली तक फैली इस साहित्यिक यात्रा को इतनी सहजता से बुना है कि पढ़ते हुए लगता है जैसे आप खुद उन सड़कों पर सैर कर रहे हों. किताब में अंतरराष्ट्रीय प्रभाव (जैसे जेम्स बॉन्ड या शर्लॉक होम्स की छाप) और भारतीय लोकप्रिय साहित्य का मिश्रण है, जो पाठकों को सोचने पर मजबूर करता है कि कैसे सस्ते कागजों पर पूरे दौर की धड़कनें लिखी गईं.

दिलचस्प किस्से और मुलाकातें

यशवंत व्यास ने पल्प लेखकों, प्रकाशकों और पाठकों से सीधी बातचीत की है. हैरान करने वाले उल्लेख, जैसे कैसे मेरठ के छोटे-छोटे प्रेसों ने लाखों प्रतियां छापीं, किताब को जीवंत बनाते हैं.

सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों का अध्ययन

यह सिर्फ नॉस्टैल्जिया नहीं, बल्कि पल्प साहित्य के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों का अध्ययन है. कैसे इस प्रकार के साहित्य ने आम आदमी की कल्पनाओं को पंख दिए, और आज के डिजिटल युग में इसका क्या स्थान है.

पल्प प्रेमियों के लिए अनिवार्य

“बेगमपुल से दरियागंज” एक श्रद्धांजलि है उस साहित्य को जो कभी ‘कमतर’ माना गया, लेकिन करोड़ों दिलों को छुआ. अगर आप साहित्य प्रेमी हैं, या हिंदी की अनकही कहानियां जानना चाहते हैं, तो यह किताब जरूर पढ़ें. यह न सिर्फ पढ़ने लायक, बल्कि संग्रह करने लायक है– क्योंकि यह हिंदी पल्प की वो दास्तान है जो कभी भुलाई नहीं जा सकती.

पेंगुइन रेंडम हाऊस इंडिया द्वारा इस कृति की भाषा सरल, लेकिन आकर्षक है. छोटे-छोटे अध्यायों में बंटी होने से एक बार हाथ लग जाए तो छोड़ना मुश्किल.



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital