कल्पना कीजिए, वर्ष 1937 का बिहार. स्वतंत्रता आंदोलन की लहरें ऊफान पर हैं, और कांग्रेस की पहली सरकार बन रही है. रामदयालु सिंह, एक प्रभावशाली वकील और स्वतंत्रता सेनानी, बिहार के पहले मुख्यमंत्री (तत्कालीन प्रधानमंत्री) बनने के प्रबल दावेदार हैं. लेकिन उन्होंने अपना नाम पीछे कर लिया और अपने मित्र डॉ. श्रीकृष्ण सिंह (श्री बाबू) को आगे बढ़ाया. यह त्याग की मिसाल थी, जो बिहार की राजनीति में आज भी चर्चित है.
गांव से शहर की ओर
रामदयालु सिंह का जन्म 1886 में बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के गंगेया गांव में हुआ. उनके पिता चंद्रदेव सिंह एक संपन्न किसान परिवार से थे. 1907 में कोलकाता विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वकालत की पढ़ाई की. कोलकाता में पढ़ाई के दौरान ही 1906 में उनकी शादी हुई. यह दौर था जब रामदयालु सिंह ने अपनी जड़ों से जुड़कर भी आधुनिक शिक्षा ग्रहण की, जो आगे चलकर उनके जीवन का आधार बनी.
वाक्-चातुर्य का जादू
1910 में वकालत पास करने के बाद रामदयालु सिंह ने पटना में प्रैक्टिस शुरू की, लेकिन मन नहीं लगा. वे मुजफ्फरपुर लौट आए, जहां उस समय बंगाली वकीलों का दबदबा था. अपनी वाक्-चातुर्य से उन्होंने जल्द ही उत्तर बिहार के बड़े जमींदारों और साहूकारों को अपना मुवक्किल बना लिया.
वकालत से कमाए धन से उन्होंने सैकड़ों बीघा जमीन खरीदी. एक मध्यम किसान परिवार बड़ा जमींदार बन गया. चंपारण सत्याग्रह के दौरान महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने अपनी प्रतिष्ठित वकालत छोड़ दी.

विधानसभा के पहले अध्यक्ष
1937 में कांग्रेस की जीत के बाद डॉ. श्रीकृष्ण सिंह 20 अप्रैल को बिहार के पहले मुख्यमंत्री बने. उनके और अन्य नेताओं के दबाव पर 23 जुलाई 1937 को रामदयालु सिंह सर्वसम्मति से बिहार विधानसभा के पहले अध्यक्ष चुने गए. उनकी निष्पक्षता की सभी दल प्रशंसा करते थे. लेकिन जल्द ही उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया और दलगत राजनीति से दूर हो गए. 1939 में गांधीजी के आह्वान पर श्रीकृष्ण सिंह ने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दिया, लेकिन रामदयालु सिंह ने अध्यक्ष पद नहीं छोड़ा. वे जीवनपर्यंत इस पद पर रहे.
राजनीति से संन्यास
1939 के बाद, जब कांग्रेस स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ी, रामदयालु सिंह ने खुद को अलग कर लिया. वे बैरागी संत की तरह देश के धार्मिक स्थलों का भ्रमण करने लगे. उनकी पत्नी रामप्यारी देवी मायके चली गईं. वे हाजीपुर के नारायणी तट पर मनियारी मठ में अपने मित्र महंत दर्शन दासजी के साथ रहने लगे. उनके कहने पर महंत जी ने मुजफ्फरपुर में महंत दर्शन दास महिला कॉलेज की स्थापना की. रामदयालु सिंह पक्के सनातनी थे – नियमित गीता पाठ करते और संस्कृत शिक्षा के लिए प्रयासरत रहते. 1926 में उन्होंने मुजफ्फरपुर के गन्नीपुर में 22 एकड़ जमीन पर तिलक विश्वविद्यालय और ब्रह्मचर्य आश्रम स्थापित किया, जहां गुरुकुल पद्धति से शिक्षा दी जाती थी. 28 नवंबर 1944 को रामदयालु सिंह मनियारी मठ में ही इस दुनिया से विदा हो गए.
उनकी मृत्यु के बाद 1948 में यह आश्रम रामदयालु सिंह महाविद्यालय (RDS कॉलेज) बना, जिसका उद्घाटन श्रीकृष्ण सिंह ने किया.
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