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राष्ट्रगीत का अपमान या इतिहास की अपनी व्याख्या? जानिए ‘वंदे मातरम्’ विवाद की पूरी इनसाइड स्टोरी

लाल किले से 15 अगस्त को गूंजे ‘वंदे मातरम्’ ने देश की आजादी की 80वीं वर्षगांठ के जश्न को ऐतिहासिक बना दिया, लेकिन इसके कुछ ही घंटों बाद यह गीत सियासी विवाद के केंद्र में आ गया.

देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ मना रहा था. दिल्ली के लाल किले की प्राचीर पर स्वतंत्रता दिवस समारोह चल रहा था और पूरा देश इस ऐतिहासिक मंच से प्रधानमंत्री का संबोधन सुन रहा था. इसी दौरान ‘वंदे मातरम्’ की गूंज ने इस बार के समारोह को एक अलग ही पहचान दे दी. आजादी के बाद पहली बार लाल किले की प्राचीर से इसे राष्ट्रगीत के रूप में प्रस्तुत किए जाने की बात सामने आई. खास बात यह भी रही कि देश इस समय ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ मना रहा है.

लेकिन लाल किले से निकली यह धुन ज्यादा देर तक सिर्फ राष्ट्रीय गौरव का विषय नहीं रही. कुछ ही घंटों में ‘वंदे मातरम्’ राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया. विवाद कांग्रेस मुख्यालय में हुए स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम को लेकर शुरू हुआ और देखते ही देखते भाजपा और कांग्रेस के बीच तीखी बयानबाजी में बदल गया.

भाजपा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस मुख्यालय में ‘वंदे मातरम्’ के गायन के दौरान सोनिया गांधी ने इसे बीच में रुकवाने का इशारा किया. पार्टी नेताओं ने वायरल वीडियो का हवाला देते हुए इसे राष्ट्रगीत के प्रति असम्मान बताया.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत भाजपा के कई नेताओं ने कांग्रेस पर निशाना साधा. शाह ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ का अपमान स्वीकार नहीं किया जा सकता और कांग्रेस को देश से माफी मांगनी चाहिए.

भाजपा के लिए मामला सिर्फ एक कार्यक्रम में गीत के गायन तक सीमित नहीं है. पार्टी इसे कांग्रेस की पुरानी राष्ट्रवादी पहचान और मौजूदा राजनीतिक सोच के बीच विरोधाभास के तौर पर पेश कर रही है. उसका सवाल है कि जब केंद्र सरकार ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ को देशभर में बड़े स्तर पर मना रही है, तब कांग्रेस इसके गायन को सीमित क्यों कर रही है?

कांग्रेस ने क्या सफाई दी?

कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को खारिज किया. पार्टी की ओर से कहा गया कि सोनिया गांधी ‘वंदे मातरम्’ को रुकवाने का इशारा नहीं कर रही थीं. कांग्रेस के मुताबिक, वह पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी मंगाने को कह रही थीं, क्योंकि खड़गे काफी देर से खड़े थे.

इसके साथ ही कांग्रेस ने अपने रुख को समझाने के लिए इतिहास का सहारा लिया. पार्टी का कहना है कि ‘वंदे मातरम्’ का सम्मान उसके लिए कभी कम नहीं हुआ. बल्कि 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने राष्ट्रीय कार्यक्रमों में इसके शुरुआती दो अंतरों के इस्तेमाल की व्यवस्था की थी.

कांग्रेस के अनुसार, उस समय गीत के आगे के हिस्सों में धार्मिक प्रतीकों और देवी-देवताओं से जुड़े संदर्भों को लेकर कुछ समुदायों में संवेदनशीलता थी. स्वतंत्रता आंदोलन में अलग-अलग धर्मों और समुदायों को साथ लेकर चलना बड़ी चुनौती थी. ऐसे में पहले दो अंतरों को राष्ट्रीय कार्यक्रमों के लिए उपयुक्त माना गया.

19 अगस्त 2026 को कांग्रेस कार्यसमिति ने इसी पुराने फैसले को दोहराते हुए पार्टी के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो अंतरे गाने का निर्णय स्पष्ट कर दिया.

आखिर 1937 का फैसला इतना अहम क्यों है?

इस विवाद को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना जरूरी है. ‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में की थी. बाद में इसे उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया. 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसका गायन किया था.

1905 के बंग-भंग विरोधी स्वदेशी आंदोलन के दौरान यह गीत अंग्रेजी शासन के खिलाफ लोगों को जोड़ने वाले प्रमुख नारों और प्रतीकों में शामिल हो गया. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ‘वंदे मातरम्’ ने लोगों में देशभक्ति और प्रतिरोध की भावना पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

आजादी के बाद 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान के समान सम्मान दिए जाने की बात कही थी. इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला.

अब इसकी 150वीं वर्षगांठ के मौके पर केंद्र सरकार 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक देशभर में कई कार्यक्रम आयोजित कर रही है. सामूहिक गायन और अन्य आयोजनों के जरिए ‘वंदे मातरम्’ को स्वतंत्रता आंदोलन की राष्ट्रीय स्मृति से जोड़कर फिर सामने लाया जा रहा है.

गीत से ज्यादा इतिहास की व्याख्या पर लड़ाई

भाजपा और कांग्रेस दोनों ‘वंदे मातरम्’ की अहमियत को स्वीकार करते हैं. फर्क इस बात को लेकर है कि इसकी विरासत को आज किस तरह देखा जाए. भाजपा का कहना है कि ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता आंदोलन का ऐसा प्रतीक था, जिसने अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों में एकता और जोश पैदा किया. उसके मुताबिक, आज इसे किसी राजनीतिक दल की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता.

कांग्रेस दूसरी तस्वीर पेश करती है. उसका कहना है कि 1937 का फैसला किसी गीत का विरोध नहीं था, बल्कि उस समय के सामाजिक और राजनीतिक हालात को देखते हुए व्यापक सहमति बनाने की कोशिश थी.

यहीं से विवाद और पेचीदा हो जाता है. सवाल सिर्फ यह नहीं रह जाता कि गीत गाया गया या नहीं. असली सवाल यह बन जाता है कि किसी राष्ट्रीय प्रतीक की ऐतिहासिक विरासत को आज की राजनीति में किस तरह इस्तेमाल किया जाए.

धार्मिक संवेदनशीलता भी बनी हुई है वजह

‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो अंतरों में मातृभूमि की सुंदरता, प्रकृति और समृद्धि का वर्णन मिलता है. वहीं आगे के हिस्सों में धार्मिक प्रतीकों और देवी स्वरूप से जुड़े संदर्भ आते हैं. यही वजह थी कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में भी इसके पूरे स्वरूप को सार्वजनिक कार्यक्रमों में इस्तेमाल करने को लेकर बहस हुई थी.

कांग्रेस आज उसी पुराने संदर्भ को सामने रख रही है. भाजपा हालांकि इसकी अलग व्याख्या करती है और आरोप लगाती है कि 1937 में गीत को सीमित करने के पीछे राजनीतिक दबाव और तुष्टीकरण की सोच थी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ पर हुई चर्चा के दौरान कांग्रेस के 1937 के फैसले की आलोचना कर चुके हैं. ऐसे में यह मुद्दा अब केवल सांस्कृतिक इतिहास का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि सीधे राजनीतिक बहस से जुड़ गया है.

कांग्रेस मुख्यालय की घटना को लेकर भाजपा ने गंभीर आरोप लगाए हैं. कांग्रेस ने उन्हें सिरे से खारिज किया है. ऐसे में वायरल वीडियो या राजनीतिक बयानों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय आरोप और स्थापित तथ्य के बीच अंतर रखना जरूरी है.

इसी तरह कांग्रेस का 1937 के फैसले का हवाला देना एक ऐतिहासिक संदर्भ जरूर है, लेकिन इससे भाजपा की मौजूदा राजनीतिक आलोचना अपने आप खत्म नहीं हो जाती.

यानी दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क के साथ मैदान में हैं और जनता के सामने सवाल यह है कि इस पूरे विवाद को इतिहास, राजनीति और राष्ट्रवाद के किस नजरिए से देखा जाए.

लाल किले से उठी आवाज का राजनीतिक असर

इस पूरे घटनाक्रम में लाल किले की भूमिका खास है. स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से निकलने वाला हर राष्ट्रीय संदेश प्रतीकात्मक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. ऐसे में वहां ‘वंदे मातरम्’ का गायन होना अपने आप में बड़ी घटना थी.

150वीं वर्षगांठ के माहौल ने इसके महत्व को और बढ़ा दिया. केंद्र सरकार इसे स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और राष्ट्रीय गौरव से जोड़ रही है. वहीं कांग्रेस को अब यह समझाना पड़ रहा है कि उसके ऐतिहासिक फैसले का मतलब राष्ट्रगीत के प्रति किसी तरह का अनादर नहीं है.

आगे भी जारी रह सकती है सियासी बहस

फिलहाल ‘वंदे मातरम्’ पर विवाद थमता नजर नहीं आ रहा. भाजपा इसे राष्ट्रवाद और कांग्रेस की कथित तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ रही है. कांग्रेस इसे स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास, सामाजिक समरसता और अपनी पुरानी विरासत के संदर्भ में देख रही है.

विडंबना यह है कि दोनों दल इस गीत को अपनी राजनीतिक और ऐतिहासिक कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं. भाजपा इसे राष्ट्रवादी राजनीति के मजबूत प्रतीक के रूप में आगे बढ़ाना चाहती है, जबकि कांग्रेस अपने स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास के आधार पर इसकी विरासत पर दावा कर रही है.

इसलिए इस पूरे मामले को सिर्फ इस सवाल में समेट देना कि कौन देशभक्त है और कौन नहीं, शायद सही तस्वीर नहीं देगा. ‘वंदे मातरम्’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की एक बेहद महत्वपूर्ण विरासत है. इसकी ऐतिहासिक भूमिका और राष्ट्रीय गीत के रूप में सम्मान को लेकर व्यापक सहमति है.

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-भारत एक्सप्रेस



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