El Nino Impact on Food: मौसम का मिजाज इन दिनों हर किसी को परेशान कर रहा है. जुलाई का महीना शुरू हो चुका है लेकिन जून में मॉनसून ने उम्मीद के मुताबिक साथ नहीं दिया. जिससे आपकी जेब, खर्चे और रसोई पर काफी ज्यादा फर्क पड़ने वाला है. दरअसल, इस साल जून में देश भर में औसत से करीब 40% कम बारिश दर्ज की गई है. आपको जानकर हैरानी होगी कि पिछले 25 सालों में जून के महीने में इससे कम बारिश सिर्फ दो ही बार, साल 2009 और 2014 में हुई थी. मौसम विभाग का अनुमान है कि जुलाई में भी बारिश औसत के मुकाबले सिर्फ 94% ही रहेगी.
अब आप सोच रहे होंगे कि बारिश कम होने का आपकी जेब या रसोई से क्या कनेक्शन है? तो बात यह है कि भारत से हजारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर में बैठा ‘अल-नीनो’ हमारी रसोई का बजट बिगाड़ने की तैयारी कर रहा है.
जी हां, प्रशांत महासागर ही भारतीय मॉनसून का असली रिमोट कंट्रोल है. जब वहां सामान्य रूप से तेज हवाएं चलती हैं तो वे समुद्र के गर्म पानी को हमारी तरफ यानी हिंद महासागर की ओर धकेलती हैं, जिससे अच्छे बादल बनते हैं और भारत में जमकर बारिश होती है. लेकिन इस बार अल-नीनो के कारण यह पूरा चक्र गड़बड़ा गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि प्रशांत महासागर में एक ‘सुपर अल-नीनो’ आकार ले रहा है, जिसकी सीधी मार हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खेती-किसानी पर पड़ने वाली है. आइए समझते हैं कि अल-नीनो की वजह से होने वाली इस सूखे जैसी स्थिति का हमारी रोजमर्रा की चीजों पर क्या असर पड़ने वाला है.
डेयरी उद्योग हो सकते है महंगे
सुनने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है लेकिन डेयरी उद्योग के विशेषज्ञ यही चेतावनी दे रहे हैं. मॉनसून कमजोर होने का सीधा असर पशुओं के चारे और पानी की उपलब्धता पर पड़ता है. जब बारिश कम होती है तो हरा चारा महंगा हो जाता है. चारे की कमी के कारण पशुओं के दूध उत्पादन पर दबाव पड़ता है. हाल ही में मई के महीने में अमूल, मदर डेयरी और पराग मिल्क फूड्स जैसी बड़ी कंपनियों ने दूध के दाम 2-3% बढ़ाए थे. बताया जा रहा है कि अगर प्रमुख दुग्ध उत्पादक इलाकों में जुलाई में भी बारिश कम रही, तो दूध की कीमतों में 3-4% की एक और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है. जाहिर है जब दूध महंगा होगा तो दही, पनीर, छाछ, मक्खन और घी के दाम भी आसमान छूने लगेंगे.
दाल, सब्जी और खाने के तेल पर भी आफत
अल-नीनो का यह खतरा सिर्फ दूध तक सीमित नहीं है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक कम बारिश की सबसे बड़ी मार उन फसलों पर पड़ेगी जो पूरी तरह मॉनसून के भरोसे रहती हैं. सबसे पहले बात करें दालों की तो तूर (अरहर) और अन्य प्रमुख दालों के उत्पादन पर इसका बहुत बुरा असर पड़ सकता है, जिससे आने वाले दिनों में दालें और महंगी हो सकती हैं.
इसके अलावा सोयाबीन जैसी तिलहन फसलों की पैदावार घटने की आशंका है. अगर देश में उत्पादन कम हुआ, तो हमें बाहर से तेल आयात करना पड़ेगा जिससे बाजार में खाने वाले तेल की कीमतें बढ़ेंगी.
वहीं सब्जियां जैसे टमाटर, प्याज और अन्य हरी सब्जियों की सप्लाई में थोड़ी भी कमी आते ही इनके फुटकर दाम तेजी से भागने लगते हैं. साथ ही जब पशु आहार और पोल्ट्री फीड महंगा होगा, तो समय के साथ अंडे और चिकन की कीमतें भी बढ़ सकती हैं.
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क्या चावल और गेहूं भी महंगे होंगे?
राहत की बात यह है कि चावल और गेहूं के मामले में ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है. भारत सरकार के पास अनाज का पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है. इसके अलावा देश के जलाशयों में पानी का स्तर ठीक है और सिंचाई की सुविधाएं पहले से बेहतर हैं. इसलिए दालों और सब्जियों की तुलना में गेहूं-चावल पर इसका असर कम पड़ेगा बशर्ते मॉनसून बहुत लंबे समय तक खराब न रहे.
उपभोक्ता अब क्या करें?
विशेषज्ञों का कहना है कि हर अल-नीनो देश में भयंकर महंगाई लाए यह जरूरी नहीं है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि आने वाले हफ्तों में सरकार क्या कदम उठाती है और जुलाई-अगस्त के बचे हुए दिनों में बारिश का वितरण कैसा रहता है. फिलहाल देश के आम उपभोक्ताओं को जुलाई और अगस्त के मॉनसूनी अपडेट पर नजर रखनी होगी क्योंकि यही दो महीने तय करेंगे कि इस साल त्योहारों के सीजन में आपकी रसोई का बजट कितना सुरक्षित रहेगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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