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ICSE-ISC Result 2026: आखिर क्यों अब बोर्ड जारी नहीं करता टॉपर्स की मेरिट लिस्ट? जानें बड़ी वजह

हाल ही में घोषित ICSE-ISC नतीजों में लड़कियों ने बाजी मारी और पास प्रतिशत 99% के पार रहा, लेकिन बोर्ड की आधिकारिक मेरिट लिस्ट इस बार भी नदारद थी. जानिए कैसे यह मनोवैज्ञानिक सर्जरी बच्चों को डिप्रेशन और सुसाइड से बचाने के लिए एक क्रांतिकारी कदम साबित हो रही है.

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ICSE-ISC Result 2026: हाल ही में जब ICSE और ISC के नतीजे घोषित हुए, तो माहौल बदला-बदला सा था. हमेशा की तरह ही परिणाम शानदार रहे 10वीं (ICSE) में कुल 99.47% और 12वीं (ISC) में 98.19% छात्र सफल रहे. हर बार की तरह इस बार भी लड़कियों ने बाजी मारी, जिनका पास प्रतिशत लड़कों से बेहतर रहा. लेकिन इन सबके बीच एक बड़ा सन्नाटा था बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट पर मेरिट लिस्ट का नामोनिशान नहीं था.

लेकिन हर हार की तरह इस बार भी हर किसी के मन में सवाल था कि आखिर कई बड़े बोर्ड्स ने टॉपर्स की लिस्ट जारी करना क्यों बंद कर दिया है? इसके पीछे कोई तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि कोई और गहरी वजह छिपी है.

नंबरों की नुमाइश पर लगाम

बोर्ड्स का अब स्पष्ट मानना है कि अंकों की यह अंधी दौड़ बच्चों के मासूम बचपन को काफी हानी पहुंचा रही है. पहले के दौर में जब 99.8% अंक लाने वाले छात्र की तस्वीर अखबारों में छपती थी, तो महज 0.1% पीछे रह जाने वाला 99.7% वाला बच्चा भी खुद को हारा हुआ महसूस करने लगता था.

नकारात्मकता को खत्म करने के लिए बोर्ड अब समानता का भाव पैदा कर रहा है, जहां यह संदेश दिया जा रहा है कि 90% से ऊपर अंक लाने वाले सभी छात्र समान रूप से प्रतिभाशाली हैं. इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभ तुलना का अंत है; क्योंकि जब कोई आधिकारिक रूप से नंबर 1 घोषित ही नहीं होगा, तो समाज और रिश्तेदारों के पास बच्चों को एक-दूसरे से कमतर आंकने का कोई सरकारी आधार ही नहीं बचेगा.

अस्वस्थ प्रतियोगिता और मानसिक स्वास्थ्य

ICSE और CBSE जैसे प्रमुख शिक्षा बोर्ड्स ने अब यह गहराई से स्वीकार कर लिया है कि टॉपर का टैग किसी छात्र में जीत का जुनून पैदा करने के बजाय उसमें हार का डर कहीं अधिक भर देता है. NCRB के डराने वाले आंकड़े साफ बताते हैं कि परीक्षा का तनाव छात्रों को आत्महत्या जैसे खौफनाक कदम उठाने पर मजबूर कर देता है और इसी जानलेवा परफॉरमेंस प्रेशर को जड़ से खत्म करने के लिए बोर्ड्स ने मेरिट लिस्ट हटाने जैसी एक बड़ी मनोवैज्ञानिक सर्जरी की है.

अब सारा जोर अंकों की होड़ के बजाय ग्रेडिंग और परसेंटाइल के गणित पर है, ताकि हर बच्चा खुद को सफल महसूस कर सके और उसके मन में यह मलाल न रहे कि वह महज एक नंबर की वजह से किसी से पीछे रह गया.

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कोचिंग और स्कूलों के विज्ञापन युद्ध पर चोट

रिजल्ट आते ही अगले दिन अखबार टॉपर्स की तस्वीरों से भर जाते थे, जहां निजी स्कूल और कोचिंग सेंटर्स इन बच्चों के चेहरों को विज्ञापन की तरह इस्तेमाल कर अपना धंधा चमकाते थे. लेकिन अब आधिकारिक मेरिट लिस्ट बंद होने से इन संस्थानों के पास अपनी मार्केटिंग करने के लिए कोई पुख्ता सरकारी दस्तावेज नहीं बचा है. इस बड़े बदलाव के कारण शिक्षा का केंद्र अब केवल एक विशिष्ट बच्चा नहीं, बल्कि हर बच्चा बन रहा है, जिससे स्कूलों को अब अपनी साख केवल एक-दो टॉपर्स के भरोसे नहीं, बल्कि अपने औसत प्रदर्शन और समग्र शैक्षणिक माहौल के आधार पर बनानी होगी.

नई शिक्षा नीति (NEP 2020) का विजन

सरकार की नई शिक्षा नीति (NEP 2020) का मुख्य लक्ष्य रट्टा मार पढ़ाई की पुरानी परंपरा को जड़ से खत्म करना है, और मेरिट लिस्ट को हटाना इसी क्रांतिकारी दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है. अब बोर्ड का पूरा फोकस इस बात पर केंद्रित है कि बच्चे ने वास्तव में क्या सीखा है और उसका मानसिक विकास कैसा हुआ है, न कि इस पर कि उसने रटकर कितने अंक बटोरे हैं.

साल में दो बार परीक्षा देने का विकल्प और कम्पार्टमेंट के बजाय इम्प्रूवमेंट एग्जाम जैसे सकारात्मक बदलाव इसी प्रगतिशील सोच का हिस्सा हैं, जो छात्रों को यह भरोसा दिलाते हैं कि महज एक परीक्षा उनकी पूरी जिंदगी की काबिलियत और भविष्य तय नहीं कर सकती.

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-भारत एक्सप्रेस



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