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स्कूल-कॉलेज और शिक्षा पर किसका नियंत्रण? जानिए संविधान के तहत केंद्र और राज्यों को मिले क्या-क्या अधिकार

नीट पेपर लीक और ‘स्कूल ठीक करो अभियान’ के बीच देश में शिक्षा व्यवस्था को लेकर बहस छिड़ गई है. संविधान के नजरिए से समझें कि भारत में स्कूलों और शिक्षा का नियंत्रण केंद्र सरकार के पास है या राज्य सरकारों के पास.

Gen Alpha Protest

स्कूल-कॉलेज और शिक्षा पर किसका नियंत्रण?

Gen Alpha Protest: देश में इन दिनों शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बिल्कुल नया और हैरान करने वाला दौर देखने को मिल रहा है. हाल ही में नीट पेपर लीक के खिलाफ हुए देशव्यापी प्रदर्शनों के बाद अब ‘जेन अल्फा’ (Gen Alpha) यानी आज की नई पीढ़ी के बच्चे अपनी बुनियादी जरूरतों और बदहाल स्कूलों को ठीक कराने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं. ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ द्वारा शुरू किए गए ‘स्कूल ठीक करो अभियान’ और देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आ रही बच्चों के प्रदर्शन की तस्वीरों ने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया है.

बच्चे अब अपनी पढ़ाई, लैब और बुनियादी सुविधाओं के लिए खुद आवाज उठा रहे हैं. इन सबके बीच सबसे बड़ा और पेचीदा सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर भारत के इस संघीय ढांचे में स्कूलों और शिक्षा का नियंत्रण किसके पास है केंद्र सरकार के पास या राज्य सरकारों के पास? आइए इसे संविधान के नजरिए से गहराई से समझते हैं.

राज्य सूची से समवर्ती सूची तक का सफर

भारतीय संविधान के तहत शक्तियों का स्पष्ट बंटवारा किया गया है. संविधान की सातवीं अनुसूची में केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों को तीन सूचियों में बांटा गया है. संघ सूची (Union List), राज्य सूची (State List) और समवर्ती सूची (Concurrent List).

मूल संविधान के लागू होने के समय ‘शिक्षा’ पूरी तरह से राज्य सूची की प्रविष्टि 11 के तहत आती थी. इसका मतलब था कि स्कूल खोलने से लेकर पाठ्यक्रम और प्रशासन तक, हर मामले में राज्यों की सर्वोच्च भूमिका थी. लेकिन 1976 के 42वें संविधान संशोधन के जरिए शिक्षा को राज्य सूची से निकालकर समवर्ती सूची की प्रविष्टि 25 में डाल दिया गया. इस बदलाव के बाद से शिक्षा पर कानून बनाने और नीतियां तय करने का अधिकार केंद्र और राज्य दोनों के पास आ गया.

क्या कहता है अनुच्छेद 246?

संविधान के अनुच्छेद 246 (Article 246) के अनुसार समवर्ती सूची के विषयों पर संसद और राज्य विधानमंडल दोनों कानून बना सकते हैं. हालांकि यदि केंद्र और राज्य के बनाए कानूनों में कोई टकराव होता है, तो संसद द्वारा बनाया गया कानून ही मान्य होता है बशर्ते उसे राष्ट्रपति की मंजूरी न मिली हो. यही कारण है कि आज राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा नीतियां जैसे नई शिक्षा नीति 2020 केंद्र सरकार तय करती है, लेकिन उन्हें जमीन पर लागू करने की मुख्य जिम्मेदारी राज्यों की होती है.

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कौन चलाता है स्कूल और फंडिंग?

संवैधानिक रूप से समवर्ती सूची का विषय होने के बावजूद जमीन पर स्कूल चलाने और उनका प्रबंधन करने का भारी-भरकम बोझ राज्य सरकारों पर ही है. सरकारी आंकड़े गवाही देते हैं कि देश के लगभग सभी प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय संबंधित राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों के नियंत्रण में आते हैं.

वित्तीय मोर्चे पर भी राज्य ही सबसे आगे हैं. शिक्षा बजट के आंकड़ों के अनुसार कुल सरकारी खर्च का लगभग 76 प्रतिशत हिस्सा राज्य और केंद्रशासित प्रदेश वहन करते हैं, जबकि केंद्र सरकार का योगदान करीब 24 प्रतिशत रहता है. इसके अलावा केंद्र सरकार ‘समग्र शिक्षा अभियान’ जैसी योजनाओं के तहत राज्यों को फंड देती है जहां सामान्य राज्यों के लिए केंद्र और राज्य का फंडिंग अनुपात 60:40 का होता है.

केंद्र के अधिकार और राज्यों से टकराव

भले ही स्कूल राज्य चलाते हों लेकिन नीतिगत मोर्चे पर केंद्र सरकार के पास अनुच्छेद 246 की संघ सूची की प्रविष्टि 63, 64, 65 और 66 के तहत उच्च शिक्षा, तकनीकी संस्थानों और राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों जैसे IIT, IIM, और केंद्रीय विश्वविद्यालय के मानक तय करने की व्यापक शक्तियां हैं. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) जैसे निकाय इन्हीं संवैधानिक शक्तियों के तहत काम करते हैं.

यही मिली-जुली और साझा व्यवस्था कई बार केंद्र और राज्यों के बीच टकराव की वजह बन जाती है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) का त्रि-भाषा फॉर्मूला, फंडिंग को लेकर मतभेद और स्थानीय बनाम राष्ट्रीय पाठ्यक्रम का मुद्दा अक्सर तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में केंद्र सरकार के साथ विवाद का कारण बनता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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