इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनी बेटी और भतीजी के साथ यौन उत्पीड़न करने के आरोपी झांसी के अधिवक्ता को जमानत दे दी है. कोर्ट ने कहा कि पीड़िताओं के बयानों में बार-बार बदलाव, प्राथमिकी दर्ज करने में एक वर्ष की देरी और किसी प्रकार का फोरेंसिक साक्ष्य न होना अभियोजन की कहानी को कमजोर बनाता है.
यह आदेश न्यायमूर्ति कृष्ण पहल की एकलपीठ ने अधिवक्ता की जमानत अर्जी पर दिया.
आरोपी की भतीजी और उसकी बेटी ने दर्ज कराया मुकदमा
झांसी के कोतवाली थाना में 6 दिसंबर 2024 को आरोपी अधिवक्ता की भतीजी और उसकी बेटी ने मुकदमा दर्ज कराया. आरोप लगाया कि उनके साथ झांसी स्थित आवास पर कई बार यौन शोषण किया। यह भी आरोप लगाया कि आरोपी ने उनके माध्यम से दूसरों के खिलाफ झूठी एफआईआर दर्ज करवाकर उनसे धन उगाही की.
प्राथमिकी लगभग एक वर्ष की देरी से कराई है दर्ज
आरोपी के अधिवक्ता ने दलील दी कि प्राथमिकी लगभग एक वर्ष की देरी से दर्ज कराई है. इसका कोई वाजिब कारण नहीं बताया गया. पीड़िताओं के बयानों में विरोधाभास है और बार-बार बदलाव किया है. चिकित्सकीय परीक्षण या फोरेंसिक रिपोर्ट के अभाव में आरोप अप्रमाणित.
ये भी पढ़ें: बुंदेलखंड महोत्सव हादसा: 4 छात्रों की मौत के मामले में आरोपी अंकित चौधरी को हाईकोर्ट से मिली अग्रिम जमानत
आरोपी अभिभावक के रूप में करता था देखभाल
आरोपी ने भतीजी के माता-पिता की मृत्यु के बाद अभिभावक के रूप में उसका देखभाल कर रहा था. युवतियां अलग-अलग युवकों के संपर्क में थी. इसका आरोपी ने विरोध किया और युवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया. इसी के विरोध में युवतियों ने आरोपी पर झूठा मुकदमा दर्ज करा दिया है. शासकीय अधिवक्ता ने जमानत का विरोध किया. कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद जमानत अर्जी स्वीकार कर ली.
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.


