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यौन उत्पीड़न के आरोप में निलंबित डीपीओ कुशीनगर को हाईकोर्ट ने अपील दाखिल करने का दिया निर्देश, निलंबन में हस्तक्षेप से इनकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न के आरोप में निलंबित कुशीनगर के डीपीओ शैलेंद्र कुमार राय की याचिका खारिज की. कोर्ट ने कहा कि निलंबन जांच की निष्पक्षता के लिए है और अपीलीय प्राधिकारी के निर्णय तक कोई कार्रवाई नहीं होगी.

Allahabad High Court
Edited by Akansha

प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कुशीनगर के जिला कार्यक्रम अधिकारी (डीपीओ) शैलेंद्र कुमार राय के निलंबन में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया. राय को यौन उत्पीड़न के आरोपों के चलते निलंबित किया गया था. न्यायालय ने राय को चार सप्ताह के भीतर सक्षम अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष अपील दाखिल करने का निर्देश दिया है. साथ ही प्राधिकरण को दो महीने के भीतर तर्कसंगत और लिखित आदेश पारित करने को कहा गया है. यह आदेश न्यायमूर्ति अजीत कुमार की एकलपीठ ने दिया है.

याची डीपीओ ने याचिका दायर कर अपने निलंबन आदेश को चुनौती दी थी. उन्होंने तीन प्रमुख आधारों पर यह याचिका दाखिल की: 1. महिला कर्मचारी के बयान कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की परिभाषा में नहीं आते. 2. आंतरिक शिकायत समिति (ICC) का गठन विधि के अनुसार नहीं हुआ. 3. विस्तृत जांच प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, और उन्हें न तो शिकायतकर्ता से जिरह का अवसर मिला, न ही रिपोर्ट की प्रति दी गई.

आईसीसी की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि डीपीओ ने एक महिला कर्मचारी को उसके शरीर को लेकर “मोटा” कहा, कई बार सैर का प्रस्ताव दिया और स्कूटी पर सैर की बात की. ये टिप्पणियां और व्यवहार पीड़िता के लिए असहज और अपमानजनक थे. पीड़िता ने समिति के समक्ष अपने बयान में इन घटनाओं की पुष्टि की.

याची के वकील ने दलील दी कि आईसीसी की संरचना अधिनियम, 2013 की धारा 4 के अनुरूप नहीं थी क्योंकि इसमें कोई एनजीओ सदस्य या यौन उत्पीड़न मामलों में प्रशिक्षित विशेषज्ञ नहीं था. इसके अलावा, उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन और अपील) नियम, 1999 के तहत राय विस्तृत जांच प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ.

प्रतिवादी पक्ष की ओर से अधिवक्ता ने दलील कि याची की टिप्पणियां “बॉडी शेमिंग” के अंतर्गत आती हैं, जो यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आ सकती हैं. उन्होंने कहा कि यदि याची को जिरह करनी थी तो उन्हें समिति को इसके लिए आवेदन देना चाहिए था. साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि जांच रिपोर्ट की प्रति याचिकाकर्ता को प्रदान की गई थी.

न्यायालय ने माना कि “बॉडी शेमिंग” समाज में अस्वीकार्य है और कहा कि वह यह निर्णय नहीं देगा कि आरोपित आचरण यौन उत्पीड़न है या नहीं, क्योंकि यह मामला अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष विचाराधीन रहेगा. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि निलंबन कोई दंड नहीं, बल्कि जांच की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए एक प्रशासनिक उपाय है. अंततः कोर्ट ने निर्देश दिया कि अपील के निर्णय तक आईसीसी की सिफारिशों के आधार पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी और राय को नियमित निर्वाह भत्ता मिलता रहेगा. कोर्ट ने यह भी कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा और विश्वास बनाए रखने के लिए ऐसे मामलों में त्वरित और न्यायसंगत प्रक्रिया ज़रूरी है.

-भारत एक्सप्रेस 



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