Amarnath Yatra 2026: कश्मीर की जिन खूबसूरत और बर्फीली वादियों को सरहद पार बैठे आका हमेशा नफरत की आग में झोंकना चाहते हैं, उन्हीं वादियों से हर साल अमरनाथ यात्रा के दौरान ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ की एक ऐसी मखमली और बेमिसाल तस्वीर निकलती है जो पूरी दुनिया के मिलिट्री और सोशल एक्सपर्ट्स को हैरान कर देती है. एक तरफ जहां देश की जांबाज सेना ‘ऑपरेशन शिवाय’ के तहत सुरक्षा का अभेद्य डिजिटल चक्रव्यूह तैयार करती है.
वहीं दूसरी तरफ जमीनी धरातल पर घाटी का आम कश्मीरी मुसलमान अपने मजबूत कंधों पर उठाकर शिवभक्तों को बाबा बर्फानी की पवित्र गुफा तक पहुंचाता है. यह कहानी सिर्फ एक धार्मिक यात्रा भर की नहीं है बल्कि यह कहानी है ‘कश्मीरियत’ के उस कभी न टूटने वाले पवित्र धागे की, जिसे सदियों पहले एक मुस्लिम चरवाहे ने अपने निस्वार्थ भाव से पिरोया था और जिसे आज तक आतंकवाद की बारूदी गोलियां और धमकियां छू तक नहीं पाई हैं.
कौन है बूटा मलिक?
अमरनाथ की इस बेहद पवित्र प्राकृतिक गुफा और स्वयं निर्मित बर्फानी शिवलिंग की खोज का इतिहास बेहद दिलचस्प है और इसका सीधा संबंध एक कश्मीरी मुस्लिम परिवार से जुड़ा हुआ है. बात साल 1850 की है, जब बटकोट (पहलगाम) के रहने वाले एक सीधे-साधे मुस्लिम चरवाहे बूटा मलिक को पहाड़ों में एक साधु मिले, जिन्होंने उन्हें कोयले से भरा एक थैला भेंट किया.
बता दें कि बूटा मलिक जब उसे लेकर अपने घर पहुंचे और थैला खोला, तो उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं क्योंकि वह कोयला सोने के चमकदार सिक्कों में बदल चुका था. जब वह चरवाहा उस साधु का धन्यवाद करने वापस उसी जगह पहुंचा, तो साधु वहां नहीं थे बल्कि वहां साक्षात बाबा बर्फानी की दिव्य गुफा प्रकट हो चुकी थी.
चढ़ावे का 1/3 हिस्से का क्या है किस्सा?
दरअसल इस ऐतिहासिक खोज के बाद, सदियों तक अमरनाथ गुफा पर आने वाले कुल चढ़ावे का एक-तिहाई (1/3) हिस्सा आधिकारिक तौर पर बूटा मलिक के मुस्लिम परिवार को आदर सहित दिया जाता था. इस चढ़ावे को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता था-एक हिस्सा दशनामी अखाड़े के महंत को, दूसरा मट्टन के पुरोहितों को और तीसरा हिस्सा बूटा मलिक के वंशजों को जाता था. यह व्यवस्था साल 2000 में ‘श्री अमरनाथजी श्राइन बोर्ड’ (SASB) के गठन तक पूरी गरिमा के साथ लागू रही और आज भी उनके वंशज इस जुड़ाव को बड़े गर्व से याद करते हैं.
‘पालकी और टट्टू’ का वो अभेद्य मानवीय सहारा
अमरनाथ यात्रा का मार्ग बेहद दुर्गम है, जहां पहलगाम से 32 किलोमीटर और बालटाल से 14 किलोमीटर की खड़ी और खतरनाक चढ़ाई पर चलते हुए अच्छे-अच्छे तंदुरुस्त इंसानों की सांसें फूलने लगती हैं. ऐसे दम घोंटू माहौल में घाटी के स्थानीय कश्मीरी मुसलमान ही इन श्रद्धालुओं के सफर की असली रीढ़ की हड्डी बनते हैं. इस दुर्गम ट्रैक पर जो भी श्रद्धालु शारीरिक रूप से कमजोर, बुजुर्ग या बीमार होते हैं, उन्हें पहाड़ों के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर सुरक्षित आगे ले जाने का पूरा जिम्मा ये स्थानीय मुस्लिम भाई अपने हाथों में उठाते हैं.
वे भीषण बर्फीली हवाओं और कम ऑक्सीजन के बीच पालकी, कांडी (पहाड़ी टोकरी) और टट्टू (घोड़े) चलाकर शिवभक्तों को बाबा के द्वार तक पहुंचाते हैं. इन कश्मीरी भाइयों के लिए वहां से गुजरने वाला हर एक यात्री सिर्फ कोई ‘अतिथि’ नहीं होता बल्कि वे उसे साक्षात भगवान का रूप मानकर उसकी सेवा करते हैं, जो उनके भीतर बसी सच्ची कश्मीरियत का सबसे बड़ा प्रमाण है.
ये भी पढ़ें: रामलला के डॉलर पर भी डाका, VHP की दोटूक- ‘अगर… क्या नपेंगे चंपत राय?
आसरा देकर आतंकियों के एजेंडे पर करारा तमाचा
यह भी बताते चलें कि माइनस डिग्री तापमान वाले इन हाड़ कंपा देने वाले ऊंचे पहाड़ों में जब रात को जानलेवा ठंड पड़ती है, तब श्रद्धालुओं के लिए राहत, ठहरने की जगह और गर्म पानी का मुकम्मल इंतजाम करने का काम यही स्थानीय कश्मीरी युवा करते हैं. शेषनाग, पंचतरणी और बालटाल जैसे सबसे दुर्गम और डरावने पड़ावों पर तंबू लगाना, जीवन रक्षक दवाइयां पहुंचाना और खान-पान की जरूरी दुकानें सजाना इन स्थानीय लोगों की आजीविका भी है और उनका परम सेवा भाव भी. कई कश्मीरी युवा तो लंगरों में निस्वार्थ सेवा करते हुए श्रद्धालुओं के जूते-चप्पल तक अपने हाथों से संभालते हैं.
जब भी सीमा पार से लश्कर या टीआरएफ (TRF) जैसे आतंकी संगठन इस यात्रा को रोकने या डराने की गीदड़भभकी देते हैं, तो उनका असली मकसद सिर्फ यात्रियों को डराना नहीं, बल्कि घाटी के इन 40,000 से अधिक मुस्लिम परिवारों के रोजगार और कश्मीर की इस साझी संस्कृति को आर्थिक चोट पहुंचाना होता है. कश्मीरी मुसलमान हर साल इन धमकियों को पैरों तले कुचलकर खुले दिल से शिवभक्तों का स्वागत करते हैं, जो सरहद पार के नफरती एजेंडे पर सबसे बड़ा और करारा तमाचा है.
Also Follow Bharat Express on Youtube
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.




