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क्या हैं राम मंदिर ट्रस्ट में कृष्ण मोहन की एंट्री के मायने? 2027 से पहले PDA का अचूक तोड़

Why Krishna Mohan In Ram Mandir: अयोध्या राम मंदिर चंदा घोटाले के बाद चंपत राय की विदाई के बाद वरिष्ठ RSS प्रचारक और रिटायर्ड IFS अधिकारी कृष्ण मोहन को मंदिर का नया प्रभारी बनाया गया है. 2027 विधानसभा चुनाव और दलित आउटरीच से जुड़ा इसका पूरा सियासी गणित क्या है?

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Why Krishna Mohan In Ram Mandir: पिछले दिनों अयोध्या के भव्य राम मंदिर में सामने आए चढ़ावा चोरी के मामले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था. हाहाकार के बीच चंपत राय को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा. इसके बाद कृष्ण मोहन के रूप में संघ परिवार और BJP ने अयोध्या की धरती से अदृश्य सियासी तीर चलाया है. इसे अब 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले विपक्ष के पूरे चक्रव्यूह को भेदने का औजार समझा जा रहा है. आइये समझें कृष्ण मोहन की नियुक्ति के क्या हैं सियासी मायने?

प्रशासनिक डैमेज कंट्रोल के बहाने खेला गया यह दांव असल में एक बहुत बड़ा राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक है. कृष्ण मोहन को राम मंदिर के दैनिक कामकाज और सर्वोच्च प्रशासनिक व्यवस्था की कमान सौंप दी है. ऊपरी तौर पर यह भले ही एक सामान्य फेरबदल दिखे, लेकिन अवध की राजनीतिक चौपालों में इसे 2027 के महा-संग्राम से पहले दलित समुदाय को साधने के सबसे बड़े ‘ब्लूप्रिंट’ के रूप में देखा जा रहा है.

तोड़नी है फैजाबाद की वो टीस (Krishna Mohan For Faizabad)

साल 2024 के लोकसभा चुनाव के उन नतीजों में छिपी हैं, जिसने भाजपा के रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी थी. राम मंदिर की भव्य प्राण-प्रतिष्ठा के महज कुछ महीनों बाद ही, अयोध्या जिस फैजाबाद लोकसभा सीट के अंतर्गत आती है, वहां भाजपा को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा. समाजवादी पार्टी (SP) के कद्दावर दलित नेता अवधेश प्रसाद ने इस सीट पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की. इस हार के बाद कांग्रेस और सपा सहित पूरे विपक्ष ने देश भर में यह नैरेटिव (विमर्श) सेट करना शुरू कर दिया कि राम मंदिर के मुख्य आयोजनों और प्रशासनिक ऊंचाइयों से दलित समाज को दूर रखा गया.

अब 74 वर्षीय कृष्ण मोहन की इस सर्वोच्च कार्यकारी पद (इंटरिम जनरल सेक्रेटरी) पर नियुक्ति करके संघ और भाजपा ने विपक्ष के उस पूरे नैरेटिव को एक झटके में ध्वस्त कर दिया है. यह इतिहास में पहली बार है जब राम मंदिर के रोजमर्रा के प्रशासन की कमान किसी दलित चेहरे को सौंपी गई है.

कौन हैं ‘क्रेडिबिलिटी किंग’ कृष्ण मोहन? (Who Is Krishna Mohan)

संगठन के भीतर कृष्ण मोहन की स्वीकार्यता केवल उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण नहीं है, बल्कि उनका ट्रैक रिकॉर्ड और प्रशासनिक अनुभव बेहद कड़ा और बेदाग रहा है.

  • उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के मूल निवासी कृष्ण मोहन ने लखनऊ विश्वविद्यालय से भूविज्ञान में एमएससी की
  • सिविल सर्विसेज में आने से पहले वे परमाणु ऊर्जा विभाग में एक वैज्ञानिक के रूप में काम कर चुके हैं
  • 1978 बैच के महाराष्ट्र कैडर के प्रतिष्ठित आईएफएस (IFS) अधिकारी बने
  • साल 2012 में एडिशनल प्रिंसिपल चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट के पद से सेवानिवृत्त हुए

RSS का पुराना और मजबूत स्तंभ (RSS Dalit Representative Krishna Mohan)

कृष्ण मोहन पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए संघ के ‘क्षेत्र संघचालक’ (क्षेत्रीय प्रमुख) हैं. इससे पहले वे अवध क्षेत्र में नगर, जिला और प्रांत संघचालक जैसी कई अहम सांगठनिक जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं. सितंबर 2025 में, राम मंदिर आंदोलन की पहली आधारशिला (नींव की ईंट) रखने वाले दिवंगत दलित नेता कामेश्वर चौपाल के स्थान पर कृष्ण मोहन को ट्रस्ट का दलित प्रतिनिधि बनाया गया था. इतना ही नहीं, जनवरी 2024 में हुए प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के दौरान वे और उनकी पत्नी मुख्य ‘यजमान’ जोड़ों में भी शामिल थे.

सपा और कांग्रेस की बिसात का काउंटर अटैक (Krishna Mohan Roll In Ram Mandir)

उत्तर प्रदेश में साल 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सभी दल अपनी-अपनी गोटियां सेट करने में जुटे हैं. एक तरफ जहां समाजवादी पार्टी (SP) अपने पीडीए (PDA) फॉर्मूले के तहत इस बार रिकॉर्ड संख्या में दलित उम्मीदवारों को मैदान में उतारने की रणनीति बना रही है, वहीं कांग्रेस ने भी हाल ही में कद्दावर दलित नेता राजेंद्र पाल गौतम को ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (AICC) का यूपी प्रभारी महासचिव नियुक्त कर अपनी सोशल इंजीनियरिंग को धार दी है.

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ऐसे में, राम मंदिर के खजाने में लगी सेंधमारी के दाग को धोने और प्रशासनिक ढांचे को पारदर्शी बनाने के लिए कृष्ण मोहन से बेहतर कोई विकल्प नहीं हो सकता था. उनकी छवि एक ईमानदार और सख्त पूर्व नौकरशाह की है, जो वित्तीय हेराफेरी के सिंडिकेट को कुचलने का दम रखते हैं, और उनका चेहरा विपक्ष के उस प्रचार परमानेंट फुल-स्टॉप लगाता है कि भाजपा का हिंदुत्व समावेशी नहीं है.

आस्था के मंच से 2027 की अंतिम घेरेबंदी (Krishna Mohan UP Politics)

अयोध्या की इस नई प्रशासनिक व्यवस्था ने यह साफ कर दिया है कि 2027 की चुनावी जंग कितनी हाई-स्टेक होने जा रही है. कृष्ण मोहन के हाथों में राम मंदिर का रिमोट कंट्रोल देकर भाजपा और संघ ने यह संदेश बहुत स्पष्ट रूप से गांव-गांव तक पहुंचा दिया है कि रामलला का दरबार और उनकी हुकूमत हिंदू समाज के हर आखिरी छोर पर खड़े व्यक्ति की है. अब देखना दिलचस्प होगा कि विपक्ष इस ‘साइलेंट और सॉलिड’ काउंटर अटैक का क्या जवाब ढूंढ पाता है.



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