Bangladesh communal tension: “बाग़बाँ ने आग दी जब आशियाने को मिरे, जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे.” विश्वासघात के दर्द को दिखाता यह शेर जब साक़िब लखनवी ने अपने कलम से इसे कोरे कागज पर उकेरा होगा तब यह सोचा भी नहीं होगा कि मेरे शेर में अंकित एक-एक शब्द आज के हालात पर फिट बैठेगा. लेकिन मौजूदा समय में हालात कुछ ऐसे ही नजर आ रहे हैं. इससे पहले कि हम अपने मूल विषय पर पहुंचे उससे पहले हम इस शेर का मतलब बता देते हैं. इस शेर का मतलब है जब मेरे आशियाने को आग लगी, तो जिन पत्तों पर मैं भरोसा करके टिका हुआ था, वही पत्ते अब हवा देने लगे. अगर सीधे शब्दों में समझें तो साफ है कि जिन लोगों पर भरोसा किया, वही नुकसान पहुंचाने लगे.
जानते हैं हकीकत की दुनिया
शेरो शायरी से निकलकर हम आपको लिए चलते हैं हकीकत की दुनिया में. क्योंकि, इन दिनों बांग्लादेश (Bangladesh) यानी कि ग्लोब पर अंकित वह भू भाग जिसे भारत ने पाकिस्तान से आजादी दिलाई और एक स्वतंत्र देश का दर्जा दिलाया. आज वही बांग्लादेश अपने राजनीति की आग में जल रहा है. और इस आग में जलाये जा रहे हैं अल्पसंख्यक बांग्लादेशी हिंदू.
जलाए जा रहे हैं हिंदू
वही, हिंदू जिन्होंने बांग्लादेश (Bangladesh) को अपना घर माना. वही हिंदू जिन्होंने बांग्लादेश को छोड़ने के बजाय वहां की मिट्टी की सेवा करना चुना. वही हिंदू जिन्होंने अपनी सरहदों में रहकर खुलकर सांस ली. वही हिंदू जिन्होंने अपने बहुसंख्यक पड़ोसियों को अपना परिवार माना. वही हिंदू आज बांग्लादेश में पीटे जा रहे हैं. मारे जा रहे हैं और मानवीयत की सारी हदों को पार करके जघन्य तरीके से जलाए जा रहे हैं.
खबरों को अगर खंगालेंगे तो पाएंगे कि पिछले एक महीने में एक-एक करके बांग्लादेश (Bangladesh) पांच से अधिक हिंदुओं की हत्या बांग्लादेश में कर दी गई है. ये हत्या न सिर्फ एक हत्या है बल्कि इंसानियत की सारी सीमाओं को घृणित तरीके से पार कर हिंदुओं में भय पैदा करने की कोशिश है.
किस-किस की हुई हत्या
तो चलिए आपको बताते हैं उन पांच बेहूदापूर्ण हत्या के बारे में. सबसे पहले हम आपको हाल की घटना बताते हैं. ढ़ाका से करीब 180 किलोमीटर की दूरी पर स्थित जिला जेस्सोर में एक पब्लिक प्लेस पर एक हिंदू युवक को गोली मार दी गई. गोली लगने के बाद उस युवक की मौत हो गई. मृतक की पहचान कुछ इस प्रकार है. उम्र 45 साल. पिता का नाम- राणा प्रताप बैरागी. पता- केशबपुर उपजिला का अरुआ गांव.
अब हम आपको बताते हैं अन्य चार घटनाओं के बारे में. दीपु चंद्र दास नाम के एक हिंदू व्यक्ति को उन्मादी भीड़ ने पीट-पीटकर मार दिया था. इसके अलावा अमृत मंडल नाम के एक युवक को भी हाल के दिनों में हत्या कर दी गई थी. वहीं मयमनसिंह जिले में बजेंद्र बिस्वास नाम के हिंदू युवक को गोली मार कर मौत की नींद सुला दिया गया था. वहीं खोकन दास नाम के एक हिंदू कारोबारी पर मतिभ्रष्ट भीड़ ने हमला बोल दिया और उसकी हत्या कर दी.
राजनीति की आग में जल रहा है बांग्लादेश
इन खबरों को देखने के बाद आप समझ गए होंगे कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की आग में झुलस रहा बांग्लादेश अपने अल्पसंख्यक हिंदू नागरिकों को झुलसा रहा है. लेकिन न तो वहां के हालात को सुधारने में सरकार दिलचस्पी ले रही है न प्रशासन. लेकिन, हर दिन, हर घंटे, हर मिनट और हर पल हिंदू अल्पसंख्यक इस डर में अपना जीवन गुजार रहे हैं कि कहीं अगला नंबर मेरा तो नहीं.
मिल रहा है सिर्फ तरस और दुआ
ऐसे में इन दिनों बांग्लादेश (Bangladesh) में अल्पसंख्यक हिंदुओं का सुरत ए हाल साक़िब लखनवी के शब्दों में कुछ ऐसा ही है. ‘सुनने वाले रो दिए सुन कर मरीज़-ए-ग़म का हाल, देखने वाले तरस खा कर दुआ देने लगे.’ क्योंकि, जो लोग इस खबर को देख हैं वो सिर्फ यही कामना कर सकते हैं कि बांग्लादेश में हालात जल्द से जल्द ठीक हों. क्योंकि, हाल की घटनाओं को देखने के बाद बाहरी लोग अंदर ही अंदर सिर्फ सिसक रहे हैं और उन अल्पसंख्यक हिंदुओं पर तरस खा रहे हैं.
वहीं जिन लोगों के पिता की मौत बर्बर तरीके से भीड़ ने कर दी उनके बच्चे निदा फ़ाज़ली के शब्दों में बस यही कह रहे होंगे. ‘तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है, वो झूठा है, वो झूठा है, वो झूठा है, तुम्हारी कब्र में मैं दफन तुम मुझमें जिन्दा हो, कभी फुरसत मिले तो फातहा पढनें चले आना.’
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