दिल्ली में बिहार कांग्रेस की बड़ी बैठक हुई. इस बैठक में पार्टी चीफ मल्लिकार्जुन खरगे के साथ-साथ राहुल गांधी भी शामिल रहे. सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में बिहार कांग्रेस के सभी 6 विधायक शामिल हुए. इस मीटिंग के बाद पार्टी हाईकमान ने राहत की सांस ली है.
जमीनी मुद्दों पर खुलकर चर्चा
सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक, बैठक में पार्टी की कमजोरियों, नेतृत्व की भूमिका, गठबंधन की राजनीति और जमीनी मुद्दों पर खुलकर चर्चा हुई.
बैठक में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बिहार कांग्रेस को मजबूत करने की जिम्मेदारी स्थानीय नेताओं को ही उठानी होगी. उन्होंने दो टूक कहा कि सिर्फ केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे पार्टी को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता. जमीन पर मेहनत, संगठन को सक्रिय करना और जनता के बीच लगातार मौजूद रहना, ये सभी काम राज्य इकाई को ही करने होंगे. राहुल गांधी ने यह भी भरोसा दिलाया कि जहां जरूरत होगी, वहां वे और केंद्रीय नेतृत्व सहयोग के लिए मौजूद रहेंगे, लेकिन पहल स्थानीय नेताओं को ही करनी होगी.
बिहार में कैसे उठेगा कांग्रेस?
बैठक में सांसद पप्पू यादव का बयान खासा चर्चा में रहा. उन्होंने कहा कि अगर कांग्रेस को बिहार में खुद को फिर से खड़ा करना है, तो उसे राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की छाया से बाहर निकलकर स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनानी होगी.
वरिष्ठ नेता तारिक अनवर ने संगठनात्मक ढांचे पर जोर देते हुए कहा कि केवल जिम्मेदारी सौंप देना काफी नहीं है, बल्कि यह भी तय होना चाहिए कि उस जिम्मेदारी का परिणाम क्या रहा. जवाबदेही तय किए बिना संगठन मजबूत नहीं हो सकता. इसी क्रम में रंजीत रंजन ने भी तीखी बात रखी और कहा कि बिहार कांग्रेस की मौजूदा कमजोरी के लिए वे लोग जिम्मेदार हैं जो लंबे समय से संगठन चला रहे हैं.
मदन मोहन ने सरकार को घेरा
सामाजिक मुद्दों पर मदन मोहन झा ने सरकार को घेरते हुए कहा कि बिहार में कानून-व्यवस्था और नशा आज सबसे बड़े मुद्दे बन चुके हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि हॉस्टलों में नशा बांटा जा रहा है, और महिलाओं के खिलाफ हत्या और बलात्कार जैसे अपराध बढ़ रहे हैं. उन्होंने इन मुद्दों को कांग्रेस के प्रमुख राजनीतिक एजेंडे के रूप में उठाने की मांग की, जिस पर राहुल गांधी ने भी सहमति जताई.
बैठक में संगठनात्मक ढांचे की कमी को लेकर भी चिंता जताई गई. कई नेताओं ने कहा कि लंबे समय से प्रदेश कमेटी का गठन नहीं हुआ है, जिससे संगठन कमजोर पड़ा है और इसका सीधा नुकसान पार्टी को चुनावी और राजनीतिक स्तर पर उठाना पड़ा है. इसे तत्काल गठित करने की सलाह दी गई.
अंत में यह भावना उभरकर सामने आई कि वरिष्ठ नेताओं को संगठन में नजरअंदाज करना पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है. उनके अनुभव और भूमिका को बढ़ाए बिना संगठन को मजबूत करना मुश्किल होगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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