भारत के लॉ शिक्षा के अग्रदूत प्रोफ़ेसर एनआर माधव मेनन की स्मृति में और अगले 25 वर्षों के लिए एक रोडमैप तैयार करने के लिए प्रथम प्रोफ़ेसर एनआर माधव मेनन स्मृति व्याख्यान (Prof NR Madhava Menon Memorial Lecture) का उद्घाटन किया गया.
भारत के चीफ जस्टिस, न्यायमूर्ति बीआर गवई (CJI BR Gavai) ने “2047 में विधि एवं न्याय शिक्षा: स्वतंत्रता के 100 वर्षों का एजेंडा” (Legal and Justice Education @2047: An Agenda for 100 Years of Independence) विषय पर ओपनिंग लेक्चर दिया. इस कार्यक्रम में प्रोफेसर एस शिवकुमार और प्रोफेसर लिसा पी. लुकोज़ द्वारा संपादित तीन महत्वपूर्ण पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया.
सीजेआई बीआर गवई ने भारत में विधि शिक्षा में क्रांति लाने के लिए प्रोफ़ेसर मेनन (1935-2019) की सराहना की. उन्होंने मेनन को पांच वर्षीय एकीकृत विधि कार्यक्रम शुरू करने और एनएलएसआईयू बैंगलोर और एनयूजेएस कोलकाता सहित नेशनल लॉ कॉलेज की स्थापना का श्रेय दिया.
इन संस्थानों ने विधि शिक्षा को पेशेवर बनाया. साथ ही सामाजिक विज्ञान को विधि के साथ एकीकृत किया और पूरे भारत में 27 राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों की स्थापना की. जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि प्रो. मेनन का दृष्टिकोण कानूनी शिक्षा और न्यायिक प्रशिक्षण को प्रेरित करता रहता है, जिसके लिए उन्हें 2003 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था.
2047 के लिए कानूनी शिक्षा की परिकल्पना
भारत की स्वतंत्रता की शताब्दी पर बोलते हुए न्यायमूर्ति बीआर गवई ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कानूनी शिक्षा को नैतिक, सामाजिक रूप से ज़िम्मेदार और संवैधानिक रूप से प्रतिबद्ध नागरिकों का निर्माण करना चाहिए. उन्होंने कानून तक पहुंच बढ़ाने, भौगोलिक, आर्थिक और भाषाई बाधाओं को तोड़ने और क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा को बढ़ावा देने पर ज़ोर दिया.
कानूनी शिक्षा को कॉर्पोरेट करियर से आगे बढ़कर असमानता, सामाजिक न्याय और वैश्विक चुनौतियों, विशेष रूप से वैश्विक दक्षिण को प्रभावित करने वाली चुनौतियों का समाधान करना होगा.
आलोचनात्मक सोच विकसित करें
चीफ जस्टिस बीआर गवई (BR Gavai) ने नैतिकता, अनुभव आधारित शिक्षा और मार्गदर्शन के महत्व पर प्रकाश डाला. उन्होंने लॉ स्कूलों से न्यायिक फैसलों के पीछे के कारण पर ध्यान केंद्रित करने, आलोचनात्मक सोच को प्रोत्साहित करने और इंटरडिसिप्लिनरी स्टडीज को एकीकृत करने का आग्रह किया.
उभरते क्षेत्रों में विशेष रूप से टेक्नोलॉजी और क़ानून को हार्वर्ड के बर्कमैन क्लेन सेंटर जैसे रिसर्च सेंटर की आवश्यकता है, जो डिजिटल गोपनीयता और एल्गोरिथम संबंधी पूर्वाग्रह जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए क़ानून, नैतिकता, कंप्यूटर विज्ञान और सामाजिक विज्ञान को एक साथ लाएं.
यह लेक्चर एशिया में स्थिरता, आपदा प्रबंधन और महामारी से संबंधित कानूनी चुनौतियों पर केंद्रित तीन पुस्तकों के लोकार्पण के साथ हुआ. न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि ये रचनाएं न्याय और मानव कल्याण को कायम रखते हुए खतरों का सामना करने में कानून की भूमिका को दर्शाती हैं.
अंत में उन्होंने शिक्षकों, छात्रों और नीति निर्माताओं से प्रो. मेनन की विरासत को आगे बढ़ाने का आह्वान किया और यह सुनिश्चित किया कि 2047 तक भारत की कानूनी शिक्षा प्रणाली विश्व स्तर पर सम्मानित, लोकतांत्रिक और सामाजिक रूप से न्यायसंगत हो.
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-भारत एक्सप्रेस
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