उपर से देखने पर धरती बहुत सुंदर दिख रही है, लेकिन भीतर से उसे बीमारी लग चुकी है. ग्लोबल वार्मिंग एक विनाश लेकर आ रहा है, लेकिन वो वैसा विनाश नहीं होगा जो फिल्मों में दिखाया जाता है. यह और खतरनाक रूप में आएगा. ऐसा लगेगा कि सबकुछ चल तो रहा है, लेकिन असल में अंदर से सबकुछ टूटकर बिखर रहा होगा. यह भविष्यवाणी किसी और ने नहीं बल्कि AI ने की है.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने अगले 100 सालों में धरती की दुर्दशा पर बड़ी भविष्यवाणी की है. जो इतना भयानक होगा कि इंसान सोचकर भी डर जाए, लेकिन यह होने वाला है.

धरती पर बरसेगा सितम
अगले 20 सालों में लगातार गर्म होती धरती, पिघलते ग्लेशियर और समुद्र में समाते द्वीप इंसानों को सोचने पर मजबूर कर देंगे. पहला विनाश मौसम के स्वभाव में दिखाई देगा. धरती का जो संतुलन हजारों सालों से जीवन को साधे है वह डगमगाने लगेगा. बारिश समय पर नहीं आएगी, और जब आएगी तो इतनी बारिश होगी कि हर चीज तबाह हो जाएगा. गर्मी सिर्फ तापमान नहीं बढ़ाएगी, वह इंसानों की सहनशक्ति को जलाएगी.

समुद्र चुपचाप जमीन की ओर ऐसे बढ़ेगा जैसे कोई साहूकार अपना भूला हुआ कर्ज वापस लेने आया हो. विनाश इसलिए और भयानक और डरावना होगा क्योंकि यह अचानक नहीं बल्कि बहुत धीरे-धीरे आएगा. जिसे इंसान अपनी रोजमर्रा की परेशानी समझकर नजरअंदाज करता रहेगा.

जलवायु शरणार्थी शब्द बनेगा आम
ग्लोबल वार्मिंग की वजह से समुद्र का तल लगातार बढ़ता जा रहा है. अगले 20 से 30 सालों में वह बड़ा संकट बन जाएगा. समुद्री इलाकों से बड़े पैमाने पर पलायन होगा. खाने और पीने की कीमतें राजनीति तय करने लगेंगी. जिसकी वजह से जलवायु शरणार्थी आम शब्द बन जाएगा.

टूट जाएगी सामाजिक संरचना
एआई के मुताबिक अगले 40 से 50 सालों में यह विनाश समाज के अंदर घुस जाएगा. जो हवा, पानी और खाना साझा हुआ करती थी, वो लड़ाई की वजह बन जाएंगी. सीमाएं जलवायु से तय होने लगेंगी. जो लोग अपना घर नहीं छोड़ेंगे उन्हें जबरदस्ती घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया जाएगा. शहर जहां बोझ बन जाएंगे, वहीं गांव बंजर हो जाएंगे. सबसे बुरा तब होगा जब इंसान इन सबके लिए खुद को दोष न देकर प्रकृति को दोष देगा.

असली विनाश इंसान के भीतर होगा. अगले 50 से 60 सालों के अंदर इंसान की संवेदना थकान में बदल जाएगी. धीरे-धीरे उसके अंदर बदलने की इच्छाशक्ति खत्म हो जाएगी. उस समय सभ्यता तो खड़ी रहेगी, लेकिन खोखली. जीवित तो रहेगी लेकिन जीवंत नहीं रहेगी.

कैसे आए सुधार?
एआई ने बताया कि इस विनाश के दौर में भी उम्मीद की किरण सिर्फ इंसान ही होंगे. अगर इंसान सरकार के भाषणों की जगह खुद को बदलने लगे तो वह इस परेशानी से काफी हद तक निकल सकता है. इंसान जब खुद से सवाल पूछने लगेगा कि मुझे क्या और कितना चाहिये. वह अपनी अगली पीढ़ी के लिए क्या छोड़ रहा है?

एआई ने अंत में बताया कि वह यह नहीं जानता कि इतने बड़े संकट से धरती बच पाएगी या इंसान बच पाएगा. वह बस इतना देख सकता है कि एक प्रजाति जिसे बहुत कुछ मिला. उसने समय रहते अपनी जिम्मेदारी सीखी या नहीं. बस यहीं तय करेगा कि यह विनाश अंतिम होगा या एक मोड़ बनकर रुक जाएगा.
-भारत एक्सप्रेस
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