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क्या नए मतदाताओं की राह होगी मुश्किल? चुनाव आयुक्तों के ‘डिसेंट नोट’ से घिरे मुख्य निर्वाचन आयुक्त, विपक्ष का तीखा हमला

नए मतदाताओं के ऑनलाइन पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले ‘फॉर्म 6’ में किए गए बदलावों ने देश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है.

CEC Gyanesh Kumar Impeachment

देश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. वजह है नए मतदाताओं के ऑनलाइन पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले ‘फॉर्म 6’ (ECInet) में किए गए कुछ बदलाव. मामला सिर्फ राजनीतिक दलों की बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि खुद निर्वाचन आयोग के भीतर से असहमति के सुर उठने के बाद यह और ज्यादा गंभीर हो गया है.

आयोग के दो निर्वाचन आयुक्तों डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है और अपने ‘डिसेंट नोट’ (असहमति नोट) दर्ज किए हैं. इसके बाद से विपक्ष का पारा सातवें आसमान पर है और सरकार के साथ-साथ मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं.

फॉर्म 6 में ऐसा क्या बदल गया, जिस पर हो रहा है हंगामा?

ऑनलाइन पोर्टल पर उपलब्ध फॉर्म 6 में ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) से जुड़ा एक नया घोषणा खंड जोड़ा गया है. इसके तहत पहली बार वोट देने वाले युवाओं से उनके परिवार के चुनावी इतिहास से जुड़े तीन सवाल पूछे गए:

  • क्या 2000 के दशक की शुरुआत में हुए SIR के दौरान मतदाता सूची में उनका खुद का नाम था?
  • क्या उस पुरानी लिस्ट में उनके माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी का नाम शामिल था?
  • क्या उस लिस्ट में न तो उनका नाम था और न ही उनके परिजनों का?

हालांकि पोर्टल पर इस सवाल को ‘गैर-अनिवार्य’ दिखाया गया था, लेकिन तकनीकी पेंच यह था कि बिना इसका उत्तर दिए फॉर्म सबमिट ही नहीं हो पा रहा था.

चुनाव आयुक्तों की बड़ी आपत्तियां

इस पूरे मामले पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने खुलकर कानूनी और व्यावहारिक ऐतराज जताए हैं. पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओ.पी. रावत और पूर्व निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा ने भी इन आपत्तियों का पूरा समर्थन किया है.

विशेषज्ञों और आयुक्तों का मुख्य तर्क यह है कि फॉर्म 6 एक वैधानिक फॉर्म है, जो ‘Registration of Electors Rules, 1960’ के तहत तय होता है. इसमें कोई भी बदलाव करने के लिए कानून मंत्रालय की अधिसूचना और औपचारिक संशोधन की जरूरत होती है. आयोग सिर्फ अपने स्तर पर निर्देश जारी करके इसे नहीं बदल सकता.

आयुक्त संधू ने अपने नोट में साफ चेतावनी दी थी कि इस तरह की अधूरी घोषणाएं जोड़ने से पहली बार वोट देने वाले युवाओं को भारी परेशानी होगी और वे अपने मताधिकार से भी वंचित हो सकते हैं. वहीं, ओ.पी. रावत का कहना है कि इस प्रक्रिया से मतदाताओं के मन में डर पैदा हो रहा है, जो लोकतंत्र के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है. जिन परिवारों के नाम साल 2000 के पुनरीक्षण के दौरान छूट गए थे, उनके सामने अब एक पीढ़ीगत संकट खड़ा हो जाएगा.

विपक्ष का जोरदार हमला, इस्तीफे की मांग

इस अंदरूनी खुलासे के बाद राजनीतिक दल भी पूरी तरह मुखर हो गए हैं. कांग्रेस पार्टी ने इस मुद्दे पर सरकार और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को आड़े हाथों लिया है.

कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि असहमति ही लोकतंत्र की असली ताकत है. उन्होंने दोनों चुनाव आयुक्तों के साहस की सराहना करते हुए मांग की कि सभी लिखित असहमति नोट्स को सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि पारदर्शिता बनी रहे. सिंघवी ने आरोप लगाया कि एसआईआर प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में करोड़ों मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं, जिससे यह आशंका पैदा हो गई है कि अंत तक यह आंकड़ा 15 करोड़ तक पहुंच सकता है.

दूसरी तरफ, निर्वाचन आयोग ने इन अंदरूनी मतभेदों की खबरों को खारिज करते हुए कहा है कि आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है जहाँ वैचारिक असहमति और चर्चा होना एक सामान्य बात है. साथ ही, यह भी दावा किया गया है कि चुनावी पुनरीक्षण से जुड़े सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं.

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-भारत एक्सप्रेस



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