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थिएटर बना यादों का आईना: कला संकुल सेमिनार में नाटक ‘फायरप्लेस’ की प्रभावशाली प्रस्तुति

दिल्ली का सांस्कृतिक परिदृश्य हर माह एक नए ताप से जगमगा उठता है, जब कला संकुल अपने अखंड संकल्प के साथ महीने के अंतिम रविवार को सेमिनार का आयोजन करता है.

Edited by Vaibhav Gupta

दिल्ली का सांस्कृतिक परिदृश्य हर माह एक नए ताप से जगमगा उठता है, जब Kala Sankul अपने अखंड संकल्प के साथ महीने के अंतिम रविवार को सेमिनार का आयोजन करता है. यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि साहित्य, रंगमंच और विचारों की उस धारा का विस्तार है जो वर्षों से बिना रुके समाज में संवेदना और रचनात्मक चेतना का संचार कर रही है.

कला संकुल का उद्देश्य हमेशा यही रहा है कि  को समाज की संवेदना, संवाद और मानवीय जिजीविषा से जोड़ा जाए मंच को संवाद का जीवंत माध्यम बनाया जाए. इसी क्रम में इस माह प्रस्तुत हुआ नाटक ‘फायरप्लेस’, जिसने अपनी भावनात्मक गहराई से एक गंभीर मौन रचा, जो दर्शकों के भीतर देर तक गूँजता रहा.

कार्यक्रम की शुरुआत

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन से हुई, जिसमें संस्कार भारती के अखिल भारतीय संगठन मंत्री अभिजीत गोखले, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के रजिस्ट्रार पी. के. मोहंती, नाटक के निर्देशक रोहित त्रिपाठी और संयोजक राज उपाध्याय उपस्थित थे. कार्यक्रम में संस्कार भारती दिल्ली प्रान्त के कार्यकारी अध्यक्ष कवि श्री राजेश जैन ‘चेतन’,संस्कार भारती गोरक्ष प्रान्त अध्यक्ष संगीत साधक श्री शरद मणि त्रिपाठी उपस्थित रहें. मुख्य अतिथि अभिजीत गोखले ने अपने उद्बोधन में कहा, ‘हमें कश्मीर 1990 के दर्द को भूलना नहीं चाहिए, लेकिन हमें एकजुट रहकर एक नया सवेरा लाना चाहिए.’ यह बात नाटक की संवेदना से गहरे स्तर पर जुड़ती है, क्योंकि ‘फायरप्लेस’ केवल एक प्रस्तुति नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति और पीड़ा की पुनर्स्मृति है.

समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि मासूमों के पक्ष में

नाटक कश्मीर 1990 की त्रासदी को किसी आरोप या उग्र भाषा में नहीं, बल्कि मानवीय करुणा और टूटे जीवनों की सच्चाई के साथ सामने लाता है. डॉ. राजीव मिश्र द्वारा लिखित यह कृति विस्थापन, हिंसा और घर-परिवार के बिखर जाने के दर्द को बेहद सादगी से व्यक्त करती है. निर्देशक रोहित त्रिपाठी ने इसे अतिनाटकीयता से परे रखते हुए शांत लेकिन तीव्र संवेदना के साथ मंचित किया. ‘फायरप्लेस’ स्पष्ट करता है कि यह नाटक किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि उन मासूमों के पक्ष में है जो बिना दोष के इतिहास के दंश का शिकार बने.

कलाकारों के अभिनय ने प्रस्तुति को जिंदा बना दिया. शेखर रैना के रूप में रोहित त्रिपाठी की आंतरिक टूटन, कलीम दार के रूप में विपिन जग्गा का मानवीय संतुलन, राहुल रैना के रूप में आशुतोष बनर्जी की तीक्ष्ण ऊर्जा और सरिता दत्त के रूप में अनामिका सागर का गहरा संताप. इन सभी ने दर्शकों को नाटक के वातावरण में पूरी तरह डूबो दिया. कई क्षणों में ऐसा लगा जैसे मंच पर दिख रहा दर्द दर्शकों की साँसों तक पहु.च रहा हो.

नाटक की भावनाओं को किया और प्रखर

तकनीकी टीम का योगदान विशेष उल्लेखनीय रहा. मुकेश झा की लाइट्स, आयुषी त्रिपाठी और तियरा त्रिपाठी का सेट, नरेश कुमार का संगीत और चंद्रकांता के कॉस्ट्यूम. इन सबने मिलकर एक ऐसा वातावरण रचा जिसने नाटक की भावनाओं को और प्रखर कर दिया.

कार्यक्रम को सफल बनाने में श्याम कुमार, मुनमुन, स्नेहा मुखर्जी, हर्षित गोयल और प्रदीप पाठक की भूमिका महत्वपूर्ण रही. मंच संचालन विश्वदीप ने सहजता और गरिमा के साथ किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन राज उपाध्याय द्वारा किया गया. अंत में शांति मंत्र के साथ यह सार्थक और विचारोत्तेजक आयोजन संपन्न हुआ.

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-भारत एक्सप्रेस



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