Ethanol Blending India: भारत इस समय अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए ‘इथेनॉल ब्लेंडिंग’ पर तेजी से काम कर रहा है. सरकार का लक्ष्य है कि पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ाई जाए ताकि विदेशों से तेल कम खरीदना पड़े. लेकिन इस चमकते हुए सपने के पीछे एक डरावनी हकीकत भी छिपी है. हालिया रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की चेतावनी ने इस नीति पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. सवाल यह है कि क्या हम अपनी गाड़ियों को चलाने के लिए देश का पानी और गरीबों का अनाज दांव पर लगा रहे हैं?
इथेनॉल क्या है और यह कहां से आता है?
इथेनॉल एक तरह का अल्कोहल है, जिसे गन्ने के रस, मक्का, खराब अनाज या टूटे हुए चावल को सड़ाकर बनाया जाता है. इसे ‘बायोफ्यूल’ या जैविक ईंधन भी कहते हैं क्योंकि यह कृषि उत्पादों से बनता है. जब इसे पेट्रोल में मिलाया जाता है, तो यह प्रदूषण कम करने में मदद करता है और इंजन में ईंधन की तरह जलता है. भारत में मुख्य रूप से गन्ने की खेती और अब टूटे हुए चावल से इसे तैयार किया जा रहा है.
पानी की भारी खपत: 1 लीटर तेल के लिए दरिया
सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा पानी की खपत को लेकर है. रिपोर्ट बताती है कि 1 लीटर इथेनॉल बनाने की प्रक्रिया में करीब 10,000 लीटर पानी खर्च हो जाता है. भारत पहले से ही पानी की कमी से जूझ रहा है. गन्ना और धान (चावल) दोनों ही ‘वॉटर इंटेंसिव’ यानी बहुत ज्यादा पानी लेने वाली फसलें हैं. नीति आयोग की एक पुरानी रिपोर्ट के अनुसार, भारत में गन्ने की खेती के लिए जितना पानी इस्तेमाल होता है, वह कई राज्यों की प्यास बुझाने के लिए काफी है. अब उसी गन्ने और चावल से ईंधन बनाना भविष्य में जल संकट को और गहरा कर सकता है.
चावल से तेल बनाने का ‘खेल’ और खाद्य सुरक्षा
भारत में गरीबों के लिए चावल एक बुनियादी आहार है. सरकार अब चावल से इथेनॉल बनाने पर जोर दे रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हम अनाज को शराब या ईंधन में बदल देंगे, तो बाजार में खाने वाले अनाज की कमी हो सकती है. इससे अनाज की कीमतें बढ़ेंगी और आम आदमी की थाली से चावल महंगा हो सकता है. खाद्य और जल सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है.
इथेनॉल से पेट्रोल बनाने की लागत और फायदा
इथेनॉल बनाने की लागत गन्ने या अनाज की कीमतों पर निर्भर करती है. वर्तमान में इथेनॉल की कीमत करीब 50 से 65 रुपये प्रति लीटर के बीच रहती है. जब इसे पेट्रोल में मिलाया जाता है, तो कच्चे तेल के आयात पर खर्च होने वाला विदेशी मुद्रा भंडार बचता है. हालांकि, इथेनॉल बनाने के लिए जो फैक्ट्रियां और इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए, उसमें भारी निवेश की जरूरत होती है. क्या इससे पेट्रोल सस्ता होगा? फिलहाल, सरकार का ध्यान पेट्रोल सस्ता करने से ज्यादा विदेशी मुद्रा बचाने और किसानों की आय बढ़ाने पर है. आने वाले समय में अगर ब्लेंडिंग 20% तक सफल रहती है, तो कीमतों में कुछ स्थिरता आ सकती है, लेकिन बड़े बदलाव की गारंटी नहीं है.
भविष्य की चुनौतियां: बूंद-बूंद पानी को तरसेंगे?
भले ही हम ‘ग्रीन एनर्जी’ और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन इथेनॉल वाले फ्यूल की कीमत बहुत ज्यादा हो सकती है. सबसे बड़ा खतरा हमारे भूजल (ground water) को है. अगर हम अंधाधुंध तरीके से सिंचाई और प्रोसेसिंग में पानी बहाएंगे, तो अगली पीढ़ी को पीने के पानी के लिए तरसना पड़ सकता है. हमें ईंधन तो चाहिए, लेकिन रोटी और पानी की बलि देकर नहीं. भारत को ऐसी तकनीक पर काम करने की जरूरत है जो कम पानी वाली फसलों (जैसे बाजरा या अन्य कचरा) से इथेनॉल बना सके.
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