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भारत में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में क्रांतिकारी बदलाव, नीतियों और निवेशों से बन रहा नया औद्योगिक परिदृश्य

भारत सरकार की नीतियों और रणनीतिक निवेशों से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बड़ा बदलाव आ रहा है. डिजिटल तकनीक, कुशल श्रमशक्ति और वैश्विक निवेश के साथ भारत बन रहा है दुनिया का अगला मैन्युफैक्चरिंग हब.

India manufacturing growth
Prashant Rai Edited by Prashant Rai

भारत अब दुनिया के सामने एक उभरता हुआ विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) हब बनकर सामने आ रहा है. यहां बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश हो रहा है और वैश्विक ध्यान केंद्रित हो रहा है. देश की GDP का लगभग 17% हिस्सा और 2.73 करोड़ से अधिक लोग इस क्षेत्र से जुड़े हैं. भारत सरकार ने 2025 तक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से GDP का 25% हिस्सा प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है, जिसके लिए नीतियों और योजनाओं को तेजी से लागू किया जा रहा है.

फिलहाल चीन दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादन केंद्र है, लेकिन भारत ने ऑटोमेशन और श्रमिक प्रशिक्षण में जो प्रगति की है, उसने उत्पादन लागत को काफी हद तक कम कर दिया है. इस वजह से भारत जल्द ही अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा विनिर्माण देश बन सकता है.

भारत में मैन्युफैक्चरिंग अब आर्थिक विकास का अहम स्तंभ बन रहा है. ऑटोमोबाइल, इंफ्रास्ट्रक्चर, उपकरण निर्माण, फार्मा और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स जैसे प्रमुख सेक्टर तेजी से बढ़ रहे हैं. भारत ने एक अलग विकास मॉडल अपनाया है जहां सर्विस सेक्टर को प्राथमिकता दी गई, जिसके कारण पिछले दो दशकों में इसकी GDP में हिस्सेदारी 45% से बढ़कर 55% (2022 तक) हो गई.

हालांकि वैश्विक मानकों की तुलना में यह एक अलग राह है, क्योंकि आमतौर पर देशों में पहले मैन्युफैक्चरिंग का विस्तार होता है और फिर सर्विस सेक्टर में तेजी आती है. भारत में मैन्युफैक्चरिंग का योगदान महामारी से पहले तक 16-17% के आसपास ही रहा.

अब समय आ गया है कि भारत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में अपनी गति बढ़ाए. डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और तकनीक के साथ, भारतीय निर्माता अब ऑटोमेटेड और प्रोसेस-ड्रिवन मैन्युफैक्चरिंग की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे दक्षता और उत्पादकता में सुधार हो रहा है.

भारत की इस औद्योगिक क्रांति के पीछे कई अहम कारण हैं — विशाल युवा टैलेंट, आधुनिक तकनीक, अनुकूल नीतियां और बेहतर सामाजिक वातावरण.

सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ योजना, जो 2014 में शुरू हुई थी, इस बदलाव का मुख्य आधार रही है. इसके तहत घरेलू और विदेशी कंपनियों को भारत में निर्माण के लिए प्रेरित किया गया. इसके साथ ही, हाल ही में लागू की गई PLI (Production Linked Incentive) स्कीम के जरिए इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में निर्माण को प्रोत्साहन दिया जा रहा है.

इन्फ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश भारत की औद्योगिक महत्वाकांक्षाओं का आधार है. इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और स्मार्ट सिटी जैसी परियोजनाएं एक मजबूत लॉजिस्टिक नेटवर्क तैयार कर रही हैं, जिससे माल की आवाजाही तेज होती है और उत्पादन लागत में लगभग 30% तक की कटौती संभव होती है.

FDI (विदेशी प्रत्यक्ष निवेश) के मामले में भी भारत तेजी से आकर्षण का केंद्र बन रहा है. सरकार ने कई क्षेत्रों में 100% FDI को मंजूरी दी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भारत में उत्पादन इकाइयां स्थापित कर रही हैं.

बिजनेस रूल्स को आसान बनाना, टैक्स स्ट्रक्चर को सरल करना और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को बेहतर करना निवेशकों के भरोसे को बढ़ा रहा है. खासकर ऑटो, इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्सटाइल सेक्टर में निवेश और M&A (Merger and Acquisition) गतिविधियां तेज़ी से बढ़ रही हैं. Deloitte की रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में भारत में इनबाउंड M&A डील्स का हिस्सा 27% से बढ़कर 41% हो गया और इसकी कुल वैल्यू $55 बिलियन पहुंच गई.

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की मजबूती के लिए कुशल श्रमशक्ति बेहद जरूरी है. भारत अपनी युवा जनसंख्या का लाभ उठाकर स्किल डिवेलपमेंट प्रोग्राम्स जैसे ‘स्किल इंडिया’ के माध्यम से उन्हें तकनीकी प्रशिक्षण दे रहा है. साथ ही वोकेशनल ट्रेनिंग और अप्रेंटिसशिप के जरिए शिक्षा और उद्योग के बीच की खाई को पाटा जा रहा है.

तकनीक को अपनाकर और व्यापार के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करके, भारत वैश्विक विनिर्माण मानचित्र पर एक मजबूत और अग्रणी भूमिका निभाने की दिशा में लगातार अग्रसर है.

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-भारत एक्सप्रेस



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