Uttarkashi Disaster: अपने सुंदर पहाड़, साफ नदियां और हिमालय की ऊंची-ऊंची खूबसूरत चोटियों के लिए जाना जाने वाला उत्तराखंड इस समय प्राकृतिक आपदाओं का दंश झेल रहा है. 5 अगस्त 2025 को उत्तरकाशी के धरोला में आई आपदा इसका ताजा उदाहरण है.
कल धरोला में मची तबाही को भी लोग केदारनाथ त्रासदी से जोड़ते हुए इसे केदारनाथ 2.0 कह रहे हैं. लोगों का कहना है कि जैसे केदारनाथ में तबाही आई थी. ठीक वैसे ही धरोला में भी तबाही आई. तो केदारनाथ में ऐसा क्या हुआ था कि लोग इसे धरोला मामले से जोड़ रहे हैं.
उत्तराखंड झेल रहा प्राकृतिक आपदाओं की मार
पिछले कुछ समय से उत्तराखंड लगातार प्राकृतिक आपदाओं की मार झेल रहा है. चाहे वो 2023 का भूस्खलन और बाढ़ की घटनाएं हों. जिसमें कई जगहों पर अचानक नदियां उफान पर आ गईं. जिससे कई घर, पुल और सड़कें बह गईं. कई जगहों पर तो पूरा का पूरा पहाड़ ही दरक गया या फिर 2013 में आई भयानक केदारनाथ त्रासदी हो. जहां भारी बारिश की वजह से मंदाकिनी नदी में आई बाढ़ ने हजारों जिंदगियां लील ली.

धरोला हादसे में क्या हुआ?
उत्तरकाशी का धरोला गांव एक गदेरा के किनारे पर मौजूद है. जो आगे जाकर भागीरथी नदी में मिल जाता है. वहां अचानक से भयंकर गति से मलबे से लबरेज बाढ़ का पानी आता है और पूरे गांव को बहा ले जाता है. इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. इस हादसे में अबतक 4 लोगों के मौत की पुष्टि हो चुकी है. बताया जाता है कि ये हादसा बादल फटने की वजह से हुआ. जिसकी वजह से अचानक से गदेरा में इतनी ज्यादा संख्या में पानी आ गया.
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12 साल पहले ऐसे ही केदारनाथ में आई थी त्रासदी
उत्तरकाशी के धरोला गांव में आई जल त्रासदी ने एक बार फिर केदारनाथ त्रासदी की यादें ताजा कर दी. जब 2013 में केदारनाथ में खतरनाक बाढ़ और भूस्खलन की वजह से हजारों लोगों ने अपनी जान गंवा दी.

करोड़ों लीटर पानी केदारनाथ से टकराया
दरअसल जून 2013 में केदारनाथ के ऊपरी हिस्से में बादल फट गया. जिसकी वजह से ऊपरी हिस्से में मौजूद सभी झील और तालें पानी से लबालब हो गईं. इन्हीं में से एक झील है चोराबड़ी. जो केदारनाथ के ऊपरी हिस्से में पड़ती है. उसी झील के पास से मंदाकिनी नदी गुजरती है. पानी के प्रेशर की वजह से ये झील टूट गई और करोड़ों लीटर पानी अचानक से केदारनाथ की तरफ बढ़ने लगा. वहीं बादल फटने की वजह से अचानक से मंदाकिनी नदी में बाढ़ आ गई.

16-17 जून के दिन ये पानी भयंकर गति से केदारनाथ मंदिर और उसके आसपास के इलाकों से टकराया. उस समय केदारनाथ में लाखों की भीड़ थी. पानी अपने साथ बड़े-बड़े पत्थर, पेड़ और गाद भी लेकर आया था.
केदारनाथ का 80 फीसदी हिस्सा हो गया था तबाह
इस त्रासदी में केदारनाथ मंदिर को छोड़कर पूरे केदारनाथ धाम का लगभग 80 फीसदी हिस्सा तबाह हो गया. कई गांव और कस्बे तक पूरी तरह नष्ट हो गए. भूस्खलन और बाढ़ की वजह से हजारों लोग बह गए. कई लोगों के शव तो आजतक नहीं मिले हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस त्रासदी में 5000 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी.
उत्तराखंड क्यों बन गया है आपदाओं का एपिसेंटर
वैज्ञानिक शोधों के अनुसार उत्तराखंड में मच रही तबाही के पीछे इंसान और प्रकृति दोनों जिम्मेदार हैं. पहले समझते हैं कि प्रकृति कारण क्या है?
हिमालय के नीचे लगातार हो रही हलचल
वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय के नीचे मौजूद इंडियन टेक्टोनिक प्लेट लगातार मूवमेंट कर रही है. वो ऊपर की ओर खिसकते हुए तिब्बत के पठार के नीचे समा रही है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इसकी वजह से हिमालय में हलचल हो रही है. जिसकी वजह से चट्टानें कमजोर होकर टूट रही हैं. जो हादसे का कारण बन रही है.

हिमालय की संरचना
वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय पूरी दुनिया का सबसे जवान पहाड़ है. इसका निर्माण इंडियन टेक्टोनिक प्लेट के यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेट से टकराने से हुआ है. दोनों टेक्टोनिक प्लेटों के टकराने पर पृथ्वी का ऊपरी भाग (क्रस्ट) ऊपर उठता गया और हिमालय का निर्माण हुआ. पृथ्वी का क्रस्ट मिट्टी और छोटे-छोटे पत्थरों से बना है. जिसकी वजह से हिमालय पहाड़ के अंदर वो मजबूती नहीं है जो भारत के अन्य पहाड़ों के अंदर है.
जब टेक्टोनिक प्लेट्स टकराती हैं तो हिमालय क्षेत्र में भूकंप आता है. जिसकी वजह से ये कमजोर पहाड़ दरक जाते हैं. जो भूस्खलन और बाढ़ का कारण बनते हैं.
सरकारें हैं सबसे ज्यादा जिम्मेदार
उत्तराखंड में हमेशा से प्राकृतिक आपदाएं आती रही हैं. ये उत्तराखंड का इतिहास है, लेकिन हाल के वर्षों में ये बहुत ज्यादा हो गई हैं. इसका मतलब ये है कि इसका सिर्फ प्राकृतिक कारण नहीं हो सकता. उत्तराखंड में आपदा लाने में मानवीय कारण भी बहुत हद तक जिम्मेदार हैं. वर्तमान में उत्तराखंड में चल रही मानवीय गतिविधियां प्रकृति पर बोझ बन गई हैं. जिसकी वजह से इन आपदाओं में बढ़ोतरी हो रही है.
अनियोजित निर्माण और खनन
हाल के समय में सरकार के द्वारा उत्तराखंड के पहाड़ों को छलनी किया जा रहा है. पहाड़ों के जड़ों को काटकर सड़कें, सुरंगें और बांध बनाया जा रहा है. जिसकी वजह से पहाड़ों में बड़े पैमाने पर विस्फोट और ड्रिलिंग की जरूरत होती है. इसकी वजह से पहाड़ की चट्टानें कमजोर होकर टूट रही हैं. जो बाढ़ या भूस्खलन का खतरा पैदा कर रही हैं.

इसको एक उदाहरण से समझते हैं. 2021 में उत्तराखंड के चमोली जिले में मौजूद रांति पहाड़ बीच से टूटकर गिर गया. आंकड़ों के अनुसार रांति पहाड़ के इस हिस्से की चौड़ाई 550 मीटर से ज्यादा थी. इसकी वजह से तपोवन में भयंकर तबाही मची थी. जब पर्यावरणविदों ने इस हादसे की जांच की तो पाया कि इसका मुख्य कारण बांध का निर्माण है. जिसकी वजह से पहाड़ का जड़ कमजोर हो गया और ढह गया.
पर्यटन का लगातार बढ़ता दबाव
उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है. यहां गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे धाम हैं. जिनके दर्शन करने पूरे देश से लोग आते हैं. आंकड़ों के मुताबिक हर साल उत्तराखंड में 4 करोड़ से ज्यादा लोग आते हैं. जिसकी वजह से उत्तराखंड के प्राकृतिक संसाधनों पर भयंकर दबाव बढ़ रहा है. पर्यटकों को हर सुविधा उपलब्ध कराने के लिए बड़े पैमाने पर जंगल काट रही है.

बांधों का निर्माण और जल विद्युत परियोजनाएं
एक अध्ययन के मुताबिक इस समय उत्तराखंड में ही गंगा और उनकी सहायक नदियों पर कुल मिलाकर 100 से ज्यादा छोटे-बड़े बांध बनाए जा चुके हैं. वहीं इस समय उत्तराखंड में कुल 70 से ज्यादा जलविद्युत परियोजनाएं चल रही हैं. हिमालय जैसे कमजोर पहाड़ पर बड़े पैमाने पर दबाव बढ़ रहा है. जिसकी वजह से ये हादसे हो रहे हैं.
बदलता मौसम का मिजाज
एक अध्ययन के मुताबिक पिछले 4 सालों में ही पूरी दुनिया का तापमान 1.4 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ गया है. जिसका सबसे ज्यादा प्रभाव मौसम पर पड़ रहा है. यह जलवायु परिवर्तन का ही प्रभाव है कि पिछले 20 सालों में उत्तराखंड में मानसून की तीव्रता 30% तक बढ़ गई है. जिसकी वजह से कहीं बाढ़ तो कहीं भूस्खलन जैसे हादसे हो रहे हैं.
– भारत एक्सप्रेस
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