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एनसीएमईआई के कार्यकारी चेयरमैन ने तमिलनाडु में अल्पसंख्यक शिक्षा के लिए खींची नई रेखा, पारदर्शिता और विश्वास को बनाया केन्द्र-बिन्दु

चेन्नई की उच्च-स्तरीय बैठक में प्रशासनिक अड़चनों, संवैधानिक अधिकारों और राष्ट्र-निर्माण में अल्पसंख्यक संस्थानों की भूमिका पर गहन मंथन, प्रो.(डॉ) शाहिद अख़्तर ने उच्च-स्तरीय समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की।

चेन्नई, 1 अगस्त — शैक्षिक प्रशासन को सुगम बनाने और संवैधानिक गारंटियों की हिफ़ाज़त के लिए एक अहम क़दम उठाते हुए, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान आयोग (एनसीएमईआई) के कार्यवाहक अध्यक्ष प्रोफ़ेसर (डॉ.) शाहिद अख्त़र ने शुक्रवार को चेन्नई स्थित केन्द्रीय सचिवालय में एक उच्च-स्तरीय समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की। इस महत्वपूर्ण बैठक में तमिलनाडु सरकार के सबसे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों—जिनमें अतिरिक्त मुख्य सचिव, सचिव, निदेशक और अन्य प्रमुख अफ़सर शामिल थे—ने राज्य भर में अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों के सामने आ रही लंबित चुनौतियों पर विस्तार से बातचीत की।

इस उच्च-स्तरीय एजेंडे के केन्द्र में तीन प्रमुख मुद्दे रहे—अल्पसंख्यक दर्जा प्रमाण-पत्र (एमएससी) और अनापत्ति प्रमाण-पत्र (एनओसी) जारी करने में आ रही प्रक्रियात्मक रुकावटें, अल्पसंख्यक समुदायों के सामने खड़ी शैक्षिक परेशानियां, तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत राज्य सरकार द्वारा शैक्षिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए उठाए गए क़दमों की समीक्षा।

अड़चनें दूर करें: प्रमाणीकरण की चुनौतियां

बैठक में मुख्य रूप से उस प्रशासनिक खींचतान पर ग़ौर किया गया जो वर्षों से अल्पसंख्यक संस्थानों के प्रमाणीकरण की राह में सबसे बड़ी रुकावट बनी हुई है। ग़ौरतलब है कि एनसीएमईआई, जो वर्ष 2004 के एनसीएमईआई अधिनियम के तहत स्थापित एक अर्ध-न्यायिक निकाय है, को सिविल अदालत की शक्तियां प्राप्त हैं। यह आयोग किसी भी संस्थान की अल्पसंख्यक दर्जे की स्थिति से जुड़े सभी सवालों का फ़ैसला करता है तथा एमएससी और एनओसी से संबंधित विवादों में अपीलीय प्राधिकारी के रूप में कार्य करता है। इसके बावजूद, ज़मीनी हक़ीक़त में संस्थानों को प्रक्रियागत देरी और राज्य-स्तरीय अलग-अलग व्याख्याओं के कारण काफ़ी दिक्क़तों का सामना करना पड़ रहा है।

सबसे विवादास्पद मुद्दों में से एक रहा है अल्पसंख्यक दर्जा तय करने के लिए राज्य सरकारों—खासकर तमिलनाडु—द्वारा अपनाई जाने वाली कसौटी। दिसंबर 2022 में तमिलनाडु सरकार ने दिशा-निर्देश जारी कर कहा था कि अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा चलाए जा रहे स्व-वित्तपोषित व्यावसायिक संस्थान अपनी निर्धारित क्षमता का अधिकतम 50 फ़ीसदी ही अपने समुदाय के छात्रों को दाख़िला दे सकते हैं। हालांकि, एनसीएमईआई का लगातार यही कहना है कि किसी अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों के दाख़िले का यह प्रतिशत अल्पसंख्यक दर्जा तय करने के लिए कोई मान्य संकेतक नहीं है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि किसी अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान में उस विशेष समुदाय के छात्रों की ‘उचित संख्या’ होनी चाहिए, और यह प्रतिशत जनगणना के आंकड़ों के अनुसार राज्य की आबादी में उस समुदाय के वास्तविक अनुपात के आधार पर ही तय होगा।

राज्य के दिशा-निर्देशों और आयोग की संवैधानिक व्याख्या के बीच यह असमंजस सैकड़ों संस्थानों के लिए बेचैनी का सबब बना हुआ है, जो मान्यता और उससे मिलने वाली सुरक्षा की उम्मीद में हैं। चेन्नई बैठक का मक़सद इसी व्याख्यात्मक खाई को संवाद और आपसी सहमति के ज़रिए पाटना था।

अनुच्छेद 30(1): एक संवैधानिक वादा, जिसे पूरा किया जाना बाक़ी

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30(1) सभी धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षिक संस्थान स्थापित करने और उन्हें संचालित करने का अधिकार देता है। यह अधिकार सांस्कृतिक और शैक्षिक दोनों दृष्टियों से एक मज़बूत गारंटी है, जो यह सुनिश्चित करता है कि अल्पसंख्यक समुदाय राष्ट्र-निर्माण में सार्थक भागीदारी करते हुए अपनी अस्मिता को भी बचाए रख सकें। इसी उद्देश्य से एनसीएमईआई की स्थापना की गई थी।

लेकिन जैसा कि चेन्नई की मुबाहिसे में सामने आया, संवैधानिक वादे और प्रशासनिक हक़ीक़त के बीच की दूरी अब भी काफ़ी बड़ी है। तमिलनाडु भर में अल्पसंख्यक संस्थान सम्बद्धता (एफिलिएशन) में होने वाली देरी, नियामक अनुपालन को लेकर विवाद, और उस ‘विधायी खाई’ की शिकायत करते रहे हैं जो उनकी स्वतंत्र प्रशासनिक शक्तियों को छीन रही है। इस बैठक ने राज्य के अधिकारियों को इन अधिकारों की सुरक्षा के लिए उठाए गए सक्रिय क़दमों को पेश करने का मौक़ा दिया, वहीं आयोग ने जवाबदेही, संस्थागत स्वायत्तता और सुगम नियामक अनुपालन पर विशेष ज़ोर दिया।

डिजिटल भविष्य: सुधारों की नई किरण

प्रोफ़ेसर अख्त़र, जो आयोग के कामकाज को आधुनिक बनाने में सबसे आगे रहे हैं, ने पारदर्शिता और दक्षता लाने वाले सुधारों पर प्रकाश डाला। इनमें अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों के पंजीकरण के लिए एक डिजिटल मंच की शुरुआत शामिल है—यह क़दम काग़ज़ी कार्रवाई कम करने, देरी समाप्त करने और आवेदनों की रियल-टाइम ट्रैकिंग सुनिश्चित करने की दिशा में उठाया गया है। यह डिजिटल पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 और देश के दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों के साथ अल्पसंख्यक शिक्षा को जोड़ने की व्यापक कोशिश का हिस्सा है।

आयोग अब तक देशभर में 14,000 से अधिक पात्र अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों को अल्पसंख्यक दर्जा प्रमाण-पत्र प्रदान कर चुका है, जिनमें मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन समुदायों के संस्थान शामिल हैं। उम्मीद की जा रही है कि डिजिटल पहल इस प्रक्रिया को और तेज़ करेगी और साथ ही अधिक जवाबदेही सुनिश्चित करेगी।

‘विकसित भारत @ 2047’: राष्ट्रीय प्रगति के स्तंभ

बैठक का समापन करते हुए प्रोफ़ेसर अख्त़र ने इस पूरी बातचीत को ‘विकसित भारत @ 2047’ के राष्ट्रीय दृष्टिकोण से जोड़ा—यह आज़ादी के शताब्दी वर्ष तक भारत को एक पूर्ण रूप से विकसित राष्ट्र बनाने की महत्वाकांक्षी रूपरेखा है।

उन्होंने कहा, “शिक्षा वह आधारशिला है जिस पर वास्तव में समावेशी और प्रगतिशील राष्ट्र की इमारत खड़ी होती है। जब हम विकसित भारत @ 2047 के परिवर्तनकारी सपने की ओर बढ़ रहे हैं, तो अल्पसंख्यक समुदायों का शैक्षिक सशक्तिकरण अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान प्रतिभा, चरित्र और सामाजिक सद्भाव के महत्वपूर्ण प्रजनन केंद्र हैं।”

उन्होंने अल्पसंख्यक संस्थानों और सरकार के बीच की दूरी को तुरंत पाटने पर ज़ोर दिया और कहा, “हमें नियामकों और शिक्षा प्रदाताओं के बीच सहयोग, पूर्ण पारदर्शिता और स्थायी आपसी विश्वास को बढ़ावा देना होगा। तभी हम इन संस्थानों को ज़मीनी स्तर पर राष्ट्र-निर्माण में अहम भूमिका निभाने के लिए सशक्त बना सकते हैं।”

आगे की राह

चेन्नई बैठक उस सतत संवाद की दिशा में एक अहम क़दम है, जिसे एनसीएमईआई नियामकों और शिक्षा प्रदाताओं के बीच स्थापित करना चाहता है। प्रशासनिक अलगाव को दूर करके और प्रमाणीकरण प्रक्रियाओं को सरल बनाकर, तमिलनाडु के अल्पसंख्यक संस्थान 2047 तक भारत के विकसित राष्ट्र बनने के सफ़र में सार्थक योगदान दे सकते हैं।

जैसा कि बैठक में मौजूद एक वरिष्ठ अधिकारी ने टिप्पणी की, “यह सिर्फ़ काग़ज़ी कार्रवाई या प्रक्रियाओं का मामला नहीं है। यह यह सुनिश्चित करने के बारे में है कि हर बच्चा, चाहे वह किसी भी समुदाय से आता हो, एक ऐसे संस्थान में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंचे जो उसकी पहचान का सम्मान करता हो और उसकी क्षमता का पोषण करता हो।”

एनसीएमईआई का तमिलनाडु से यह जुड़ाव एक व्यापक राष्ट्रीय प्रयास का हिस्सा है। हाल के महीनों में मुंबई, केरल और दिल्ली में भी इसी तरह की उच्च-स्तरीय बैठकें आयोजित की गई हैं, जिनका मक़सद देश में अल्पसंख्यक शिक्षा के ढांचे को मज़बूत करना और इसे विकास एजेंडे के साथ संरेखित करना है। अब जबकि डिजिटल मंच पूरी तरह सक्रिय हो चुका है और पारदर्शिता तथा विश्वास पर नया ज़ोर दिया जा रहा है, आयोग संवैधानिक गारंटियों को ज़मीनी स्तर पर ठोस नतीजों में बदलने के लिए पूरी तरह तत्पर नज़र आ रहा है।
—- भारत एक्सप्रेस



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