बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कांग्रेस, राहुल गांधी और देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लेकर कई बड़े बयान दिए हैं. उन्होंने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस नेता अब तक 100 चुनाव हार चुके हैं और उन्हें भी इस बात का एहसास हो गया है कि उनके पास जनता का समर्थन नहीं है.
दुबे ने तंज कसते हुए कहा कि राहुल गांधी को पता है कि वह अपने जीवनकाल में कभी देश के प्रधानमंत्री नहीं बन पाएंगे. इसलिए विपक्ष ने उन्हें एक दिन के लिए नकली प्रधानमंत्री बना दिया है. अब वह इसी में खुश हैं और खुश रहेंगे.
निशिकांत दुबे ने यह बयान विपक्ष की ओर से संसद में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री की भूमिका में पेश किए जाने के संदर्भ में दिया. उन्होंने कहा कि पूरा विपक्ष जानता है कि गांधी परिवार से अब कोई दोबारा प्रधानमंत्री नहीं बनने वाला. ऐसे में राहुल गांधी को प्रतीकात्मक रूप से प्रधानमंत्री बनाकर विपक्ष अपनी राजनीति कर रहा है.
आंदोलन करने वालों पर भी साधा निशाना
देश में युवाओं और आम नागरिकों की आवाज दबाने के आरोपों के साथ बांग्लादेश और सत्ता परिवर्तन का मुद्दा उठाए जाने पर भी निशिकांत दुबे ने प्रतिक्रिया दी. उन्होंने नेहा बोरा का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि वह एक ऐसे राजनीतिक संगठन के छात्र संगठन से जुड़ी हैं, जिसके 1968 के प्रस्ताव में भारतीय संविधान को जलाने और लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को स्वीकार नहीं करने जैसी बातें कही गई थीं. दुबे ने दावा किया कि यह संगठन लोकतांत्रिक तरीके के बजाय हथियारों के दम पर सत्ता हासिल करना चाहता है.
इसके साथ ही उन्होंने प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और वृंदा करात जैसे लोगों पर भी टिप्पणी की. बीजेपी सांसद ने कहा कि ये सभी लोग लंबे समय से अलग-अलग आंदोलनों में हिस्सा लेते रहे हैं. साल 1990 के बाद शायद ही कोई बड़ा आंदोलन हुआ हो, जिसमें ये लोग शामिल न रहे हों. चाहे बीजेपी का आंदोलन हो, वामपंथी दलों का प्रदर्शन, अन्ना हजारे का आंदोलन, सीजेपी का आंदोलन या कांग्रेस का कोई विरोध प्रदर्शन, ये लोग हर जगह नजर आते हैं.
दुबे ने कहा कि कुछ लोगों ने देश में अपनी पहचान केवल आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों के जरिए बनाई है. उनका मानना है कि ऐसे लोग सांसद या विधायक नहीं बन पाने के कारण आंदोलन की राजनीति करते हैं और खुद को अपनी वास्तविक राजनीतिक हैसियत से ज्यादा सक्षम समझते हैं.
निशिकांत दुबे ने अपने बयान में जवाहरलाल नेहरू की नीतियों पर भी गंभीर सवाल उठाए. उन्होंने आरोप लगाया कि नेहरू किसी भी कीमत पर प्रधानमंत्री बनना चाहते थे और इसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण देश के कई अहम इलाकों को लेकर गलत फैसले किए गए.
दुबे ने कहा कि चटगांव, सिलहट और नोआखाली जैसे इलाकों को पाकिस्तान के हिस्से में जाने देने का फैसला क्यों लिया गया? उनका दावा है कि इन क्षेत्रों का त्रिपुरा के तत्कालीन राजघराने से संबंध था और वहां के शासक इन इलाकों को लेकर अपनी अलग राय रखते थे.
बीजेपी सांसद ने सवाल उठाया कि अगर त्रिपुरा के राजा और महारानी भारत के साथ रहना चाहते थे, तो उनकी रियासत से जुड़े इलाकों के भविष्य का फैसला करने का अधिकार नेहरू को किसने दिया? उन्होंने कहा कि यह इतिहास का ऐसा पहलू है, जिस पर अब दोबारा विचार करने की जरूरत है.
सिलहट जनमत संग्रह और बहारुल इस्लाम का किया जिक्र
निशिकांत दुबे ने सिलहट में हुए जनमत संग्रह और बहारुल इस्लाम का भी जिक्र किया. उन्होंने आरोप लगाया कि बहारुल इस्लाम का मुस्लिम लीग से संबंध था और उन्हें नोआखाली की हिंसा तथा चटगांव से जुड़े घटनाक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला बताया.
दुबे ने कांग्रेस पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि बहारुल इस्लाम को कांग्रेस ने राज्यसभा का सदस्य बनाया था. इसके बाद वह हाईकोर्ट के जज बने और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे. सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें दोबारा कांग्रेस ने राज्यसभा भेजा.
बीजेपी सांसद ने कहा कि अब समय आ गया है कि देश के इतिहास को सही तरीके से देखा जाए और उन फैसलों पर सवाल उठाए जाएं, जिनका असर आज भी पूर्वोत्तर भारत पर दिखाई देता है.
चटगांव पोर्ट को पूर्वोत्तर के विकास से जोड़ा
निशिकांत दुबे ने चटगांव बंदरगाह को पूर्वोत्तर भारत के विकास के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि अगर आज पूर्वोत्तर के कई इलाके विकास के मामले में पीछे हैं और वहां के प्राकृतिक संसाधनों का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है, तो इसकी एक बड़ी वजह चटगांव पोर्ट का भारत के पास नहीं होना है.
उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर में खनिज, गैस और दूसरे प्राकृतिक संसाधनों की काफी संभावनाएं हैं, लेकिन समुद्र तक बेहतर पहुंच और व्यापारिक सुविधाओं की कमी के कारण इनका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है. दुबे के मुताबिक, चटगांव बंदरगाह भारत के पास होता तो पूर्वोत्तर के विकास को नई गति मिल सकती थी.
अक्टूबर 1946 के नोआखाली नरसंहार का उठाया मुद्दा
अपने बयान में दुबे ने 1946 में हुए नोआखाली नरसंहार का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि भारत की आजादी से पहले ही नेहरू अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री बन गए थे. उनके मुताबिक, नेहरू 2 सितंबर 1946 को अंतरिम सरकार के प्रमुख बने थे, जबकि भारत को औपचारिक आजादी 15 अगस्त 1947 को मिली.
दुबे ने आरोप लगाया कि मुस्लिम लीग की डायरेक्ट एक्शन की राजनीति के बाद अक्टूबर 1946 में नोआखाली में हिंदुओं के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा हुई. उन्होंने दावा किया कि इस नरसंहार में एक ही दिन में करीब 10 हजार हिंदुओं की हत्या कर दी गई थी. उनका आरोप है कि उस समय नेहरू ने प्रधानमंत्री के तौर पर वहां जाने के बजाय मुस्लिम लीग को अपनी सरकार में शामिल करने पर ज्यादा ध्यान दिया.
उन्होंने त्रिपुरा के तत्कालीन शासक बीर बिक्रम सिंह और महारानी कंचन प्रभा देवी का भी उल्लेख किया. दुबे के मुताबिक, त्रिपुरा के शासक अपने क्षेत्र से जुड़े फैसलों को लेकर नेहरू से लगातार सवाल कर रहे थे. उनका कहना था कि किसी भी इलाके को पाकिस्तान में शामिल करने या वहां जनमत संग्रह कराने का फैसला लेने का अधिकार त्रिपुरा के शासक का होना चाहिए.
निशिकांत दुबे ने कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल की पहल के बाद अक्टूबर 1948 में त्रिपुरा का भारत में विलय हुआ. महारानी कंचन प्रभा देवी ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए, जिसके बाद त्रिपुरा भारतीय संघ का हिस्सा बना.
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