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बिहार के नए सम्राट! क्यों नीतीश के सबसे बड़े विरोधी ही बने उनके सबसे बड़े उत्तराधिकारी? पढ़ें- EXPLAINER

Samrat Choudhary Bihar CM: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 18 मार्च को नवादा में अपने समृद्धि यात्रा के दौरान उन्होंने सम्राट चौधरी के कंधे पर हाथ रखकर मंच से कहा कि आगे यहीं सब देखेंगे. जिसके बाद से यह चर्चाएं चल रही हैं कि सम्राट चौधरी ही बिहार के अगले मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं.

Samrat Choudhary Bihar CM

Samrat Choudhary Bihar CM: बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जल्द ही पूर्व मुख्यमंत्री के ओहदे पर पहुंचने वाले हैं. अपनी इस राजनीतिक यात्रा से पहले उन्होंने बिहार के अगले मुख्यमंत्री की परोक्ष रूप से घोषणा कर दी है. 18 मार्च को नवादा में अपने समृद्धि यात्रा के दौरान उन्होंने सम्राट चौधरी के कंधे पर हाथ रखकर मंच से कहा कि आगे यहीं सब देखेंगे. जिसके बाद से यह चर्चाएं चल रही हैं कि सम्राट चौधरी ही बिहार के अगले मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. तो सवाल यह उठता है कि पहली बार बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने जा रही बीजेपी की पहली पसंद आखिर सम्राट चौधरी ही क्यों हैं?

सम्राट चौधरी बीजेपी की पहली पसंद क्यों हैं इस सवाल का जवाब इतिहास में छिपा है.

भारत की आज़ादी के बाद से लेकर 1990 तक बिहार की राजनीति पर लंबे समय तक सवर्ण नेताओं का प्रभाव बना रहा. आज़ाद भारत में बिहार के पहले मुख्यमंत्री बने श्री कृष्ण सिंह, जिन्हें लोग स्नेह से ‘श्री बाबू’ के नाम से भी जानते हैं. उन्होंने लगभग एक दशक से अधिक समय तक राज्य की सत्ता संभाली और बिहार की प्रशासनिक नींव को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उनके बाद दीप नारायण सिन्हा ने कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी निभाई. ये दोनों नेता सवर्ण समाज से आते थे, और उस दौर में राज्य की सत्ता पर इसी वर्ग का दबदबा साफ तौर पर देखा जा सकता था.

आजादी के बाद सवर्णों का रहा वर्चस्व

आज़ादी के बाद से लेकर 1990 तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सवर्ण नेताओं का वर्चस्व बना रहा. हालांकि इस दौरान बीच-बीच में ओबीसी और मुस्लिम समुदाय से आने वाले नेताओं को भी सत्ता संभालने का अवसर मिला, लेकिन कुल मिलाकर सबसे लंबा शासन सवर्ण नेताओं के हाथों में ही रहा. यह दौर बिहार की पारंपरिक सामाजिक-राजनीतिक संरचना को दर्शाता है, जिसमें सत्ता और समाज के ऊपरी तबकों का प्रभाव अधिक था.

साल 1990 में बिहार की राजनीति ने एक बड़ा मोड़ लिया, जब लालू प्रसाद यादव के रूप में एक ऐसे नेता का उदय हुआ जिसने “सामाजिक न्याय” को राजनीति के केंद्र में ला दिया. लालू यादव ने पिछड़े वर्गों, दलितों और वंचित समाज की आवाज़ को मजबूत तरीके से उठाया और सत्ता की राजनीति का समीकरण बदल दिया. उनके नेतृत्व में बिहार की राजनीति सवर्ण बनाम पिछड़ा की बहस के इर्द-गिर्द घूमने लगी, जिसने राज्य के सामाजिक ढांचे को गहराई से प्रभावित किया.

हालांकि लालू यादव के शासनकाल में बिहार ने सामाजिक बदलाव के साथ-साथ तनाव का दौर भी देखा. इस समय कई जगहों पर जातीय हिंसा और नरसंहार की घटनाएं हुईं, जिसने समाज के भीतर अविश्वास और वैमनस्य को बढ़ा दिया. इसका असर यह हुआ कि बिहार की राजनीति और समाज धीरे-धीरे सवर्ण और अवर्ण की रेखा में बंटता चला गया.

यही दौर आगे चलकर बिहार की पूरी राजनीति की दिशा तय करने वाला साबित हुआ, जहां से सामाजिक न्याय, मंडल राजनीति और जातीय समीकरण राज्य की सत्ता का मुख्य आधार बन गए.

1947 से लेकर 1990 के बीच क्या हुआ?

आजादी के बाद से ही बिहार में राजपूतों और भूमिहारों के बीच सत्ता पर वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई. इस लड़ाई में भूमिहार विजयी हुए और बिहार में भूमिहार नेता श्री कृष्ण सिंह सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे. लेकिन राजपूत इस संघर्ष को जारी रखे. बिहार की दो ताकतवर जातियों के बीच लड़ाई का फायदा ब्राह्मणों ने लपक लिया. श्री कृष्ण सिंह के बाद साल 1990 तक सत्ता में ब्राह्मण नेताओं का वर्चस्व रहा. बिहार में विवेकनंद झा, केदारनाथ पांडेय और जगन्नाथ मिश्र जैसे ब्राह्मण नेता सत्ता पर कब्जा पाने में सफल हुए. इस राजनीतिक रस्साकस्सी के दौरान ओबीसी समाज भी ताकतवर होता गया. ओबीसी में त्रिवेणी संघ (कुर्मी, कुशवाहा और यादव) लगातार सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे थे. उधर भूमिहार बनाम राजपूत की लड़ाई का फायदा ब्राह्मणों को उठाते देख बिहार के राजपूत नेताओं ने एक बड़ी राजनीतिक चाल चली.

जनता दल के शीर्ष नेताओं में शामिल और बलिया से सांसद चंद्रशेखर सिंह ने साल 1990 में सत्ता की गेंद को त्रिवेणी संघ की तरफ उछाल दिया. उन्होंने लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री बनाने के लिए हामी भर दी. फिर क्या था, बिहार में पहली बार पूर्ण रूप से एक ताकतवर ओबीसी जाति (यादव) के हाथों में सत्ता गई. बता दें कि, इससे पहले दरोगा प्रसाद राय जो यादव समुदाय से आते थे भी बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने में सफल रहे थे. हालांकि उनका कार्यकाल बहुत कम समय के लिए रहा.

कुर्मी-कुशवाहा का लालू से विद्रोह

त्रिवेणी संघ में सबसे ज्यादा पावर होल्डिंग यादवों के पास थी. लालू प्रसाद यादव इस संघ के नेता बने और राज्य में 15 सालों तक राज किया. सत्ता पर यादवों की पकड़ ने कुर्मी और कुशवाहा नेताओं को नाराज कर दिया. बिहार में कुर्मी और कुशवाहा को लव और कुश कहा जाता है. मौका देख दोनों जातियों (कुर्मी-कुशवाहा) के नेताओं ने विद्रोह कर लालू प्रसाद के खिलाफ हो गए. हालांकि पहली बार सत्ता तक पहुंचने में इन्हें एक दशक लग गए.

साल 2005 में बिहार की सत्ता पर नीतीश कुमार पहली बार मुख्यमंत्री के तौर पर बैठे. नीतीश कुमार कुर्मी समाज से आते हैं. लालू प्रसाद यादव के हाथों से सत्ता को निकलते देख सवर्णों ने मजबूती के साथ लव-कुश की जोड़ी को अपना समर्थन दिया. सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार ने कुर्मी-कुशवाहा के साथ साथ अति पिछड़ा समाज का भी समर्थन प्राप्त किया.

साल 2014 के बाद बदले हालात

नीतीश कुमार बीजेपी के साथ मिलकर लालू राज को उखाड़ने में कामयाब रहे. एक तरफ जहां बीजेपी को सवर्ण वोटरों का सपोर्ट था, तो दूसरी तरफ नीतीश को कुर्मी-कुशवाहा सहित अन्य अति पिछड़ी जातियों का. दोनों पार्टियां परस्पर सहयोग से सीट बंटवारा कर बिहार की सत्ता में बनी रहीं.

साल 2005 के बाद पहली बार 2014 में तब दोनों पार्टियों में बंटवारा हुआ, जब बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के चेहरे के रूप में आगे किया. नीतीश कुमार पिछले 9 सालों से बिहार की सत्ता में थे और वो चाहते थे कि एनडीए की तरफ से पीएम पद का उम्मीदवार उन्हें बनाया जाए. हालांकि जब बात नहीं बनी तो उन्होंने साल 2014 में बीजेपी से अपना नाता तोड़ लिया और राजद के साथ मिलकर बिहार की गद्दी पर बैठे. लेकिन जब 2014 लोकसभा का रिजल्ट आया तो उनके पैरों तले जमीन खिसक चुकी थी. नीतीश कुमार की लोकसभा में जबरदस्त हार हुई.

नीतीश कुमार ने इस हार का दोष सवर्णों के माथे पर मोड़ दिया. जबकि इसका मुख्य वजह अति पिछड़ा समाज का वोट भाजपा की तरफ मुड़ना था.

हाल की परिस्थित में कौन बेहतर?

इसके लिए हमें फिर से त्रिवेणी संघ पर लौटना पड़ेगा. त्रिवेणी संघ से यादवों ने 15 साल, कुर्मी समाज ने 20 साल राज कर लिया है. अब कुशवाहा की बारी है. अब उपेंद्र कुशवाहा और नीतीश कुमार दिल्ली की तरफ प्रस्थान कर चुके हैं, ऐसे में बड़े कुशवाहा नेता के तौर पर सम्राट चौधरी का पदोन्नति लाजमी है.

सम्राट क्यों है बीजेपी की पसंद?

साल 2022 में जब नीतीश कुमार ने बीजेपी का साथ छोड़ा था, तब सम्राट चौधरी ने ही नीतीश के खिलाफ मोर्चा खोला था. उस विपरित परिस्थिति में सम्राट ने हर मौके पर नीतीश कुमार को घेरने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. इतना ही नहीं सम्राट चौधरी ने प्रतिज्ञा ली थी, कि जबतक नीतीश कुमार को कुर्सी से उखाड़ नहीं फेंकते तबतक वो सिर पर बंधा मुरेठा (पगड़ी) नहीं खोलेंगे. हालांकि साल 2022 में ही नीतीश कुमार एक बार फिर राजद से हाथ छुड़ाकर बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया. इसके बाद सम्राट चौधरी ने अयोध्या जाकर अपनी पगड़ी को खोला. सम्राट चौधरी के इस लड़ाकू स्वभाव ने उन्हें बीजेपी और संघ की नजर में एक बेहतरीन नेता के तौर पर स्थापित कर दिया.

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पिछले छह महीने में सम्राट चौधरी ने बेहद तेजी के साथ अपनी छवि में सुधार की है. उनकी छत्रछाया में बिहार में कानून व्यवस्था को सही करने के लिए लगातार कार्रवाई की जा रही है. इसके अलावा बिहार में नए उद्योगों और नगर विकास के लिए कई सम्मेलन का भी आयोजन कराया है. अब यह देखने वाली बात होगी कि उनकी मेहनत कितनी रंग लाती है, लेकिन इस समय सम्राट चौधरी ही सीएम की रेस में सबसे आगे चल रहे हैं.

-भारत एक्सप्रेस



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